
सनातन सप्तक में ब्रह्म,परम पुरुष,जीव,धर्म,सत्य और साधु सनातन है।।
आज दुनिया में अणुबम से ज्यादा अणुव्रत की जरूरत है।।
विश्व को जो दिशा दिखाएं उसे वैदिक कहते है।। जिनका दृष्टिकोण ही वैश्विक हो वो वैदिक है।।
सनातन धर्म के सप्तक का ‘सा’-साधु है।।
मोक्ष के दरवाजे पर चार द्वारपाल खड़े हैं: शमो,विचार,संतोष और साधु संग।।
जगत में सबसे बड़ा असाध्य रोग संसार है और विचार उनकी औषधि है।।
साधना,तप की बहुविध धारायें जहां जागृत है ऐसी पालिताणा की भूमि पर ब्रह्मलीन महंत विजयगिरिबापु और उन के कृपापात्र शिष्य लालगिरिबापु के शिव संकल्प से शुरु हूइ रामकथा का गुरुवार को छठ्ठा दिन।।
आरंभ में कहां भगवान आदिनाथ की तपोभूमि और अनादि शंकर कि ये दिव्य भूमि जहां अनेक महापुरुषों आए,अनेक महापुरुषों होंगे लेकिन हम पहचान नहीं सकते और अनेक महापुरुषों आते रहेंगे,ऐसी सिद्ध भूमि पर आयोजित कथा में बहुत सी जिग्यासायें भी थे।।
बापू ने कहा कि कल हम बैठे थे तो महावीर बापू ने एक बात कही और उनके संदर्भ में भी प्रश्न उठा था लेकिन कथा सुनने के बाद जो गांव में शिव मंदिर, राम मंदिर,कृष्ण मंदिर ना हो तो उनका निर्माण करना।।हमारे सनातन धर्म के मंदिरों का जतन करें जब दिल्ली में मानस सनातन धर्म पर मैंने कथा की वहां में बोला था और जो कुछ बोला जाता है उनका संपादन नितिन वडगामा और उनकी टीम करती है। वैसे क्रम में संपादन अभी नहीं हो पाया लेकिन बहुत मांग उठी है इसलिए बीच में ही इनका संपादन हुआ और इस शनिवार को यह लोकार्पित भी होगी।। सनातन धर्म एक सप्तक है।।जहां एक-ब्रह्म सनातन है।दो-गीता में कहा ऐसा पुरुष,परम पुरुष सनातन है तीन-जीव को भी सनातन कहा गया है।उपनिषद की एक ही डाली पर दोनों बैठे हैं,एक साक्षी है एक भोक्ताहै।।जब से शिव आए तब से जीव भी आया है।।चार-धर्म सनातन है,कोई स्विकारकरे ना करें अलग बात है।।वैदिक का अर्थ वैश्विक,दिक् का अर्थ दिशाएं।।विश्व को जो दिशा दिखाएं उसे वैदिक कहते है।। जिनका दृष्टिकोण ही वैश्विक हो।।कलि प्रभाव है इसीलिए विरोध,टीका,ग्रंथ में गरबड़,कुछ दूर करना,कुछ अंदर डालना,ना शोभा न दे ऐसी प्रवृत्ति समाज में हो रही है।।लेकिन किसी भी विचारधारा की एक आयुष्यहोगी।।किसी को २००० साल,किसी को ५००० साल,किसी को ढाई सौ साल,किसी को २०० साल,कोई अभी पनप रहैहै।लेकिन सनातन धर्म का कोई आयुष्य अंक नहीं है यह पुरातन नहीं सनातन है।।सनातन धर्म का शिखर अचल और श्वेत कैलाश है।।सनातन धर्म की प्रवाही परंपरा-गंगा का प्रवाह है।।सनातन धर्म के मूल सहित वृक्ष अक्षय वट है।।सनातन धर्म की हवा हनुमान है।।सनातन धर्म का रस कृष्ण-रसोवैस: है। सनातन धर्म का शब्द ओम से लेकर राम तक है। और सनातन धर्म के ग्रंथ वेद,वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस है।।सनातन धर्म की धरती धैर्य धीरज है।।
पांचवा-हमारा स्वभाव सनातन है ।छह-सत्य सनातन है।।लेकिन सप्तक में मुख्य ‘सा’ होता है। साधु सनातन है।।सनातन धर्म के सप्तक का ‘सा’ साधु है।।
बापू ने यह भी कहा कि बहुत सी बातें बताइ लेकिन बहुत सूक्ष्म रूप में बताउं तो चार वस्तु ही काफी है आपकी पीढ़ियां तैर जायेगी।वशिष्ठ जी ने भगवान राम को चार वस्तु बताइ और कहा:मोक्ष के दरवाजे के चार द्वारपाल खड़े हैं:शमो,विचार,संतोष और साधु संग।।द्वारपाल महत्व का हे।।शमो का मतलब है शांति।।विचार भी बहुत महान है।जगत में सबसे बड़ा असाध्य रोग संसार है और विचार उनकी औषधि है ऐसा शंकराचार्य जी कहते हैं।।तीसरा द्वार पाल संतोष है और चौथा द्वार पाल साधुसंग है।। आज दुनिया में अणु बम से ज्यादा अणुव्रत की जरूरत है।।
कथा प्रवाह की धारा में याज्ञवल्क्य और भरद्वाज के बीच संवाद होता है। शिव की समाधि टूटी और रसमयी कथाएं सुनाते हैं।।इस वक्त कैलाश के ऊपर विमान निकलते हैं।।दक्ष के यज्ञ में जाने के लिए सती ने जीद की है।। भगवान शंकर ने बताया कि शास्त्र कहते हैं चार जगह पर बिना बुलाए हम जा सकते हैं लेकिन यहां आप ना जाओ तो अच्छा है अपमान होने वाला है।।फिर भी सती न मानी और गणों के साथ सती को शिव ने दक्ष यज्ञ में भेजा।।वहां सती ने देखा कि ब्रह्मा,विष्णु और महेश का कोई स्थान नहीं है। बहुत अपमानित हुई और सहन न करके यज्ञ में कूद कर जल गइ।।शिव के गण ने यज्ञ का विध्वंस किया।।पूरे यज्ञ में हाहाकार हो गया

