Homeगुजरातकथायात्रा ऑंठवे दिन अष्टमी पर अवतरित कान्हा की प्रेमनगरी मथुरामें पहुंची।।

कथायात्रा ऑंठवे दिन अष्टमी पर अवतरित कान्हा की प्रेमनगरी मथुरामें पहुंची।।

ये शब्द,रुप,रस,स्पर्श और गंध की भूमि है।।

प्रार्थना करे की जेल में बंदी बैठे हमारे कृष्ण जल्द मुक्त हो जाये।।

वो एक पल भी सुन ले तो जनमो जनम का कथागान सफल!

यहां आते-आते हमें द्वादश शगून हुए।।

किसी राम परायणी के मुख से कथा श्रवण करें वह कथामृत बन जाता है।।

दुर्गम दुर्गों को चीरती कथायात्रा की ट्रेइन आंठवे दिन सनातन प्रेम के अवतार भगवान कृष्ण की रस भूमि मथुरा में पहुंची तो कनैया ने सब की पीडा चूरा ली,सब फ्लावर्स बीलकूल ताजा और फ्रेश लग रहे थे।

बापु ने बताया की ऐसी भूमि जो रुप की भूमि है।शब्द की भूमि है।कभी होठों से बोले कुरुक्षेत्र जाते बहूत मुखर हो गये।वेणु को अपने होठों से लगाकर वेणुनाद किया।।ये सपर्श की भूमि है,विशेष छू ती है।।ये रस की भूमि।रसो वै स:-ग्रंथो ने कहा है।।यहां रस बरस रहा है।।यह गुणातित गंध की भूमि है।।महाप्रभु जी वल्लभाचार्य जी ने कहा है की स्वभाव पर विजय पाना है तो यमुनाष्टक का पाठ करो।।

द्वापर में तो प्रभु जेल से मुक्त हो गये थे लेकिन कलियुग में अभी बंदी बनकर बैठे हैं।प्रार्थना करे जल्द मुक्त हो जाये।।

एक-एक तीर्थ देवता और तीर्थस्थानों के सभी पूज्य चरणों को प्रणाम करते हुए मथुरा के देवताओं,सब की परंपरा के पुरोहित पंडित गण,विद्वद गण,आचार्यों को प्रणाम करते हुए गिरिराज जी,उंची अटारी वाली,बरसाने वाली श्री राधा जी,जो वृंदावन छोडकर,कितने युग बीते,कृष्ण एक कदम भी दूर गया नहिं वो वृंदावन को,बांके बिहारी जी के चरणों में,रमणरेती की रज को स्मरण प्रणाम कर के व्रजचौरासी को प्रणाम किये।।

यहां रामकथा क्यों?साध्वीय जवाब ये है की कृष्ण स्वयं चाहता है की मेरे पूर्व अवतार की कथा मोरारिबापु व्रज में आकर गायें!मैं कहीं छीपकर सुनु।।वो एक पल भी सुन ले तो जनमो जनम का कथागान सफल।

बापु ने कहा की हमारे पूर्वज हरियाणा से व्रज आये।तलगाजरडा होते हुए व्रज की रज और नाद लेकर सेंजल गये जीसे हम ध्यान स्वामी बापा कहते है।।

व्रज आते आते द्वादश शगुन हूए।।

ये शगुन रामचरित मानस में मिलेगा अयोध्या से जब राम ब्याहने चले तो ये शगुन हुए है:

कल्याण कारी,मंगल कारी,शुभ कारी,प्रकृति ने ये बारह स्वस्ति वाचन किये:

१-नीलकंठ पक्षी-बांइ ओर से उडकर जाते है तब समस्त मंगल की उद्घोषणा हो जाती है।।

नीलकंठ पक्षी भी है और नीलकंठ महादेव भी है जीनका ट्रेइन में स्मरण हुआ की तेरी पोथी लेकर हम कहां कहां पहुंचे

२-दांयी ओर कौआ सुखेत में दिखाइ दिया।कागभुशुंडी दिखाइ दिये।

३-नकुल के दर्शन सब को हुए।

४-मंगल,शितल,सुगंधी वायु बहने लगी।।

५-पतिव्रता नारी संघट,सबाल(पानी का घट लेकर बालक को उठाकर) दिखे।यहां सघट-घट वाले दिलवाले लोग मिले और सबाल का गुरुमुखी अर्थ है सुहागन स्त्री।।

५-लोमड़ी बार-बार दर्शन देती है।।

६-गाय अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई मिले।सुरभि का एक अर्थ सूर का साधक अपने आश्रित को लेकर आए।।

७-मृग माला दिखे।।

८-समड़ी-चील उड़ती दिखाई दे।

९-सूतरु की छांव।

१०-दहीं लेकर कोई आता दिखे।।

११-मछली दिखे-मीन।।

१२-प्रवीण विप्र दो पुस्तकें हाथ में है ऐसा सामने मिले।।

राम ब्याहने गए सब मंगल आए,शंकर ब्याहन गए तो सब अमंगल साथ चले हैं!

बापू ने कहा कि नाम स्मरण और नामामृत और  कथा श्रवण कथामृत कैसे बने? हम जो लेते हैं तब वह नाम है,लेकिन जिसने राम-राम रटन में जन्म-जन्म बीताये वह नाम ले हमारे कान में पड़े हम साथ जप करें तब नामामृत बन जाता है।।किसी राम पारायणी के मुख से कथा श्रवण करें वह कथामृत बन जाता है।।

आज कृष्ण भूमि पर,कृष्ण भक्ति में लीन होते हुए बापू कृष्ण के कीर्तन गाते हुए महारास में लीन हुए और पूरे पंडाल को भी महारास से भर दिया और आज की कथा को राधे जी के चरणों में समर्पित करने के बाद कथा का विराम हुआ।।

कथा-विशेष:

‘धर्मक्षेत्र’ और ‘भगवद्गीता की भूमि’:कुरुक्षेत्र-जहां नवमे दिन की कथा का होगा गान।।

हरियाणा का पवित्र ऐतिहासिक शहर है।।

महाभारत का युद्ध:लगभग ५००० वर्ष पहले कौरवों और पांडवों के बीच यहीं १८ दिनों तक ऐतिहासिक महाभारत का महायुद्ध हुआ था।

गीता का उपदेश: इसी पवित्र भूमि पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था।

ज्योतिसार (Jyotisar) को गीता की जन्मस्थली माना जाता है।।

ब्रह्म सरोवर: यह यहाँ का सबसे प्रसिद्ध और विशाल मानव निर्मित सरोवर है।मान्यता है कि इसकी स्थापना भगवान ब्रह्मा ने की थी। इसके पास सर्वेश्वर महादेव मंदिर और द्रौपदी कूप स्थित हैं।

इनके अलावा

ज्योतिसार तीर्थ

ब्रह्म सरोवर

भद्रकाली मंदिर

शेख चिल्ली का मकबरा (Sheikh Chilli Tomb)

तिरुपति बालाजी मंदिर

गीता ज्ञान संस्थानम और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

४८ कोस की परिक्रमा यहां होती है।।

कुरुक्षेत्र का दायरा ४८ कोसों में फैला हुआ है।।कइ पौराणिक और ऐतिहासिक तीर्थस्थल और मंदिर मौजूद है।।

== समाप्त ==

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