चार द्वार नानकीय परंपरा का स्वस्तिक है।।
ग्रंथ के प्रति इतना आदर निष्ठा और कहीं नहीं देखी,जितनी नानकीय परंपरा में है।।
गुरुद्वार केंद्र में हैं,केंद्र का भी सूक्ष्म केंद्र गुरु ग्रंथ साहिब है।।
सत्य के समान कोइ धर्म नहि है।।
मौन के समान कोई तप नहीं है।।
अब दुनिया बहुत मुखर होते जा रही है,लोग बहुत चिल्ला-चिल्ला कर उग्रता से बोले जा रहे हैं।। सरस्वती का इतना अपमान नहीं होना चाहिए,वह मधुरभाषिनी है।।
बहुत कोलाहल हो रहा है,हार्मनी टूटी जा रही है।।
विवेक विचार के समान कोई ज्ञान नहीं।।
त्याग के समान कहीं भी शांति नहीं,जप के समान कोई यज्ञ नहीं।।
क्रोध के समान कोई अग्नि नहीं,जब भी समझ में आए।।
कितने शहीद हुए अभी तक हम तर्पण नहीं कर पाए,मूल श्राद्ध अभी नहीं कर पाए।।
दाताओं की,बलिदानी गुरुजनों की यह भूमि है।।
मोहब्बत के समान कोई मंजिल नहीं।।
———————————-
ऐतिहासिक,वीर जवानों की धीरता की भूमि वाघा बॉर्डर पर जब कथायात्रा,सोमवार दसवें दिन में पहुंची।बापु ने कहा की जिस भूमि की एक विशेष महिमा है।पोथी को केंद्र में रखकर आए हैं।गुरु नानक देव की परंपरा को,सभी गुरुजनों और भूमि को प्रणाम करके बापू ने कहा वैसे हमारे चार सरोवर-कच्छ का नारायण सरोवर,हिमालय का मानसरोवर,गुजरात का बिंदु सरोवर,हरियाणा का ब्रह्म सरोवर और यहां पंजाब में अमृत सरोवर! कहीं कलश में अमृत है,कहीं अंजलि में अमृत है।धन्य है पंजाब भूमि यहां अमृत का पूरा सरोवर है!!
हमने सरोवर का पान दर्शन किए और स्वर्ण मंदिर में गुरु ग्रंथ साहिब के दर्शन किए।।
मानस के आधार पर कहु तो ग्रंथ के प्रति इतना आदर निष्ठा और कहीं नहीं देखी,जितनी नानकीय परंपरा में।।वीरता से भरा यह प्रदेश अपना बलिदान दुनिया की दुनिया को बता चुका है।लेकिन ग्रंथ के पास गाय की तरह सब बैठे हैं, ग्रंथ का यह महिमा है।।
इतना बड़ा क्रांतिकारी निर्णय इन गुरुजनों ने लिया दस गुरुओं के बाद उनके वचनों से ग्रंथ को ही गुरु बना दिया जाए।।व्यक्ति नहीं ग्रंथ को ही गुरु स्थान दिया।।जो तुलसी ने भी किया है:
सदगुरु ग्यान बिराग जोग के।
बिबूध बैद भव भीम रोग के।।
रामचरितमानस सद्गुरु है।।यहां ‘मानस जनक’ ‘मानस अमृत’ के रूप में और आसपास भी बहुत सी कथा हुई है।।यहां तो तब ही आया जाता है जब गुरु बुलाए!बार-बार सब कह रहे हैं यहां कथा गान के लिए,शायद अगली साल फिर कहीं हम अमृतसर कथा गान की कोशिश करेंगे।।
क्योंकि नानकीय परंपरा के गुरुओं को मिलकर ग्रंथ का अवलोकन कर कर मैं समझा हुं यहां चार द्वार है यही स्वास्तिक है।।पंजाब में विशेष राजद्वार है।।कई राजे महाराजे आए,रणजीत सिंह ने राजमार्ग कैसा हो वह बताया।।गुरु जन कहते हैं पंजाब मुक्ति का द्वार है।।यहां स्वर्ग का द्वार भी कहा है और नगर रचना में नगर द्वार भी दिखाया गया है।। लेकिन मूल में गुरुद्वार केंद्र में हैं।। केंद्र का भी सूक्ष्म केंद्र गुरु ग्रंथ साहिब।।एक ओंकार सतनाम नानक जी के यही शब्द है।।सत्य के समान कोइ धर्म नहि है।।धर्म बहूत है,मुख्य दो-चार और अनेक शाखायें संप्रदाय भी है।।
तुलसी जी ने भी यही बात लिखी है
धरमू न दूसर सत्य समाना।
आगम निगम पुरान बखाना।।
मौन के समान कोई तप नहीं है।।इन गुरुजनों की जीवनी का अवलोकन करते हुए दिखता है।।गाया तो गुरु बानी ही गायी।। मीरां ने नाच कर नानक देव ने गा कर पाया।।
अब दुनिया बहुत मुखर होते जा रही है,लोग बहुत चिल्ला-चिल्ला कर उग्रता से बोले जा रहे हैं। सरस्वती का इतना अपमान नहीं होना चाहिए,वह मधुरभाषिनी है।।लेकिन बहुत कोलाहल हो रहा है, हार्मनी टूटी जा रही है।।
विवेक विचार के समान कोई ज्ञान नहीं।।
विष्णु देवानंद गिरी,महामंडलेश्वर कैलाश आश्रम का पंजाब से बहुत गहरा नाता भी रहा।।
त्याग के समान कहीं भी शांति नहीं।जप के समान कोई यज्ञ नहीं।क्रोध के समान कोई अग्नि नहीं,जब भी समझ में आए।।
दुनिया क्रोध भी बहुत करती दिखती है।शायद कलि प्रभाव होगा। निंदा के समान कोई नरक नहीं। यह भूमि दुनिया को विशेष बात देती है-संगत और पंगत अमरनाथ की यात्रा में बड़ी मात्रा में पंजाब के लंगर होते हैं।।
कुछ सेंटर देश में भेद ज्यादा करने में तुले है,
तलगाजरडा कोशिश में है सब प्रकार के भेद मिटे।।
यह भूमि की माताओं ने शूरवीरों को जन्म दिया। कितने ही जवान बॉर्डर पर लगे हुए हैं।कितने शहीद हुए अभी तक हम तर्पण नहीं कर पाए,मूल श्राद्ध अभी नहीं कर पाए।।दाताओं की,बलिदानी गुरुजनों की यह भूमि है।।
मोहब्बत के समान कोई मंजिल नहीं।।
उड़िया बाबा ने कहा था योग और भोग स्वत: होते हैं किसी को सीखना नहीं पड़ता।।और यह भी कहा राम नाम का भजन करो।।
शंकराचार्य जी को हमारे विद्वानों ने प्रछन्न बुद्ध कहा है। वह कहते थे तेरी आत्मा ही शंकर और बुद्धि गिरीजा है।।बैठ जा, तेरे पांच प्राण सहचर है।इतने रेशनालिस्ट कोई नहीं हो सकता।।
फिर नामकरण संस्कार मैं चारों भाइयों के नाम के पीछे छिपे अर्थ भी बता कर विश्वामित्र के साथ वनगमन और मारिच सुबाहू को गति देकर राम,लक्षमण चले।।
आज की कथा सैनिको की राष्ट्र भक्ति,गुरुजनों, पंजाब की गुरु भक्ति और दाताओं की दान शक्ति को समर्पित हूइ।।
कथा-विशेष:
श्री रघुनाथ मंदिर उत्तर भारत का प्रसिद्ध प्राचीन और एकमात्र दिव्य मंदिर जो राजा राम जी के पूर्वज रघु का है।
महाराज रघु,अज,दशरथ के बाद राजा राम आए। यहां राम,लक्ष्मण और सीता मैया की मूर्तियों के साथ रामायण के सभी चरित्र भी दर्शायें गए हैं। भगवान विष्णु के सभी अवतारों के रूपों को सुंदरता से स्थापित किया है।
सुग्रीव,हनुमान जी,विभीषण जैसे सेवक-भक्त और नटराज,बगलामुखी,गणेश और शिवलिंग के ऊपर शालिग्राम एवं लक्ष्मी-नारायण,राधे-कृष्ण जी की मूर्ति स्थापित की गई है।
महाराज रणधीर सिंह जी ने (१८५३-१८६०) हर एक किलोमीटर में एक मंदिर बनवाया।
इसलिए जम्मू को मंदिरों की नगरी कहते हैं।
यहां का परिसर इतना विशाल और भव्य है शायद किसी मंदिर में हो।
सब से विख्यात मॉं वैष्णो देवी मंदिर भी बहूत नीकट है।।
शिल्पकला सुंदर और भव्य है।
सात शिखर प्रत्येक तीर्थ दिखता है।
यहां की दीवारें सोने की चादर से और मुख्य द्वार चांदी का जयपुर कारीगरी से निर्माण किया गया है यहां सभी देवी देवताओं हैं।
सभी त्योहार मनाए जाते हैं।।
प्रतिदिन डेढ से दो हजार श्रद्धालुओं मन्नत के लिए आते हैं।।
रघुनाथ मंदिर जम्मू शहर के केंद्र में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर परिसर है।जो भगवान श्री राम (रघुनाथ) को समर्पित है।।
इस मंदिर का निर्माण कार्य १८३५ में डोगरा वंश के संस्थापक महाराजा गुलाब सिंह ने शुरू करवाया था और १८६० में उनके पुत्र महाराजा रणबीर सिंह ने इसे पूरा किया था।
यह उत्तर भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसरों में से एक है,जिसमें सात प्रमुख मंदिर हैं और प्रत्येक का अपना एक ऊंचा शिखर है।
== समाप्त ==

