Homeगुजरातधर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र, गीतागान की भूमि पर नवमे दिन की कथा का गायन हुआ।।

धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र, गीतागान की भूमि पर नवमे दिन की कथा का गायन हुआ।।

“सनातन के स्वाभिमान,भारत के गौरव संत परंपरा के आदर्श बापू का आगमन पावन कारी है”:गीता मनिषी जी

“गीता मनिषी जी ने यहां धर्मक्षेत्र,कूरुक्षेत्र,नर्मक्षेत्र और वर्मक्षेत्र का स्वस्तिक बनाया है”:मोरारिबापु

भारत रूपी स्वस्तिक में चार युग है,चार बिदियां दीखती है वह साधक के मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार है।।

भारत रूपी स्वस्तिक का केंद्रबिंदु भजन है।।

गीता का आरंभ भी धर्म,मध्य भी धर्म और आखरी भी धर्म है।।

नींव भी धर्म,प्लिंथ भी धर्म और छत भी धर्म है।।

महाभारत का मूल,मुख और फूल कृष्ण है।।

हमारी यात्रा की हमारा अनुष्ठान है।।

गीता जी के कारण हरी भरी हरियाणा की कुरुक्षेत्र की भूमि पर,नवमें दिन की कथा के आरंभ पर गीता मनीषी जी ने अपना शुभ भाव रखते हुए कहा की: भगवत गीता की उपदेश स्थली,धर्मक्षेत्र,कुरुक्षेत्र में अत्यंत पावन करी दिव्य संयोग बना है।सनातन के स्वाभिमान,भारत के गौरव संत परंपरा के आदर्श बापू का आगमन हुआ है।।चार वर्ष पूर्व यही धरा, यही स्थान पर जहां नव दिवसीय कथा ‘मानस गीता’ का गान हुआ था।।मानस और गीता के भाव का अद्भुत संबंध स्थापित हुआ था।।गीता जी का सूत्रपात अध्यात्म तत्व है।वहीं भारत स्वतंत्र यात्रा भारत स्वास्तिक यात्रा में व्यापक प्रेरणा के रूप में दिख रहा है।पूरा देश,पूरा विश्व निश्चित भारत गौरव सनातन स्वाभिमान के लिए यह यात्रा विश्व को दिव्यता पहुंचाने में,काम करने में सबल काम करेगी फिर बापू ने कथा आरंभ करते हुए कहा की कृष्ण का तो स्मरण रहता ही है।।

साथ-साथ गीता मनीषी जी से प्रत्युत्तर के रुप में बताया की आपने समुद्र से सरिता जब मिले उस दृश्य को कभी गौर से देखा हो,तो आप अक्सर पाओगे समंदर तरंगित है,रत्नाकर है,विशाल और बहुत गहरा है,उसमें क्या नहीं है! सरिता जैसे-जैसे समंदर के करीब आती है विशेष रूप में तरंगायित होती है,क्योंकि आज मैं लक्ष्य को प्राप्त करने वाली हुं! उसमें आनंद भरा जाता है।।आप बड़े रत्नाकर है हमारे हृदय की नदियां विशेष तरंगायित हो रही है। एक स्मरण हो रहा है पहली बार,३०-३४ साल पहले कुरुक्षेत्र में पहली कथा हुई तब आपकी अध्यक्षता में यह कथा हुई थी।।इस कथा में बहुत बड़ा ऐतिहासिक,बहुत लंबा इंटरव्यू हुआ था।।वो स्मरण और बहुत सी स्मृतियां इस भूमि के साथ जुड़ी है। बापू ने गीता मनीषी जी से कहा कि व्यास पीठ श्रोताओं के प्रति आपने जो सद्भाव व्यक्त किया वह आपका स्वभाव है।।यह कुरुक्षेत्र भी है।धर्म क्षेत्र भी है।।गीता का आरंभ भी धर्म,मध्य भी धर्म और आखरी भी धर्म है।।वहां सर्वधर्म परित्यज्य कहा है आदि,मध्य,अवसान धर्म की स्थापना की है।।नींव भी धर्म,प्लिंथ भी धर्म और छत भी धर्म है।।धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र तो है ही आपने उसे नर्मक्षेत्र भी बना दिया। नर्म का मतलब आनंद है।।भगवान कृष्ण ने आपको निमित्त बनाया और आपको मेरे बोल की कोई जरूरत नहीं,फिर भी मेरे बोल का कभी तोल होगा आपने इस धर्मक्षेत्र को वर्मक्षेत्र भी बनाया।।वर्म का मतलब है-सुरक्षा।।

भारतीय सनातन सभ्यता के लिए यह जरूरी है। मैं स्वस्तिक कथा लेकर निकला हूं।।धर्मक्षेत्र,कूरुक्षेत्र,नर्मक्षेत्र और वर्मक्षेत्र का आपने स्वस्तिक बनाया है।।

विश्राम दाई विकास दिख रहा है।।सात्विक कला से भरा मंदिर भी बनाया है और स्वरूप रमन रेती ठाकुर जी का है!

जीवन की यदि हम स्वस्तिक समझें,भारत को स्वस्तिक समझे और विश्व को स्वस्तिक बनाने की कल्पना करें तो भारत रूपी स्वस्तिक में चार युग है।चार बिदियां दीखती है वह साधक के मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार है।।

त्रिभुवन दादा से मैंने पूछा था विष्णु दादा निकले तब क्या हुआ दादा ने कहा मुझे तो प्रणाम किया,तेरी दादी अमृत मॉं को भी प्रणाम किया।।बाद में पोस्टकार्ड आया कि बच्चों को कहना गीता जी का निरंतर पाठ करें।।और खुद विष्णु देवानंद गिरी बन गए।।

जाने क्या जादू भरा हुआ,भगवान तुम्हारी गीता में जूग जूग का अनुभव जुड़ा हुआ,

भगवान तुम्हारी गीता में,

जब शोक मोह से घीर जाए।

तब गीता बचन हृदय लायें।

सारा भव सागर तरा हुआ,

भगवान तुम्हारी गीता में।

मन चमन हमारा हर हुआ,

भगवान तुम्हारी गीता में।।

महाभारत का मूल कृष्ण,मुख कृष्ण और महाभारत का फूल कृष्ण है।।हरियाणा में इतनी हरियाली गीता के कारण है।।

अर्जुन के रथ की ध्वजा में विराजित हनुमान जी ने पूरी गीता सुनी और चारों युग प्रताप-इसलिए गीता का प्रताप भी चारों युगों से हैं।।

हमारी यात्रा की हमारा अनुष्ठान है।।जीवन ही अनुष्ठान है।।गुजराती में साथिया कहते हैं वह स्वस्तिक को,भारत स्वस्तिक या जीवन यदि स्वस्तिक है उसमें चार चांद करते हैं वह साधक का मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार है।।इस रूप से चारों युग से जुड़ जाए तो विश्व मंगल होगा।।

सतयुग ध्यान से जुड़ा।ज्ञान चित् वृत्ति का निरोध करता है।त्रेता युग बुद्धि से जुड़ जाता हैं।द्वापर कृष्ण का काल,पूजा पाठ में मन लगता लगाना पड़ता है कलयुग अहंकार से जुड़ जाता है।।भारत रूपी स्वस्तिक का केंद्र जीवन स्वस्तिक का केंद्र बिंदु भजन है।। यह भजन का काल है।।गीता का गायन पारायण भजन है।।भजन में भंग पड़ जाता है,ज्ञान की धारा अखंड नहीं रहती।क्षरण,स्खलन हो जाता है।। हमारा कल्याणकारी जीवन स्वस्तिक का केंद्र भजन है,भंग पड़ने के कारण में:

१-भजन विमुख लोगों का संग-जो भजन को पागलपन या घेलछा कहते हैं।लेकिन भजन अमृत है भारत भी जब-जब चिंतन,मनन भजन से दूर हुआ स्वस्तिक फिसल गया है।।भारत में कुछ नगर ऐसे होने या बनाने चाहिए जहां कोई उद्योग ना हो, पक्षपात न हो,केवल चिंतन मनन करने वाले साधक निवास कर सके।ऐसे ग्राम हर हिस्से में निर्माण होने चाहिए।।या तो कुछ साधु इकट्ठे होकर भारत को अपना मूल रूप प्रदान कर सके।।

२-अती बोलने से भजन विक्षिप्त होता है।।

३-अकारण भीड़ का हिस्सा बनने से भजन में भंग पड़ता है।।

४-अती निद्रा विक्षेप करती है।।

५-निंदा करें इस सुनने में रुचि भजन केंद्र से दूर करता है।।

६-अति भोजन दूर करवाता है।।

७-अति क्रोध भजन नहीं करने देता।।

८-अत्यंत विलासी जीवन दूर करता है।

९-जरूरत से ज्यादा वस्तुओं का संग्रह दूर करवाता है।।

जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी की पीठ के हमारे द्वारिका के जगत गुरु को मिलने गए।वहीं से एक प्रसादी का श्लोक जो गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय का ११वां श्लोक है।वहां भी कहा गया है सुलभम भगवन नाम- भगवान का नाम हमारे वश में है। जीह्वा-जीभ हमारी वश में है फिर भी आदमी दुर्गति में जाता है!इससे बड़ा आश्चर्य क्या है!!

बापू ने यह भी कहा कि मुक्ति मिलने के बाद हम फिर से आ न सके तो वह मुक्ति भी बंधन है। मैं उसे मुक्ति नहीं कहता।।आना चाहिए,मुक्ति ऐसी स्वतंत्र हो जब चाहे जन्म ले सके।

आज की कथा को गीता मैया के चरणों में समर्पित करते हुए समापन हुआ।।

 

कथा-विशेष:

दसवां मुकाम जहां है वह हमारी अटारी-सीमा वाघा बॉर्डर (अटारी-वाघा सीमा) का इतिहास:

वर्ष १९४७ में भारत के विभाजन और रेडक्लिफ लाइन के निर्धारण से जुड़ा है।

यह स्थान भारत के पंजाब में अमृतसर से लगभग ३२ किलोमीटर दूर और पाकिस्तान के लाहौर से लगभग २४ किलोमीटर दूर ऐतिहासिक ग्रांड ट्रंक रोड पर स्थित है।।

विभाजन और सीमा का जन्म (१९४७):

अगस्त १९४७ में भारत के बंटवारे के दौरान पंजाब को दो हिस्सों में बांटा गया।।

महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति रहे सरदार श्याम सिंह अटारीवाला का गांव अटारी भारत के हिस्से आया,जबकि वाघा गांव पाकिस्तान के हिस्से में चला गया।।

अस्थायी चेक पोस्ट की स्थापना (११ अक्टूबर १९४७):

भारत के ब्रिगेडियर मोहिंदर सिंह चोपड़ा और पाकिस्तान के ब्रिगेडियर नाज़िर अहमद ने ग्रांड ट्रंक रोड पर सीमा तय करने की जिम्मेदारी संभाली।

११ अक्टूबर १९४७ को बॉर्डर पिलर नंबर १०२ के पास ड्रम,पत्थर और टेंट लगाकर एक अस्थाई चेक पोस्ट बनाई गई।।

विस्थापन का मार्ग:

विभाजन के समय लाखों शरणार्थियों ने भारत और पाकिस्तान के बीच आवाजाही के लिए इसी मुख्य रास्ते का उपयोग किया।।

बीटिंग रिट्रीट समारोह की शुरुआत (१९५९):

दोनों देशों की सरकारों की सहमति से १९५९ में यहां प्रतिदिन ‘बीटिंग रिट्रीट’ (Beating Retreat) सैन्य समारोह की शुरुआत हुई।

इसमें भारत के सीमा सुरक्षा बल (BSF) और पाकिस्तान के रेंजर्स द्वारा हर शाम सूर्यास्त से पहले परेड और झंडा उतारने की रस्म निभाई जाती है।

== समाप्त ==

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