निरंतर चिंतन करे वो साधु।।
परम साधु वह है जो केवल स्मरण करता है।।
सत्य छूट भी जाए तो भी स्मरण मत छोड़ना!
अतिशय विरोध करने से चित् विकृत हो जाएगा।
चारों मंगल करने वाले हनुमान जी स्वस्तिकारी है।
नवरात्र के पावन दिनों में बापु ने नीचे उतरकर महाकाली के कल्याणकारी रास पर समग्र पंडाल के साथ रास और गरबा पर नृत्य किया।।
दक्षिण से शुरु हूइ कथायात्रा ने तीसरे दिन केरल से निकलकर कर्णाटक के श्रृंगेरी में प्रवेश किया।सादगीभरा सहज सुंदर व्यासपीठ का स्टेज और दक्षिण की विश्वविख्यात शारदा पीठ-शृंगेरी पीठ के प्रतिनिधिन एवं पंडितों ने वेदमंत्रो का पाठ किया।।
महाकाली की नगरी कोलकाता से एक जिग्या सा थी:कथा कैसे सुननी चाहिए?समचित से या सम्यक चित से?
बापू ने कहा चित्रकूट में लक्ष्मण ने पांच प्रश्न पूछे तब प्रभु ने कहा मैं थोड़े में सब समझा देता हूं। बहुत कठिन है यह,शून्य में पूर्णता करना कठिन है। राम जी कहते हैं थोड़े में सब कुछ यदि आत्मसात करना है तो मन से-मन लगाकर,बुद्धि के विवेक से क्षीर नीर का निर्णय करके और चित् से सुनो।।लेकिन अहंकार से मत सुनो।।समचित और सम्यक चित् में अंतर है।।गायन और श्रवण समचित से करना चाहिए।।किसी के प्रति राग और द्वेष नहीं रखना। साधु,असाधु परम साधु में अंतर दिखाते हुए कहा की असाधु वह है जो निरंतर चिंता करता है।।श्रीमद् महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने मना कर दिया।
हमारे गुजरात के कवि दयाराम जी ने लिखा है:
चित्त तुं शीदने चिंता करे कृष्ण ने करवुं होय ए करे!
निरंतर चिंतन करे वो साधु।।इतनी कठिन यात्रा में आपको भी असुविधा में डालना वह मेरा शौक नहीं है।।स्वास्तिक का मतलब है दोनों हाथ को एक साथ जोड़ो।सबको जोड़ो।।परम साधु वह है जो केवल स्मरण करता है।।सत्य छोड़ना नहीं चाहिए। फिर भी हम जीव है। सत्य छूट भी जाए तो भी स्मरण मत छोड़ना! निरंतर आठों प्रहर स्मरण करना।द्वारिकाधीश की ध्वजा का दर्शन करो तो भी बहुत है।
सम्यक चित का अर्थ यह है चित् का निरोध भी नहीं और विरोध भी नहीं।।कुछ लोग ज्यादा निरोध करके पागलपन की हद तक जाते हैं।।चित् विष्णु है,मन चंद्रमा,बुद्धि ब्रह्मा और शिव समष्टि का अहंकार है। अतिशय विरोध करने से चित् विकृत हो जाएगा। सीधा-सादा कागज जैसे हम मोड़ देते हैं।
मंगलस्य प्रतीक: मंगल का प्रतीक स्वस्तिक है। शुभस्य सूचकं और कल्याणयस्य चिह्नं- स्वस्तिक कल्याण का चिह्न है।।
चारों मंगल करने वाले हनुमान जी स्वस्तिकारी है। हनुमान जी इंद्रिय जीत है।इसलिए मंगलकारी है एकमात्र ऐसा तत्व है जो युवानो का मुखिया बन सके।वानर’युथ’ मुख्यं। हनुमान जी सूर्य से आगे है बचपन में सूर्य को फल समझ कर निगल लिया हनुमान की गति अटल है।गरुड़ से भी अधिक है। निष्ठा की धरी छोड़ना नहीं।।बृहस्पति देवता के गुरु है हनुमान जी गुरुओं का गुरु है।
प्रमाण सर पेट पर यदि तीन रेखा दिखे वह मंगल है भाल में तीन रेखा कुदरती दिखे वह कल्याणकारी है कंठ का आकार शंख समान हो वह मंगल चिन्ह है। रामचरितमानस के आध्यात्मिक इतिहास में शिव जी ने मानस की रचना करके मानस में रखा। फिर शिवा को सुनाया।।यह कथा गंगा भूसुंडी से होते हुए गरुड़ और याज्ञवल्क्य से नीचे उतरी भारद्वाज ने सुनी।।गोस्वामी जी के गुरु ने बार-बार सुकर क्षेत्र में सुनाया।।तब जाकर मन में बैठा।।
बापू ने कहा सरस्वती सत्य,लक्ष्मी प्रेम और महाकाली करुणा है।।यह भी कहा कि चारों पीठ पर नीचे उतरकर नवरात्र के दिनों में रास गरबे पर घूमना है ।।
और बापू ने नीचे उतरकर महाकाली के कल्याणकारी रास पर समग्र पंडाल के साथ रास और गरबा पर नृत्य किया।।
शृंगेरी पीठ का अथ से इति
दक्षिण (शृंगेरी शारदा पीठम, कर्नाटक) के वर्तमान शंकराचार्य जगद्गुरु श्री श्री भारती तीर्थ महास्वामी जी हैं।
वे इस पीठ के 36वें पीठाधीश्वर हैं और वर्ष 1989 से इस सर्वोच्च पद पर आसीन हैं।।
शृंगेरी पीठ और उनके बारे में कुछ विशेष बातें निम्नलिखित हैं:
1.जीवन और संन्यास
* जन्म: उनका जन्म 1951 में आंध्र प्रदेश में हुआ था (संन्यास से पूर्व उनका नाम सीताराम अंजनेयुलु था)।
* मेधावी विद्वान: वे बचपन से ही संस्कृत, वेदों और दर्शनशास्त्र के प्रकांड विद्वान रहे हैं। मात्र 23 वर्ष की आयु में (1974 में) उन्होंने अपने गुरु श्री अभिनव विद्यातीर्थ महास्वामी जी से संन्यास दीक्षा प्राप्त की थी।
2.नामित उत्तराधिकारी (शिशु शंकराचार्य)
* जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामी जी ने वर्ष 2015 में अपने उत्तराधिकारी के रूप में श्री श्री विधुशेखर भारती स्वामीजी को मनोनीत किया है।
* वर्तमान में, पीठ के सभी बड़े धार्मिक आयोजनों, शास्त्रार्थ सभाओं और देशव्यापी धर्म विजय यात्राओं का नेतृत्व मुख्य रूप से श्री विधुशेखर भारती जी ही करते हैं।
3.शृंगेरी पीठ का विशेष महत्व और प्रथम आचार्य
* प्रथम मठ: शृंगेरी शारदा पीठम को आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पहला और सबसे मुख्य मठ माना जाता है।
* प्रथम आचार्य: आदि शंकराचार्य जी ने अपने सबसे परम और प्रकांड विद्वान शिष्य श्री सुरेश्वराचार्य जी को इस दक्षिण पीठ का पहला आचार्य नियुक्त किया था।
* वेद और महावाक्य: यह पीठ यजुर्वेद को समर्पित है और यहाँ का महावाक्य “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ) है।
* अधिष्ठात्री देवी: यहाँ तुंगा नदी के तट पर ज्ञान की देवी मां शारदाम्बा (सरस्वती) का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है, जिनकी स्थापना स्वयं आदि शंकराचार्य जी ने की थी।
शारदा पीठ या मठ श्री शारदंबा मंदिर के दक्षिण में तुंगा नदी के पार नरसिंह वन में स्थित है. यह मंदिर मां शारदा, ज्ञान की देवी को समर्पित है।
श्रृंगेरी में है मां सरस्वती का सबसे पुराना मंदिर है। श्रृंगेरी का शारदम्बा मंदिर,आदि शंकराचार्य मंदिर बहुत ही खूबसूरत है और यहां देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।।
== समाप्त ==

