कालडी और तलगाजरडी प्रस्थान त्रयि में ब्रह्मसूत्र सत्य है,भगवद गीता प्रेम है और उपनिषद करुणा का प्रतीक है।।
मन को शुद्ध करने में,वश करने में,स्थिर करने में समय मत बिगाड़ो,मन लगाकर सुनो!
मन का दान कथा को करो।
व्यास पीठ के पास निरंतर बैठना यह करुणा है इसके अलावा कुछ नहीं।।
विकास विश्राम दायी ही होना चाहिए।।
दशनाम सामान्य नहीं,दशावतार के बराबर है।।
सहस्त्रनाम में से सहज आ जाए वह पकड़ो
केवल भारत को नहि,दिलों को जोड़ने के दिव्य संकल्प लिये शुरु हूइ अध्यात्म कथायात्रा दूसरे दिन जगदगुरु आदि शंकराचार्य की प्रागट्य भूमि कालडी में पहूंची तब बापू ने बताया की यात्रा आज ऐसे स्थान में आई है जिस भूमि ने एक बहुत बड़ी चेतना को प्रकट की।।जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी की जन्म भूमि को प्रणाम करते हुए कहा जीन पूर्णा नदी में मैंने नवदिवसीय कथा के वक्त स्नान किया वह नदी को,जगतगुरु की समाधि को और प्रथम नवरात्र है।।शैलपुत्री शंकराम्बा को प्रणाम करते हुए सालों पहले की कथा याद की।।
व्यास पीठ के पास निरंतर बैठना यह करुणा है इसके अलावा कुछ नहीं।।
शंकराचार्य जी ने प्रस्थान त्रयि पर अपना भाष्य लिखा।ब्रह्मसूत्र,श्रीमद् भगवत गीता और उपनिषद।। साक्षर बौद्धिक जगत उसे प्रस्थान त्रयि के नाम से जानते हैं।।
ब्रह्मसूत्र के बारे में कुछ कहने की हमारी औकात नहीं।।हमारे गुजरात के नगीनदास बापा ने कहा था कि सत्य,प्रेम और करुणा तलगाजरडा की प्रस्थान त्रयि है।। कालडी और तलगाजरडी प्रस्थान त्रयि को जब हम ले तो ब्रह्मसूत्र वही सत्य है।।भगवद गीता का सूत्रात्मक दोहन कर कहे तो यह प्रेम है।।अर्जुन को भगवान कृष्ण ने सख्य प्रेम के कारण गीता कही है।और उपनिषद करुणा का प्रतीक है।कभी किसी ऋषि ने किसी शिष्य पर करुणा की और इतने निकट खींचा,करुणा बही।।
विकास विश्राम दायी ही होना चाहिए।।
जिस पूर्णा नदी से संन्यास का जन्म हुआ जहां से दशनाम प्रकट हुआ।।सनातन पर इतने प्रहार हो रहे थे इस काल में यह नदी ने संन्यास को जन्म दिया।। दशनाम सामान्य नहीं,दशावतार के बराबर है।।वेद में शुक्ल यजुर्वेद मंत्र है:
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
इस मंत्र में चार लोग हमारा मंगल करते हैं:इंद्र,सूर्य, अरिष्ट नेमी-जिनकी धरी हिलती नहीं यह गारुड़ी शक्ति और अपने-अपने गुरु यह चारों हमारा मंगल करते हैं ऐसी भगवान वेद ने प्रार्थना की है।।
बापू ने कहा सुनिए! मैं कहता हूं तो याद रखना! मन को शुद्ध करके,मन को स्थिर करके सुना श्रोता का नहीं,लेकिन शुद्ध करके बोलो यह वक्ता की जिम्मेदारी है।।मन को शुद्ध करने में,वश करने में, स्थिर करने में समय मत बिगाड़ो।। एक विनय जरूर करूं मन लगाकर सुनो! मन का दान कथा को करो दशरथ के चार पुत्र वेदों के तत्व है और मानस की दृष्टि से जिनके तात्विक अर्थ है:ऐश्वर्य,शील,बल और परमारथ।।
भरत ऐश्वर्य है।प्रेम का ऐश्वर्य,असंगता,त्याग का ऐश्वर्य है।।शील शत्रुघ्न है।बल लक्ष्मण जी है और राम परमार्थ है।।
यहां इंद्र के पास बल है,ऐश्वर्य है लेकिन शील नहीं है इसलिए वेदों का इंद्र नहीं लेकिन भगवान को पकड़ना पड़ेगा।।देवता परमार्थी नहीं है।परमार्थ परायण इंद्र हमारा मंगल करता है।।दूसरा मंगल कर्ता नाम है:उष-सूर्य।अपने प्रकाश से,ऊर्जा से,सौर शक्ति से जागृत करता है,मंगल करता है।।लेकिन जब रावण दुनिया में आया तो सूर्य,चंद्र और अग्नि का महिमा कम हो गया!
कभी मुलाकात हो तो रावण से पूछना है:है दशानन! कभी नाम रुपी अग्नि को महिमा कम नहीं कर सकते। तुम्हारे प्रभाव से चंद्रमा तेज हीन हो सकता है मगर रामचंद्र कभी निस्तेज नहीं होंगे।। तीसरा अरिष्ट नेमी,गरुड़ का संकेत है।।गरुड़ महा ज्ञानी है, त्रिभुवन पति भगवान पीठ पर जब सवार होते हैं तब सामवेद का गान शुरू हो जाता है।।लेकिन एक गारुड़ी मंत्र है जो सांप का विष उतार देता है।। गारुड़ी मंत्र भुशुंडि जी के पास है जो भागवत कथा का गान करके विष को निकालते हैं।।गरुड़ परम वैष्णव है।।चौथा बृहस्पति गुरू है।। शायद इंद्र,सूर्य, गरुड़ मंगल नही कर पाए लेकिन गुरु,देवगुरु नहीं दिव्य गुरु,बुद्ध पुरुष हमारा मंगल करेगा ही।।इस प्रकार की प्रार्थना मेरे तलगाजरडी अर्थ में बैठी है।। धीरे-धीरे अस्तित्व हमारे अंदर उतरे वह नाम जप अंतर यात्रा है।।
कथा प्रवाह में विधि विध वंदनाओं के बाद सीताराम जी की वंदना और राम कार्य में समाविष्ट सभी की वंदना करते हुए तुलसी जी लिखते हैं:
कहु हनुमंत बिपत्ति प्रभु सोई।
जब तब सुमिरन भजन नही होइ।।
परमात्मा का स्मरण हम ना कर पाए वह सबसे बड़ी विपत्ति है।।इसी क्रम में बहुत बड़ा प्रकरण,नाम वंदना का,संक्षिप्त रूप में रखा गया है।।
भगवान के कई नाम में सब एक से एक अधिक है इनमें रामनाम की प्रथम वंदना करते हुए गोस्वामी जी ने ७२ पंक्ति राम नाम महिमा का गान किया।। सहस्त्रनाम में से सहज आ जाए वह पकड़ो रामचरितमानस रूपी सद्गुरु से मंत्र दीक्षा ले लो।।
कल की कथा मॉं कन्याकुमारी और आज की कथा मॉं शंकराम्बा-शंकराचार्य जी की मॉं के चरणो में समर्पित करते हूए नाम महिमा का गान करके आज की कथा को विराम दिया गया।।
== समाप्त ==

