Homeगुजरातमैं कभी सोउंगा नहीं, परमात्मा मुझे सदा जागृत रखेंगे-- मोरारीबापू

मैं कभी सोउंगा नहीं, परमात्मा मुझे सदा जागृत रखेंगे– मोरारीबापू

मानस सिन्दूर” कथा के दूसरे दिन प्रारम्भ में पूज्य बापू ने कहा कि तुलसीदासजी ने “जानकी मंगल” ग्रन्थ में ‘सिन्दूर’ शब्द का प्रयोग किया है, जबकि रामचरित मानस में ‘सेन्दूर’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ है कि तुलसीदासजी की साधना धारा, भजन धारा और जीवन धारा मानस रूपी गंगा है। इसका एक किनारा लोक को छूता है और दूसरा श्लोक (वेद) को! यहाँ लोकमत भी है और वेदमत भी। ‘सेन्दूर’ लोक के किनारे को छूने का प्रयास है और ‘सिन्दूर’ श्लोक अर्थात् वेद के किनारे को छूने का प्रयास है। यहाँ लोकमत वेद-घाट ​​में स्नान करता है, जबकि लोकमत लोक-घाट में स्नान करता है, लेकिन दोनों को ही मानस की गंगा में स्नान करना पड़ता है!

कथा के प्रारम्भ में बापू ने कहा कि ‘जानकी मंगल’ ग्रन्थ में सीतारामजी का विवाहोत्सव चल रहा है। उस समय तुलसीदासजी ने मातृ शरीर की तीन विशेषताएँ बताई हैं। माता जानकी शीलमयी, सुखमयी और शोभामयी हैं। मातृ शरीर की सबसे बड़ी विशेषता शील है। श्रोताओं को “सिंदूर” शब्द का अर्थ समझाते हुए पूज्य बापू ने कहा कि सिंदूर का पहला रूप यह है कि ये सौभाग्य का प्रतीक है। दूसरा, सिंदूर एक सोभाग्यवती स्त्री का श्रृंगार है। “मानस सिंदूर” कथा गाने का विचार व्यासपीठ को इसलिए आया, क्योंकि सिंदूर का एक अर्थ ‘साहस’ भी है, जिसे हमारे देश ने “ऑपरेशन सिंदूर” के नाम से कर दिखाया है। सती स्त्रियाँ साहसी होती हैं।

सिंदूर का एक अर्थ है – समर्पण, त्याग! जानकीजी का समर्पण, उनका त्याग, उनका बलिदान अद्वितीय है।
समर्पित व्यक्ति कभी शिकायत नहीं करता। शिकायत करने वाला मन कभी अध्यात्म की यात्रा नहीं कर सकता।
सिंदूर दर्शन में बापू ने आगे कहा कि सिंदूर श्रद्धा का प्रतीक है। विवाह में दूल्हा दुल्हन की मांग में पहली बार सिंदूर दान करता है, फिर पत्नी स्वयं प्रतिदिन अपनी मांग सिंदूर से भरती है। अर्थात् सिंदूर मांग पूर्ति का प्रतीक है, मांग की समाप्ति का प्रतीक है!

“मैंने तुम्हें पा लिया है, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए” – यही भावना है। संसार में हम अपनी मांग पूरी करना चाहते हैं, लेकिन अध्यात्म में “मांग समाप्त होना” – ऐसा ही सिंदूर का अर्थ है।

बापू ने कहा कि सिंदूर एक विचार का नाम है। समझदारी सिंदूर का रूप है। कुछ माताओं की समझ के आगे झुक जाने का मन करता है!

सिंदूर का एक अर्थ है – साधुता। साधु के पांच लक्षण होते हैं – पहला है स्वच्छता। साधु को बाहरी रूप से स्वच्छ रहना चाहिए। शरीर और वस्त्र की स्वच्छता आवश्यक है। दूसरा है आंतरिक शुद्धता। साधु में मन, बुद्धि और बुद्धि की निर्मलता होती है, यही उसकी आंतरिक शुद्धता होती है। तीसरा है – प्रसन्नता। साधु हमेशा प्रसन्न रहता है। शंकराचार्यजी महाराज कहते हैं कि प्रसन्नता से परमात्मा का साक्षात्कार होता है। साधु किसी भी स्थिति में प्रसन्न रह सकता है। आनंद हमारा स्थायी भाव है। चौथा तत्व है – स्वतंत्रता। पद, प्रतिष्ठा, पेसा – कुछ भी साधु को प्रभावित नहीं कर सकता। इसका अर्थ स्वच्छंदता नहीं है, लेकिन साधु कभी परतंत्र नहीं होता। साधु का पांचवां तत्व है – अनासक्ति। सभी से एक निश्चित दूरी, ताकि राग-द्वेष न पनपे। इसमें किसी की अवज्ञा नहीं है, लेकिन दूसरों के इरादे नहीं पता, इसलिए एक निश्चित दूरी बनाए रखना जरूरी है।

सिंदूर का एक रूप है – समर्पण। सिंदूर दान करने के बाद पत्नी की सरनेम बदल जाती है – पिता के नाम की जगह पत्नी के नाम के बाद पति का नाम जुड़ जाता है, उसका अपना नाम भी बदल जाता है! यही समर्पण है।

सिंदूर दान करना एक तरह का संन्यास है। अग्नि और ब्राह्मण की उपस्थिति में आभूषणों से सुसज्जित स्त्री सिंदूर दान करने के बाद मानो संन्यास ले लेती है! सिंदूर संध्या का प्रतीक है। जब सूर्य अस्त होता है, तो आकाश सिन्दूरमय हो जाता है।

सिन्दूर का एक अर्थ सेवा भी है। और सिन्दूर मांगी हुई सेवा भी नहीं है, बल्कि सद्गुरु द्वारा दी गई सेवा है, कृपा करें।

बापू ने “मानस सिन्दूर” के चिंतन में आगे बढ़ते हुए कहा कि विद्वान और विद्यावान में बहुत अंतर होता है। हनुमान चालीसा में श्री हनुमानजी विद्वान हैं, लेकिन वे विद्यावान भी हैं!

रावण विद्वान है, लेकिन विद्यावान नहीं है! रावण के दस मस्तक ही छह शास्त्र और चार वेद हैं, ऐसा साधु मत है। जगतगुरु कहते हैं कि जानकी ही शांति हैं और रावण ने जानकी का अपहरण किया है। उस विद्वता का क्या उपयोग जो दूसरों को अशांत करें ? श्री हनुमानजी विद्यावान हैं, इसलिए उन्होंने राम की खोई हुई शांति वापस ला दी है।

उपदेश देना सबसे छोटी सेवा है। बापू ने कहा कि आदेश सबसे अच्छी सेवा है और संदेश माध्यम सेवा है, लेकिन दूसरों को उपदेश देना तीसरे दर्जे की सेवा है। अगर कोई हमें उपदेश देता है, तो हमें उसे पकड लेना लेना चाहिए। हमें उपदेश देने वाले के पीछे नहीं भागना है। अगर हमने उपदेश पाया है, तो उसे प्रसाद समजकर सबको बांटना चाहिए। बुद्धपुरुष से आपको जो मिला है, उसका दूसरों को भी जागृत किजिए।

श्री हनुमानजी के संदर्भ में बापू ने कहा कि विद्यावान की वाणी में विवेक होता है। श्री हनुमानजी ने रावण को दुष्ट या मूर्ख नहीं कहा, बल्कि उसे “प्रभु” कहा! उन्होंने उसे “स्वामी” कहा! यह श्री हनुमानजी की शालीनता है। दूसरों के सामने दो तरह से हाथ जोड़े जाते हैं – एक भय से और दूसरा भाव से। हनुमानजी ने भय से नहीं, बल्कि भाव से रावण के विरुद्ध हाथ जोड़े है। सेवक के लिए सचराचर में राम हैं, इसलिए हनुमानजी रावण में भी राम को देखते हैं और उसे “प्रभु” कहते हैं।

आमतौर पर बापू कथा में अपने बारे में बात नहीं करते, लेकिन आज बापू ने कहा- “एक बात तो तय है कि मैं कभी नहीं सोऊंगा! प्रभु मुझे जगाए रखेंगे।”

शंकराचार्य भगवान कहते हैं कि जिसने अपनी अहंता और ममता मिटा दी है, जिसका मन विषय सुखों से विमुख हो गया है और जो आत्मनिष्ठ हो गया है, वह सोते हुए भी जागृत है। गीता में कहा गया है कि जिसका मन सभी संशयो से मुक्त हो गया है, वही जागा हुआ है। यहां हम आध्यात्मिक जागृति की बात कर रहे हैं। जब सभी विषयों में वैराग्य प्रकट हो जाता है, तब व्यक्ति जागा हुआ माना जाता है। विषय बाह्य है, वासना आंतरिक है। सुंदर चित्र देखना या किसी की सुंदरता को देखना इंद्रियों का विषय है। यह बाहरी घटना है, लेकिन वासना भीतर उठती है। विषय को देखने पर भी जिसके मन में वासना नहीं जगती, वही जागा हुआ है।

बापू ने कहा कि विश्वास श्रद्धा की मांग में सिंदूर भरता है, तब श्रद्धा और विश्वास के मिलन से जो तत्व प्रकट होता है, उसे “भरोसा” कहते हैं और भरोसा प्रकट होने के बाद कोई शिकायत नहीं रहती।

महाभारत के प्रसंग को छूते हुए पूज्य बापू ने कहा कि जब-जब कोई संकट आता है, तब भगवान वेद व्यास प्रकट होते हैं। व्यासजी हमारे चौबीस अवतारों में से एक हैं। जब हमारे जीवन में भी कोई विपत्ति या विपरीत परिस्थिति आती है, तब किसी न किसी रूप में परमात्मा हमें बचाने आ जाते हैं।

कथा के क्रम में आगे बढ़ते हुए पूज्य बापू ने सीतारामजी की वंदन करते हुए कहा कि तत्वत: सीता और राम एक ही हैं। इसके बाद तुलसीदासजी ने जगत की सबसे बेहतर, ऐसी बहत्तर पंक्तियों में राम नाम की महिमा का गान किया है। राम नाम एक महामंत्र है, गौप्य मंत्र है, बीज मंत्र है। राम ॐकार का पर्याय है, भगवान शंकर का महामंत्र राम है। नाम की महिमा गाते हुए बापू ने कहा कि जो कार्य भगवान राम ने त्रेता युग में किया, वही कार्य कलियुग में राम नाम के माध्यम से हो रहा है। सत्य युग में ध्यान से, त्रेता युग में यज्ञ से तथा द्वापर युग में पूजा-अर्चना से परब्रह्म की प्राप्ति होती थी। कलियुग में ध्यान, यज्ञ या पूजा न हो सके तो राम नाम ही एकमात्र आधार है। बापू ने कहा कि श्रद्धा से ज्ञान, विश्वास से भक्ति तथा भरोसे से भगवान की प्राप्ति होती है।

पूज्य बापू ने नाम महाराज की महिमा के गायन के साथ आज की कथा में अपनी वाणी को विराम दिया।
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आज की कथा में पूज्य बापू ने यह आत्म निवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा –
“मैं धरती पर सोता हूँ, यही मेरा वैभव है!
मैं भोजन में केवल दो-तीन चीजें ही खाता हूँ, यही मेरा वैभव है!। मैं किसी के घर जाकर अपने काष्ठ पात्र में भिक्षा माँगता हूँ, यही मेरा वैभव है!
मैं कभी किसी से एक पैसा भी नहीं लेता, जहाँ भी आवश्यकता होती है, मैं दे देता हूँ, यही मेरा वैभव है!
मैं अपना पूरा जीवन, निरंतर समाज को देता हूँ – यही मेरा वैभव है!
मैं गंगाजल पीता हूँ, यही मेरा वैभव है!
मैं हर उस व्यक्ति के पास जाता हूँ जो तकलीफ में है, यही मेरा वैभव है!
बापू ने कहा –
“बिना समझे साधु की निंदा मत करो। जो कुछ छिपाता है, वह साधु नहीं है। साधु केवल अपने भजन को छिपाता है, उसके पास छिपाने के लिए और कुछ नहीं है।

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