Homeगुजरातकथा मेरा प्राण है, मेरा प्राणवायु है, मेरा सब कुछ कथा है!

कथा मेरा प्राण है, मेरा प्राणवायु है, मेरा सब कुछ कथा है!

  • मैं ही कथा का वक्ता हूँ और मैं ही कथा का श्रोता भी हूँ।
  • राम सत्य हैं, भरत प्रेम हैं, मां जानकी करुणा हैं।

“मानस सिंदूर” राम कथा के पाँचवे दिन के संवाद में प्रवेश करते हुए पूज्य बापू ने एक जिज्ञासा के उत्तर में कहा कि प्रेम से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। फिर भी ज्ञान की महिमा अवश्य है। मानस में ज्ञान प्राप्ति के दो साधन बताए गए हैं – एक गुरु और दूसरा वैराग्य। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। ज्ञान पुस्तकों से प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन किताबी ज्ञान हमें एक हद तक हीं पहुंचा सकता है, जब कि वेद, पुराण, अगम और निगम हमें अनहद तक पहुंचा देंगे।

गुरुमुखी वाणी में इस कथन की व्याख्या करते हुए बापू ने कहा कि दादाजी ने समझाया था कि गुरु के मुख से ज्ञान मिलेगा और वह ज्ञान वैराग्य से पचेगा! परमात्मा को प्रतिष्ठा, पैसा या कर्म से नहीं पाया जा सकता। गुरु हमें परमात्मा की प्राप्ति करा सकते हैं। एक अर्थ में परमात्मा हमारे साथ है – हम स्वयं परमात्मा हैं! उसे पाने की बात नहीं है, उसे परखने की बात है। वेद कहते हैं “अहम ब्रह्मास्मि”। लेकिन हमें उसका अनुभव नहीं है। अगर हमें वैरागी गुरु मिले, तो हम ज्ञान को पचा सकते हैं। श्री हनुमानजी की बाल्यकाल की कथा याद दिलाते हुए बापू ने कहा कि श्री हनुमानजी सूर्य को अपने मुख में रखते हैं। लेकिन सूर्य सबके गुरु हैं, सूर्य ही ज्ञान है। हनुमानजी ने ज्ञान खाया पर उसे पचा नहीं पाए, इसलिए देवताओं की प्रार्थना पर उन्होंने जग कल्याण के लिए सूर्य का वमन कर दिया। कुछ लोग ज्ञान खाते हैं पर पचा नहीं पाते! इसलिए ज्ञान खाने का प्रश्न ही नहीं, ज्ञान पीने का है।

फिर कुमार अवस्था में श्री हनुमानजी ज्ञान प्राप्त करने के लिए सूर्यदेव के पास जाते हैं। उस समय वे खाने नहीं, पाने के लिए जाते है। सूर्यदेव हनुमानजी से दूर रहना चाहते हैं। इसलिए वे तर्क देते हैं कि मैं गतिमान हूं, इसलिए मैं तुम्हें ज्ञान नहीं दे सकता। हनुमानजी कहते हैं कि मैं आपके साथ-साथ चलूंगा। तब सूर्यदेव कहते हैं कि गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए सम्मुख होना आवश्यक है। तब हनुमानजी उल्टे पेर चलते हुए भी गुरु से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा प्रकट करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि हमारे कदम भले ही संसार की ओर हों, पर हमारी दृष्टि गुरु के मुख की ओर होनी चाहिए! वक्ता और श्रोता दोनों ही ज्ञान निधि हैं। मानस के अनुसार श्रोता सुमति, सुशील, शुचिवान, रसिक और दास्यभाव वाला होना चाहिए। वक्ता को ऐसे अधिकारी श्रोता के सामने बोलना अच्छा लगता है। यदि ऐसा श्रोता कुछ समय बाद उपस्थित न हो, तो वक्ता को उसकी अनुपस्थिति खलती है। इसीलिए तुलसीदासजी ने किसी और को नहीं, बल्कि अपने मन को ही श्रोता बनाया है और कबीरजी ने साधु को श्रोता बनाया है।

ग्रंथ का महत्व है, लेकिन ग्रंथ के साथ गुरु भी होना चाहिए, जो शास्त्र का रहस्य खोल दें। गुरु के  समझाने के बाद ग्रंथ छूट जाएगा। बापू ने यहां सूत्रपात करते हुए कहा कि यदि ज्ञान आ जाए और त्याग न आए, तो उस ज्ञान का क्या फायदा?

प्रशंसा का अमृत पीने वाला अमर नहीं होता, लेकिन निंदा का गरल पीने वाला साधु अमर हो जाता है!

साधु की महिमा बहुत बड़ी है। भगवान आवश्यकता पड़ने पर अवतार लेते हैं, लेकिन साधु तो होता ही है! बस, उसे पहचान लेना चाहिए!

मानस में सात व्यक्ति सोलह बातों से पूर्ण  हैं। भगवान राम में सोलह शील हैं, भगवान कृष्ण में सोलह कलाएँ हैं, भगवान शंकर में सोलह रस हैं, श्री हनुमानजी में सोलह विद्या हैं, श्री भरतजी में सोलह लक्षण हैं, माता जानकी और माता पार्वतीजी में सोलह ऊर्जा हैं। सातवें हैं- भगवान महाकाल के मंदिर में विराजमान काकभुषण्डिजी के गुरु परम साधु, जिन पर महाकाल की भस्म का सिंदूर का तिलक है।

भगवान राम में सोलह शील हैं। जब वे माता जानकी को सिंदूर दान करते हैं, तो उनके सोलह शील माता जानकी की ऊर्जा में समाहित हो जाते हैं। इसी प्रकार हनुमानजी ने तो पूरे शरीर पर सिंदूर लगाया है, लेकिन जब रामजी श्री हनुमानजी के माथे पर सिंदूर का तिलक लगाते हैं, तो राम के सोलह शील हनुमानजी में समाहित हो जाते हैं। भरत ऐसे परोपकारी संत हैं, जिन्होंने हमें सत्य, प्रेम और करुणा से परिचित कराया है! जब रामजी भरतजी को तिलक लगाते हैं, तो वे भी सोलह शील वाले बन जाते हैं। जब शिवजी माता पार्वतीजी को सिंदूर दान करते हैं, तो उनके सोलह रस माता पार्वतीजी में समाहित हो जाते हैं।

हर माँ करुणा की प्रतिमूर्ति होती है! गुरु एक माँ भी है, अगर आप गुरु को उस रूप में देखेंगे तो आपको गुरु की करुणा का विशेष अनुभव होगा!

मन में सोलह श्रृंगार धारण करने वाले सातवें व्यक्ति काकभुशंडिजी के गुरु परम साधु हैं, जो महाकाल के मंदिर में विराजमान हैं। कागभुशंडि की कथा है कि जब उनके गुरु महाकाल के मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो भुषण्डिजी खड़े होकर उन्हें प्रणाम नहीं करते। इस प्रकार वे गुरु अपराध कर बैठते हैं। उस घटना से गुरु को तो क्रोध नहीं आता, परंतु भगवान महाकाल भुषण्डिजी को भयंकर श्राप दे देते हैं। हाहाकार मच जाता है, परंतु सबसे बड़ा हाहाकार गुरु के हृदय में होता है। वे महादेव से भुषण्डिजी को उनके अपराध के लिए क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं। परम साधु रुद्राष्टक का पाठ करते हैं, ताकि भुषण्डिजी को क्षमा मिल जाए। रुद्राष्टक की वे सोलह पंक्तियां परम साधु का सिंदूरी शृंगार हैं। गुरु के रुद्राष्टक के पाठ से भगवान महाकाल प्रसन्न होते हैं और परम साधु की की विनति पर शिवजी भुषण्डिजी को क्षमा कर देते हैं। परंतु शिष्य को श्राप मिलने के कारण गुरु के हृदय से जो चीख उठी, उसके बदले में माता पार्वतीजी के कहने पर भगवान शिव अपने शरीर से भस्म लेकर परम गुरु के भाल पर लगाने जाते हैं। तब पार्वतीजी अपनी मांग का सिंदूर भगवान शंकर को देती हैं और भगवती की करुणा का, भगवती की पूर्णता का सिंदूर लेकर परम साधु के भाल पर भगवान  तिलक लगाते है, और उसे शृंगरित करते है, यही इस कथा का गुरुमुखी रहस्य है। पूज्य बापू ने कहा कि मैं ही वक्ता हूं और मैं ही अपनी कथा का श्रोता हूं! मैं ही कथा कहता हूं और मैं ही कथा सुनता हूं। यह मेरा घमंड नहीं है। मैं कथा के आनंद से क्यों वंचित रहूं? इसलिए मैं ही वक्ता हूं, मैं ही श्रोता हूं। मैं ही वाचक हूं, मैं ही मुझे पढ़ रहा हूं!

कथा के सिंदूर दर्शन में पूज्य बापू ने कल की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि माता जानकी की मांग में सिंदूर भरने वाला हाथ सांप जैसे आकार में दिखता है। यहां भगवान राम के हाथ को ‘अहि’ – साँप की उपमा दी गई है। साँप ने सोचा कि माता सीता का मुख चाँद जैसा है, और उसका अमृत पीकर मैं जन्म-जन्मान्तर के विष से कुछ मुक्ति पा सकता हूँ! बापू ने कहा कि यहाँ अहि का दूसरा अर्थ सूर्य है। राम सूर्य हैं, जानकी धरती हैं। और धरती पर कमल खिलता है, और उसके पराग से चाँद जैसा मुख वाली माता जानकी की माँग में भगवान राम का सूर्य जैसा हाथ सिंदूर भरता है।

कथा के क्रम में प्रवेश करते हुए पूज्य बापू ने नामकरण संस्कार, चारों भाइयों के नामों का तात्विक सात्विक अर्थ, शिव का बाल राम को देखने के लिए ज्योतिषी के रूप में भुषंडीजी के साथ अयोध्या जाना , गुरु वशिष्ठ द्वारा नामकरण, भगवान राम की बाल लीला का वर्णन, विद्या प्राप्ति के बाद भगवान विश्वामित्रजी का आगमन और यज्ञ की रक्षा हेतु राम और लक्ष्मण की मांग, ताड़का वध के साथ भगवान के अवतार कार्य का आरंभ , राक्षसों का निर्वाण और यज्ञ की रक्षा, धनुष्य यज्ञ के लिए जनकपुरी जाते समय गौतम आश्रम में अहिल्या का उद्धार, जनकपुरी में सुंदर सदन में राम और लक्ष्मण का विश्वामित्रजी के साथ भोजन और विश्राम तक,  कथा को पहूंचाकर, पूज्य बापू ने आज के संवाद को विराम दिया।

बॉक्स आइटम – 1

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– परम संत का स्मरण मोक्ष प्रदान करता है।

– यदि क्षण भर के लिए भी स्वरूप अनुसंधान छूट जाए, तो वह साधक का प्रमाद है।

– जब गुरु आश्रित को तिलक, छाप, माला और पादुका देते हैं, तभी उसकी महिमा है।

– बच्चों में भी आत्मा होती है, उसका सम्मान करें। उस पर दबाव न डालें, उसकी इच्छा को समझें।

– पुस्तकों का ज्ञान आपको एक हद तक ले जा सकता है, जबकि वेदों और शास्त्रों का ज्ञान आपको अनहद तक ले जाता है!

– सत्य चांदी है, वह श्वेत – धवल – उज्वल, प्रेम सोना है और करुणा हीरा-मोती है।

 

– जब साधक के जीवन में राम प्रकट होते हैं, तब उसके जीवन से मोहरात्रि समाप्त हो जाती है।

बॉक्स आइटम – 2

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परमात्मा द्वारा माँ दुर्गा के सिंदूर से अभिषिक्त किए गए सिंदूरी साधु में सोलह गुण होते हैं।

(1)  धर्म शील (2) सत्यशील (3) करुणाशील (4) कर्मशील (5) मौन शील (6) प्रेम शील (7) स्वीकार शील (8) विचारशील (9) सुखशील (10) बलशील (11) स्मरणशील (12) विस्मरणशील (13) सेवाशील (14) विनयशील (15) वचनशील (16) धैर्यशील

बॉक्स आइटम – 3

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पूज्य मोरारीबापू की रामकथा ज्ञान यज्ञ नहीं, प्रेम यज्ञ है। यहाँ श्रोता अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं। आज बापू ने उन सभी का – एक बालिका, एक दिव्यांग युवक, तीन अन्य युवक, दो बुजुर्ग, तथा दो दम्पति के प्रेम को देखकर उन्हें मंच पर बुलायें, राम नामी दीऔर इस प्रकार उन्हें आशीर्वाद का प्रसाद दिया।

 

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