
कोई पद,कोई स्थान हम छोड़ दे वह चरण का वैराग्य है।
राम साक्षात धर्म मूर्ति है।।
सीता भक्ति मूर्ति है और लक्ष्मण वैराग्य मूर्ति है।।
अकेले किसी कोने में बैठकर सोचना भी बंद हो जाए वह मन का वैराग्य है।।
सब जानने की कोशिश कम हो जाए वह बुद्धि का वैराग्य है।।
सब जगह से चित हटके एक ही जगह चिंतन रहे वो चित का वैराग्य है।।
वैराग्य रसिक होना चाहिये।।
सबसे बैरागी हमारी आत्मा होती है।।
स्वर्ग और नरक सापेक्ष है,अनुराग विराग भी सापेक्ष है।।
सात प्रवाह में बहने से कोइअनुविरागी ही हमें बचाएगा।।
सब से बडा विरागी हमारे शरीर में जीतने अंग है वो कभी न कभी विरागी बनते है ऐसा कहते हुए आठवें दिन की कथा का बापू ने पोलैंड से आरंभ किया।।
हाथ में पकड़ रखा है कभी जरूरतमंदों को दे दे वह हाथ का वैराग्य है।।कोई पद,कोई स्थान हम छोड़ दे वह चरण का वैराग्य है। हमारी नासिका दुर्गंध और सुगंध सबको ग्रहण करती है। योगी की नासिक का सुगंध और दुर्गंध से मुक्त होती है वो नासिक का वैराग्य है।।लक्ष्मण जैसा बैरागी सूर्पणखा के नाक कान काटकर वैराग्य प्रदान करता है।।
सन्यासी साधू संन्यास की दीक्षा देगा। वैष्णवी साधु वैष्णवी दीक्षा।। बौध साधु होगा वह बौद्ध की दीक्षा देगा ऐसे ही वैराग्य वाले साधु वैराग्य की दीक्षा देगा! किसी ने यह भी पूछा भरत धर्म के सार है, महादेव धर्म का मूल है।।राम क्या है? रामोविग्रहवानधर्मो राम साक्षात धर्म मूर्ति है। सीता भक्ति मूर्ति है और लक्ष्मण वैराग्य मूर्ति है।। बैरागी वैराग्य की ही दीक्षा देगा।।
सन्यासी अग्नि और स्त्री से दूर रहना ऐसा व्रत होता है। लेकिन बैरागी छहों धूनी को तप्तेहै।।प्रतिबंध नहीं होता।।वैरागी साधु को कोई कुछ देगा तो वह ले लेगा लेकिन शाम तक किसी न किसी को वह दे देगा!वैरागी साधु का अग्नि की सप्त जीह्वा का मर्मग्य बन जाता है।
शरीर में जितने अंग है वह थोड़े बहुत मात्रा में बैरागी है।।कभीजीह्वा रस छोड़ती है वह जीह्वा का वैराग्य है।।धीरे-धीरे आदमी बोलना कम कर देता है को जीभ का वैराग्य है।।बैरागी साधु मितभोगी होता है वह पेट का वैराग्य है।।अकेले किसी कोने में बैठकर सोचना भी बंद हो जाए वह मन का वैराग्य है।। सब जानने की कोशिश कम हो जाए वह बुद्धि का वैराग्य है।।सब जगह से चित हटके एक ही जगह चिंतन रहे वो चित का वैराग्य है।। और मैं मैं करने जैसा मुझ में कुछ नहीं वह अहंकार का वैराग्य है।
मैना ने मैं ना कहा तो मोल भयो दस बीस।
बकरी ने रात दिन में में किया कबीरा कटा शीश।। सबसे बैरागी हमारी आत्मा होती है।। आत्मा में जीवन छू जाता है तब वह संसारी है और जीवात्मा कहलाता है।। वही आत्मा किसी परम को छू लेता है वह परमात्मा बन जाता है!
याज्ञवल्क्य और जनक का संवाद चला। जनक पूछते हैं की सबसे बड़ी प्रकाश ज्योति कौन सी है जहां सब काम करते हैं? तो याज्ञवल्क्य ने कहा सूर्य के प्रकाश में।जब सूरज नहीं तो किस प्रकास में बैठता है? चंद्र के प्रकाश में। चंद्रमा ना हो तो? अग्नि के प्रकाश में। अग्नि की ज्योति ना हो तो वाणी के प्रकाश में।वाणी भी मौन हो तो?आत्म ज्योति के प्रकाश में और आत्म प्रकाश भेद दोष मिटा देता है।। आत्मा परम बैरागी है।।
स्वर्ग से सीधा मृत्यु लोक आने वाला आदमी के लक्षण चाणक्य ने बताएं: वह दान बहुत करेगा। वाणी मधुर होती है।देवों का अर्चन और ब्राह्मण लोगों को संतुष्ट करता है।।
और जो नरक से आया है वह अत्यंत क्रोध करता है वाणी में कटुता होती है। विचारों का गरीब होता है। और स्वजनों से वैर रखता है। हल्के लोगों के साथ उठता बैठता है और कुल हीनों की सेवा करता है।। स्वर्ग और नरक सापेक्ष है।। अनुराग विराग भी सापेक्ष है।।
सरग नरक अनुराग बिरागा।
निगमागम गुण दोष बिभागा।।
जिसमें विराग होगा नीचे देखो तो अनुराग होगा।। ऐसा नाचता, हंसता, कुदत और गाता वैराग्य नारद के प्रेम के छह सूत्र है,वह वैराग्य को भी लागू करते हैं।। इसलिए बापू ने कहा कि वह अनुराग विराग को में अनु वैराग्य नाम देता हूं।।
यहां ऐसे अनुविरागी की जरूरत है जो सात प्रवाह को खींचता है:जैसे काल का प्रवाह, युग प्रवाह, अपना प्रवाह,परिवार का प्रवाह,धर्म प्रवाह और राष्ट्र प्रवाह से अनुविराग ही हमें बचाएगा।।नवधा भक्ति अरण्य कॉंड में कथा बही।।

