
प्रवर्षण पर्वत, कर्नाटक, 30 अक्टूबर: पूज्य मोरारी बापू की ऐतिहासिक मानस रामयात्रा के छठे दिन की कथा कर्नाटक के प्रवर्षण पर्वत पर संपन्न हुई, जहां भगवान श्रीराम ने वर्षा ऋतु में चातुर्मास किया था। बापू ने आज की कथा में कहा कि कलियुग के प्रभाव के बीच हमें भी एक नए प्रकार का चातुर्मास करना चाहिए जिसमें चार सूत्र हों: समास, अमास, कुमाश और क्षमाश।
बापू ने बताया कि समास का अर्थ है समाज में सभी के साथ जुड़ना और एकता बनाना। अमास का अर्थ है हर दिन दीवाली की तरह उजियारा फैलाना। कुमाश का तात्पर्य है विनम्रता, शालीनता और कोमलता को बनाए रखना, और क्षमाश का अर्थ है क्षमा की भावना से जीवन जीना।
उन्होंने कहा कि “यदि ये चार गुण जीवन में आ जाएं, तो आत्मज्योति सदैव जागृत रहती है।”
बापू ने कहा कि परम तत्व से संवाद के लिए अंतःकरण का शुद्ध होना आवश्यक है, क्योंकि जब मन निर्मल होता है, तभी आत्मिक संवाद होता है। उन्होंने बुद्ध और महावीर स्वामी की शिक्षाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि सच्चे साधु का हृदय सभी मतों का आदर करता है।
आज की कथा में बापू ने भगवान बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र का उल्लेख करते हुए कहा, “निंदा हमेशा पीछे से होती है, और वंदन साक्षात् सामने से।”
कथा जामवंत, सुग्रीव, वाली, अंगद, तारा और हनुमानजी को समर्पित रही। यात्रा अब रेलमार्ग से तमिलनाडु के रामेश्वरम के लिए अग्रसर होगी।
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पूरे भारत को जोड़ने की नई कथा यात्रा का मनोरथ
पूज्य बापू ने कहा कि इस कथा यात्रा के माध्यम से पूरे भारत को जोड़ने का संकल्प है। इससे पहले भी उन्होंने मानस-९०० द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के रूप में एक रेलयात्रा की थी। बापू ने कहा कि अब उनका मनोरथ है उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत को जोड़ने वाली एक यात्रा का।
उन्होंने कहा कि ऐसी एक यात्रा कन्याकुमारी से शुरू होकर आदि शंकराचार्य के जन्मस्थल कालडी और कश्मीर होते हुए केदारनाथ तक जा सकती है, और दूसरी यात्रा पूर्व में जगन्नाथपुरी से द्वारका तक हो सकती है, जिससे चारों पीठों का समावेश हो जाएगा। बापू ने कहा कि इस तरह की यात्रा पूरे देश को ‘स्वस्तिकमय’ बनाने का माध्यम बनेगी।

