*”मेरी अध्यक्षता में मेरी माया सब कुछ करती है मैं अकर्ता हूं, मैं कुछ नहीं करता।।”*
*यहां कोई अध्यक्ष है वह सब करता है यह,बोध को कभी नहीं भूलना,बोध समझ से कई ऊंचा शब्द है।*
*अक्रिय को सक्रिय करने वाला तत्व रघुपति है।।*
*यह सब किसी के होने से हो रहा है।।*
*हम और आप अपने पैर से नहीं आए किसी के चरण हमें यहां ले आए हैं,हम विकलांग है पंगु है।*
*रामचरितमानस स्वयं त्रिपति है।।*
*स्वयं श्रीदेवी है,स्वयं भूदेवी है और स्वयं यह रमादेवी है।।*
*बीज पंक्तियां*
*श्रीपति निज माया तब प्रेरी।*
*सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।*
*-बालकाण्ड,दोहा क्रमांक-128,चौपाई संख्या-8*
*राम रमापति कर धनु लेहू।*
*खैंचहु मिटै मोर संदेहू।।*
*-बालकाण्ड,दोहा क्रमांक-283,चौपाई संख्या-7*
*भूमि सप्त सागर मेखला।*
*एक भूप रघुपति कोसला।।*
*-उत्तरकाण्ड,दोहा क्रमांक-21,चौपाई संख्या-1*
इन बीज पंक्तियों के गान के बाद कथा के विराम दिन पर उपसंहारक बातें करते हुए संपूर्ण आयोजन से प्रसन्न बापु ने मनोरथी परिवार और सब के लिये अपना साधुभाव व्यक्त करते हुए खुश रहने के आशीर्वचन कहे।
श्रीमद भागवत जी से प्रहलाद जी सेवा के छ अंग कहते है वह श्लोक का गान किया:
*तत् तेरहत नम: स्तुति कर्म पूजा कर्मा।*
*श्रुतिचरणै श्रवणं कथायां समसेवया।*
*स्मृतिचरणौ त्वचि विनेति षडग्यां।*
*किम् भक्ति जन: परमाहंसगति लभेत्।*
बापू ने बताया की बातों-बातों में दिन चले गए!यह श्लोक का अनुसंधान करते हुए कहा:गीता में भगवान कहते हैं मेरी अध्यक्षता में मेरी माया सब कुछ करती है मैं अकर्ता हूं, मैं कुछ नहीं करता।।जैसे कोई बंधारण का कोई मुख्य आदमी कुछ करता नहीं,कमीटी सब कुछ करती है।लेकिन अध्यक्ष का होना ही पर्याप्त है।।श्रीपति निज माया निज प्रेरी। भगवान की अध्यक्षता में पूरी प्रकृति काम करती है।भूदेवी,लक्ष्मी देवी,श्रीदेवी का एक पति जिसे हम रमापति या स्वयं नारायण कहते हैं ऐसे ही रामचरितमानस में इस पति को हम रघुपति कहते हैं।।उनकी अध्यक्षता में तीनों माया काम करती है।।यहां कोई अध्यक्ष है वह सब करता है यह बोध को कभी नहीं भूलना,बोध समझ से कई ऊंचा शब्द है।।अक्रिय को सक्रिय करने वाला तत्व रघुपति है।।यहां की भाषा में श्रीपति भूपति रमापति नारायण है। यह सब किसी के होने से हो रहा है। अभी यहां कोई कुछ करता नहीं यह सब कुछ हो रहा है।। यहां कोई केवल होकर के हमसे करवाता है।।
खलील जिब्रान तो कहते हैं कोई मां-बाप ने बच्चों को जन्म नहीं दिया,बालक मां-बाप के द्वारा आया है इस भाव में अहंकार गलत होने लगता है और बोध शब्द दर्ढ होने लगता है। यह मंत्र श्रीमद् भागवत का है जो प्रह्लाद जी कहते हैं जहां 6 वस्तु ना हो तो बड़े-बड़े परमहंस को भी मुक्ति दुर्लभ होती है। मुक्ति से वंचित रह जाते है
यह छह अंगों में पहला:नमः-नमस्कार करना सीख जाए।।नमस्कार में नमस्ते का एक अर्थ यह भी निकला है नमक। और नमक का भाव होना चाहिए नमक जिसमें भी डालो गल जाता है और अपना स्वभाव भी दे देता है।।सर झुकाना हार कूबूल करना है। हम हारे हैं।।प्रकृति सब कर रही है,श्री कहो भूमा कहो या रमा कहो।। घर में केवल एक बाप बैठा है तो सब कुछ बराबर चलने लगता है।। सेवा के 6 अंगों में दूसरा है:स्तुति-गुण के प्रति आदर करना।। तीसरा कर्म है। कर्म करके तुरंत कृष्णार्पण करते हैं तो कर्म का अहंकार नहीं आता। हर कर्म समर्पण हो जाता है।।चौथ है:पूजा-प्रभु के जो है उसके प्रति पूज्य भाव रखना।। पांचवा:परमात्मा के चरणों की स्मृति कायम रखें। मोहे लागी रटन इन चरणन की मुख देखने में माया लगती है,चरण में लगन लगती है छठ्ठा: प्रभु कथा का श्रवण।श्रवण से अभिमान गलता है।।कथा में छहो अंग सिद्ध होता है।। हम और आप अपने पैर से नहीं आए किसी के चरण हमें यहां ले आए हैं। हम विकलांग है पंगु है। यह छ नहीं होते तो परमहंस को भी गति नहीं मिलती। यह षडांग सूत्र जीवन में लाना है।।
रामचरितमानस स्वयं त्रिपति है। बहुत बार श्री शब्द आया है। स्वयं श्रीदेवी है,स्वयं भूदेवी है और स्वयं यह रमादेवी है।।
युद्ध अनिवार्य हुआ। युद्ध की कथा के बाद रावण को निर्वाण पद देकर पुष्पक आरूढ़ होकर सीताराम जी के साथ सब अयोध्या आए। और वशिष्ठ जी के कर कमल से राम के भाल में राज तिलक हुआ।। फिर भूसुंडी का चरित्र और गरुड़ के सात प्रश्नों के बाद उत्तरकॉंड का समापन हुआ।।और पूरी कथा भगवान तिरुपति के चरणों में अर्पण करके बापू ने इस कथा का समापन किया।।
अगली-९७०वीं रामकथा ञुषी ञुष्यश्रृंग आश्रम लखीसराय-बिहार से ३ से ११ जनवरी के दरमियान शुरु होने जा रही है।।ये कथा अपने नियत नियमित भारतीय समय अनुसार पहले दिन शाम ४ बजे और बाकी के दिनों में सुबह १० बजे से आस्था टीवी चेनल एवं चित्रकूटधाम तलगाजरडा यु-ट्युब चेनल से प्रसारित होगी।।
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