बुद्धपुरुष की चेतना कालाातित होती है।।
कथा पंचाग्नि है।।
रामायण स्वयं मातृ स्वरूपा है,रामायण मैया है।
हमारी संस्कृति पुरुषवाचक नहीं प्रकृति वाचक है।
यज्ञ केवल कर्मकांड ना बने,पूरी संवेदना होनी चाहिए।
जब यज्ञ में कर्मकांड ज्यादा आ गया तब बलि प्रथा यज्ञ में घुस गई है।।
राम नाम भी है,राम महामंत्र है और रामनाम औषधि भी है।।
नाम का नशा जनम जनम रहता है।।
शृंगी रिषि के ञुष्यशृंग आश्रम की भूमि लखीसराय से प्रवाहित रामकथा के दूसरे दिन की कथा में प्रवेश करते हुए छोटी बड़ी जिज्ञासा आई थी वह लेते हुए बापू ने कहा कि यदि प्रेम का संबंध निर्गुण से हो, प्यार का संबंध सगुन से हो तो हमें अपनी पत्नी से प्रेम करना चाहिए या प्यार करना चाहिए! बापू ने कहा कि प्रेम और प्यार दोनों छोड़ो पत्नी को आदर और सम्मान देना चाहिए।।रामचरितमानस और व्यास पीठ का मूल्यांकन कभी नहीं हो सकता। इतनी सालों से गा रहा हूं लेकिन लगता है कि अभी मैं मानस में प्रवेश भी नहीं किया।।मंगलाचरण चल रहा है।।हमारी बुद्धि सीमित है।कथा का आरंभ लिखा है लेकिन अंत कहीं नहीं लिखा।बुद्धपुरुष की चेतना कालाातीत होती है।।कथापंचाग्नी है जैसे अयोध्या के महात्मा पंचधुनि तपते हैं। पांच भौतिक शरीर को जितनी मात्रा में ठंड लगती चाहिए उतनी मात्रा में नहीं लगती क्योंकि कथा अग्नि है। कथा विवेक अग्नि है और कथा वियोग अग्नि भी है वह विरह प्रदान करती है।।कथा में हनुमान जी है हनुमान हनुमंत अग्नि भी है।।चौथा गुरु साक्षात यज्ञ है, यज्ञ पुरुष है इसलिए गुरु की अग्नि भी है और कथा ज्ञान अग्नि भी है।।शृंगी बोलते हैं इसलिए उसे बुलाए। यज्ञ में बोलने वाला चाहिए,यजमान चुप रहता है।। शुंग का एक अर्थ होता है सिंग। शिखर भी हम कह सकते हैं जैसे गिरी सिंग कहते हैं।। तात्विक अर्थ बताते हुए कहा कि यह श्रृंग की स्थिति गीता की स्थित प्रज्ञ अवस्था है।।जिसकी बुद्धि इतनी ऊंचाई पर आकर मेधा से भी आखरी प्रज्ञा तक पहुंच चुकी है।। प्रज्ञा शिखरस्त है। पशु का पूंछ कोमल और शिंग कठोर होता है।। यह श्रृंग दृढ़ बुद्धि का प्रतीक है। श्रृंगी ऋषि स्त्रियों को जानते भी नहीं थे। यदि वशिष्ठ ने उसे बुलाया नहीं होता तो कभी पता भी नहीं लगता रामायण स्वयं मातृ स्वरूपा है। वह भी उन्हें पता नहीं चलता। हमारी संस्कृति पुरुषवाचक नहीं प्रकृति वाचक है। मानस मातृ स्वरूप है। रामायण मैया है। वेद भी श्रुति,भागवत भी, गीता, रुचा भी मातृ स्वरूप है।।रामचरितमानस के हर एक कांड में मातृ प्रधानता ज्यादा है।वाणी, भवानी,सीता,मैना,कैकयी,सुमित्रा,कौशल्या,जानकी सुनयना,विश्व मोहिनी,माया,तड़का,अहल्या आदि की अपनी खास जगह है।।हर कांड में मातृ स्वरूप ज्यादा दिखते हैं।अनसूया पतिव्रता है, शबरी गुरु व्रता है,सूर्पनखा काम व्रता है। किष्किंधा कांड में स्वयं प्रभा, तारा और पांच सतियों में जिनकी गणना होती है उनमें से चार रामायण में है! केवल द्रौपदी महाभारत में है।। सिंहीका,मंदोदरी,सुरसा सब है। श्रृंगी स्त्रियों से दूर रहे। बोले तब ऋषि और चुप रहे तब वह मुनी है।। एक ऐसी भी मान्यता थी कि पुत्र काम यज्ञ केवल श्रृंगी ऋषि ही कर सकते थे। जैसे सोम यज्ञ अग्निहोत्री ही कर सकते हैं। यज्ञ केवल कर्मकांड ना बने,पूरी संवेदना होनी चाहिए। जब कर्मकांड ज्यादा आ गया तब बलि प्रथा यज्ञ में घुस गई है। मंत्र बोलकर किसी को काटे यह सफलता नहीं लेकिन मंत्र बोलकर मृतक जीवित हो जाए वह सफलता है।।
अग्नि देव के हाथ में कलश है खीर लेकर प्रगट हुए हैं तब कहा कि आपने थोड़ा सोचा है लेकिन सब कुछ सकल सफल होगा। हमारे हृदय में राम प्रकट कराने के लिए यह प्रक्रिया आवश्यक है।।
हनुमंत वंदना के बाद सिता राम जी की वंदना की।।हनुमान को तेल नहि तुलसी ने स्नेह चडायाहै।।फिररामनाम की ७२ पंक्तियों में भरी नाम वंदना का प्रकरण गाया गया।।राम नाम भी है,राम महामंत्र है और रामनाम औषधि भी है।।नाम का नशा जनम जनम रहता है।।
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