
मुंबई | 12 फरवरी 2026 — संदीप खन्ना और मनीष सभरवाल द्वारा लिखित मेड इन इंडिया तीन असाधारण यात्राओं को सामने रखती है—भारत के फार्मा उद्योग का उदय, ल्यूपिन की स्थापना और विकास, तथा उसके संस्थापक देशबंधु गुप्ता का प्रेरक जीवन। ये तीनों यात्राएँ मिलकर यह स्पष्ट करती हैं कि कैसे एक समय आयातित दवाओं पर पूरी तरह निर्भर देश आज “दुनिया की फार्मेसी” बन गया। यह पुस्तक बताती है कि किस तरह कठिन परिस्थितियों में पला-बढ़ा, बिना किसी विशेषाधिकार या संरक्षण के जीवन शुरू करने वाला एक व्यक्ति, शुरुआती संघर्षों से प्रेरित होकर अदम्य भूख और जज़्बा विकसित करता है। उसी जज़्बे के दम पर वह एक कठोर व्यवस्था के बीच रास्ता बनाता है, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं और वैश्विक मानकों का संतुलन साधता है, और अंततः एक मल्टी बिलियन -डॉलर का ऐसा उद्यम खड़ा करता है, जिसकी दवाएँ आज 120 से अधिक देशों में मरीजों तक पहुँच रही हैं।
‘मेड इन इंडिया’ राजस्थान के एक गाँव से निकले उस युवक की लंबी यात्रा को दर्शाती है, जो आगे चलकर शिक्षक, प्रोफेसर और फार्मा उद्योग में कर्मचारी बना, और अंततः 10 अरब डॉलर मूल्य की कंपनी का संस्थापक बना। यह उस असंभव-से दिखने वाले उद्यमी की कहानी है, जिसने अपने आदर्शों और परिस्थितियों के बावजूद व्यवस्था से टकराने का साहस किया, शिक्षण और फार्मा की नौकरियाँ छोड़ीं, और एक सफल कंपनी की नींव रखी। यह पुस्तक बताती है कि कैसे उन्होंने एक विश्व-स्तरीय उद्योग को पंख दिए और एक राष्ट्र के लिए व्यावसायिक आइकन के रूप में उभरा।
टीमलीज़ सर्विसेज़ के सह-संस्थापक मनीष सभरवाल और पत्रकार संदीप खन्ना द्वारा पूरी ईमानदारी के साथ लिखी गई यह पुस्तक दुनिया की सबसे बड़ी जेनेरिक दवा कंपनियों में से एक के निर्माण की कहानी कहती है, जहाँ उपलब्धियों और सफलता के साथ-साथ असफलताओं, वित्तीय संकटों और नेतृत्व की व्यक्तिगत कीमत का भी बेबाक सामना किया गया है। यह उद्यमिता का एक ऐसा सशक्त और आकर्षक चित्रण है, जिसमें कोई मिथक-निर्माण नहीं, बल्कि यह दिखाया गया है कि संस्थाएँ कैसे धीरे-धीरे बनती हैं, कठिन परीक्षाओं से गुजरती हैं और दृढ़ संकल्प के साथ दोबारा खड़ी होती हैं। ‘मेड इन इंडिया’ जीवंत किस्सों के माध्यम से देशबंधु गुप्ता के एक साधारण प्रोफेसर से फार्मा उद्योग के दिग्गज बनने के सफर को पिरोती है, जहाँ उन्होंने लोगों की अधूरी जरूरतों को पूरा करने में अपना वास्तविक उद्देश्य पाया। यह पुस्तक भावी नेताओं के लिए एक सशक्त आह्वान है, जो दूरदर्शी उद्यमिता की उनकी यात्रा को सामने रखती है, असफलताओं से उबरकर कच्चे साहस और अडिग विश्वास के साथ आगे बढ़ने की मिसाल।
‘मेड इन इंडिया’ ल्यूपिन के निर्माण के दौरान आई चुनौतियों और सफलताओं के बीच देशबंधु गुप्ता की पत्नी मंजू गुप्ता की निर्णायक भूमिका को भी रेखांकित करती है। यह पुस्तक दिखाती है कि किस तरह इस दंपती ने साथ मिलकर न केवल एक वैश्विक फार्मा कंपनी को आकार दिया, बल्कि सामुदायिक सेवा और ग्रामीण सहायता कार्यक्रमों की भी मजबूत नींव रखी। इसी दौरान ल्यूपिन और भारत, दोनों ही, विश्व स्तर पर दवाओं के भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित होते गए।
आज भारत दुनिया की ‘फार्मेसी’ बन चुका है। अमेरिका में हर साल खपत होने वाली 400 अरब गोलियों में से लगभग आधी भारत में बनती हैं, वहीं दुनिया के 60 प्रतिशत टीकों का उत्पादन भी भारत में होता है। अमेरिका में दवाएँ बेचने वाली यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) से स्वीकृत 700 फैक्ट्रियों में से एक-तिहाई भारत में स्थित हैं।
भारतीय फार्मा उद्योग के सह-निर्माता—डॉ. यूसुफ़ हामिद (सिप्ला), अंजी रेड्डी (डॉ. रेड्डीज़), परविंदर सिंह (रैनबैक्सी), दिलीप सांघवी (सन फार्मा), रमनभाई पटेल (ज़ाइडस-कैडिला), हाबिल खोराकीवाला (वॉकहार्ट) और डीबीजी (ल्यूपिन)—भारत के लिए अपनी कंपनियों के राजस्व, निर्यात या मुनाफ़े से भी अधिक मायने रखते हैं, क्योंकि उन्होंने वह देखा जो और कोई नहीं देख पाया।
इन सभी ने मिलकर भारत की सॉफ्ट और हार्ड पावर को मज़बूत किया, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारतीय कंपनियों पर कथित अनुचित बढ़त के मिथक को तोड़ा, और भारत की वस्तुओं के निर्यात को लेकर मौजूद निराशावाद को समाप्त किया। परिणामस्वरूप फार्मा भारत की सबसे बड़ी विनिर्माण सफलता के रूप में उभरा। साथ मिलकर उन्होंने दुनिया को यह दिखाया कि जब दूरदर्शी उद्यमी और समझदार नीतियाँ साथ आती हैं, तो एक विकासशील देश भी किसी जटिल उद्योग पर वैश्विक स्तर पर वर्चस्व स्थापित कर सकता है। मिलकर उन्होंने भारत को सच अर्थों में ‘दुनिया की फार्मेसी’ बना दिया।
पुस्तक के विमोचन के दौरान ‘मेड इन इंडिया’ जीवंत हो उठी, जब लेखकों और प्रकाशक ने अपनी-अपनी यात्राएँ साझा कीं। इसके बाद “भारतीय फार्मा का अतीत और भविष्य” विषय पर एक समृद्ध और विचारोत्तेजक पैनल चर्चा हुई, जिसमें फार्मा उद्योग के दिग्गज—दिलीप सांघवी (सन फार्मा), डॉ. यूसुफ़ हामिद (सिप्ला), जी. वी. प्रसाद (डॉ. रेड्डीज़), विनिता गुप्ता (ल्यूपिन) और प्रो. एम. एम. शर्मा, पूर्व-(यूडीसीटी) आईसीटी—शामिल रहे।
पैनल में नेतृत्व, राष्ट्र-निर्माण और वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती व सुलभ बनाने में भारतीय फार्मा उद्योग की अहम भूमिका पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए गए।
पुस्तक के लिए प्रशंसा:
सन फार्मा के दिलीप सांघवी ने कहा, “डीबीजी एक दूरदर्शी व्यक्तित्व थे, जिनका दिल भारत और भारतीय मरीजों के लिए धड़कता था। उत्कृष्टता पर उनका अटूट ध्यान उनके व्यक्तित्व की पहचान था। वे हम सभी के लिए एक असाधारण रोल मॉडल थे और उन सच्चे शिल्पकारों में से एक थे, जिन्होंने भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ बनाने की यात्रा को आकार दिया।”
सिप्ला के यूसुफ़ हामिद ने कहा, “डीबीजी ने अत्यंत साधारण शुरुआत से ल्यूपिन का निर्माण किया, जिसमें दृढ़ संकल्प और मरीजों की सेवा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता मार्गदर्शक रही। डीबीजी की जीवन-गाथा न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि किसी एक व्यक्ति का उद्देश्य किस तरह दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और किफायती बना सकता है।”
‘मेड इन इंडिया’ उन सभी के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जो दुनिया में भारत की भूमिका को समझना चाहते हैं; जो भारत से निकले किसी वैश्विक स्तर के उद्योग के रोल मॉडल तलाश रहे हैं; जो उद्यमियों और व्यवसाय जगत के लोगों के रूप में एक मूल्यवान कंपनी खड़ी करने की प्रेरणा चाहते हैं; और अंततः भारत के युवाओं तथा उनके अभिभावकों के लिए, जो महत्वाकांक्षा, खोज की भावना और दृढ़ संकल्प को आकार देना चाहते हैं।
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