
भावनगर नरेश,एक साधुचरित महाराजा को समय पर भारत रत्न मिलना चाहिये:मोरारिबापु
कभी सही व्यक्ति को सही समय सन्मान न मिले तो बाद में पछताना ही हाथ लगता है।।
किसी भी प्रकार के कपट के बिना किसी को प्रणाम करते हैं तो वह व्यक्ति के द्वारा परमात्मा तक पहुंचते हैं।।
कपट छूटता है तब प्रणाम का महिमा बढ़ जाता है।
बाधक को भविष्य होता है,साधक को भूतकाल होता है लेकिन साधू सदैव वर्तमान में होता है।।
गुजरात के बगसरा के अमरेली रोड पर विशाल पंडाल में बह रही रामकथा के चौथे दिन बापु ने कवि कालिदास से लेकर मेघानी जी को प्रणाम करते हुए बताया की कपट छोड़कर तुलसी जी ने प्रणाम किए हैं। कपट के भी बहुत प्रकार है। किसी भी प्रकार के कपट के बिना किसी को प्रणाम करते हैं तो वह व्यक्ति के द्वारा परमात्मा तक पहुंचते हैं।। कपट छूटता है तब प्रणाम का महिमा बढ़ जाता है। प्रणाम के पीछे कोई योजना नहीं होनी चाहिए हमें आत्म चिंतन करना ही रहा।।
कल संध्या के कार्यक्रम में जो जो प्रस्तुति की गई वह बताते हुए बापू ने कहा कि:
एक गुरु के पास तीन चार चेले गए और पूछा कि कुछ ना कुछ नियम दो! गुरु बहुत उदार! सभी को नियम देते लेकिन खुद नियम का पालन नहीं करते थे! एक शिष्य ने पूछा मुझे क्या करना चाहिए? गुरु ने कहा कि पूनम भर! पूनम पर डाकोर पैदल जाना और कुछ खाए बगैर फिर लौट कर आना!! दूसरे ने पूछा मुझे क्या करना है?गुरु ने कहा कि तुम अमावस रखो। तीसरे को कहा कि तुझे सोमवार को मौन व्रत रखना है। चौथे ने पूछा गुरु ने कहा कि शनिवार को हनुमान जी को तेल चढ़ाना है।। पांचवें ने पूछा तो कहा कि खोडियार मां की मानता रखना है, दर्शन करना है और आखिर एक चेला ने पूछा मुझे क्या रखना है?तब गुरु ने कहा कि कुछ नहीं रखता है बस चुपचाप सखणारहेवानु!!- शालीनता से रहना है।।
यहां कवि सम्मेलन में एक कवि की रचना पर दूसरा कवि दाद देता है वह देखकर लगता है कि कलयुग अब जाने वाला है।क्योंकि यह बहुत कठिन है किसी को दाद देना।।
मेघानी जी ने रत्न खोजे हैं और हमारे गुजरात के काग बापू ने लिखा है:
रत्नोरुपाळा भाई! मोंघा मूल वाळा
दरियो पे’रे नहीं मोतीडानीमाळा
उपकारी एनोआतमा रे..
झातवांफळ जो ने नथीखातां
सरोवर पाणी जो ने नथीपितां
उपकारी एनोआतमा रे..
मेघानी भाई ने रवि शंकर महाराज के अनुभव का एक पुस्तक तैयार किया जो युवाओं को खास पढ़ने जैसा है।कभी उपनिषद,कभी सुभाषित कवि के घर आते हैं ऐसा लगता है।।
मुझे मेघानी के अंदर सात वस्तु दिखती है। इनमें से पहले है:भक्ति।। हालांकि तिलक,माला,रुद्राक्ष कुछ नहीं रखा लेकिन जो भक्त हुए,जैसे भीम साहब, जीवण साहब के पदों का संपादन किया है।। रामचरितमानस में भजन शब्द 24 बार आया तो मैं कहता हूं भजन के यह 24 अवतार है।।
हमारे विनोद जोशी ने एक गुजराती कविता लिखी
ठोठहोवाछतांपहुंच्योठेठ!
कारतक थी ज गयोसिद्धो जेठ
यानी कि कुछ नहीं था फिर भी आखिर तक पहुंच गया।।मेघानी जी ने संतो भक्तों के पदों को संकलित किया।इनमें गंगा सती का खूब आदर किया है।। बाधक को भविष्य होता है,साधक को भूतकाल होता है लेकिन साधू सदैव वर्तमान में होता है।। इसीलिए गंगा सती लिखती है।जिनके वर्तमान बदलते नहीं।
गीता के सातवें अध्याय में सात मंत्र मेघानी के किसी न किसी पद में दिखते हैं।।
दूसरा लक्षण मेघाणी का मस्ती है। मन मोर बनकर थनगनाट मस्ती के बगैर नहीं होता।। यहां सोरठ के बाहरवटीमेघानी के पुस्तक ‘सोरठी बहारवटिया-१’ और ‘सौराष्ट्र की रसधार’ में जो नोंध मिलती है उनसे मेघाणी की रचना का पता लगता है।।
मेघाणी ने जोगीदासखुमाण को सब से पहले के रूप में लिया है और राम वाळा को सबसे बडा बहार वटिया का अग्रज बताया है।।मुख्य पांच बाहरवटी में जोगीदासखुमाण,कावठिया और हिपाखुमाण आदि के नाम लिखते हुए मेघाणी लिखते हैं बाहर वटिया की काली और अच्छी दोनों बाझुं की नोंध में ले रहा हूं और यह नोंध देखकर सही में मेघाणी के दर्पण के आरपार हम देख सकते हैं।।
आज भी मेघाणी के विरोधी कहते हैं कि बाहरवटा के बारे में लिखकर समाज को क्या सीखना चाहते हैं? जब यह पुरी नोंधपढे तो उसका उत्तर मिलता है उस वक्त के दोहे,लोकोक्ति और स्मृतियों का संकलन भी मेघाणी ने किया है और लिखा है कि शायद ऐतिहासिकता कम है लेकिन लोगों की कल्पना आदर्श को वंदन करती दिखती है।।
बाहर वटी भी नीति के मार्ग पर चलते थे और यदि नीति से फिसलते थे तो उनका नाश होता था।। गुजरात के सावरकुंडला के पास के फीफाद गांव के मुस्लिम मुंजावर की दरगाह पर किसी ने मोर को मार दिया तो दरगाह में से श्राप निकलता है वह बात भी में मेघाणी ने लिखी है।।
हमारे गुजरात के कवि न्हानालाल ने जोगीदासखुमाण को जोगी बाहर वटी कहा है,भोगी नहीं कहा है।।औरजोगीदास अपने मस्तक पर बड़ा कपड़ा रखकर गांव की ओर अपनी पीठ रखकर नीचे देख कर बैठते थे क्योंकि गलती से भी बहन और बेटी पर बुरी नजर ना पड़ जाए!ऐसी बात भी में मेघाणी ने लिखी है।।
भावनगर का वजेसंग और सावरकुंडला का जोगी यह दोनों के बारे में बिल्कुल बैलेंस रखकर मेघाणी जी ने लिखा है।।
यहां देवताओं की दैवी सहायता की मान्यता को भी दिखाई है और लिखा है कि 19वीं सदी के अंत भाग में बाहर वटिया का प्रतिनिधि राम वाळा आखिरी था फिर चोर, डाकूगिरी लफंगा और लूंटपाट करने वाले है जो बाहरवटी होता नहीं।।20 सी शताब्दी में बाहर वटा का अंत हुआ।।चोर डाकू लुटेरे यह मेरे संग्रह में उनका स्थान नहीं ऐसा बेधड़क मेघाणी ने लिखा है और कहा है कि बाहर वटिया का पुरोहित जो उनकी ज्योत का आखिरी दीपक राम वाला मेरा इस संग्रह का स्तंभ है।।
भावनगर की बात निकली तब बापू ने एक बड़ी बात कही की भावनगर नरेश, एक साधु चरित्र राजवी, कृष्ण कुमार सिंह जी के बारे में मैंने तीन-चार बार पहले भी कहा है और दोहरा रहा हूं कि भारत माता के लिए भारत को एक करने के लिए इन्होंने सबसे पहले अपना पूरा रजवाड़ा सरदार पटेल को सबसे पहले समर्पित कर दिया।। ऐसे महान राजवी को भारत रत्न मिलना चाहिए।।
कभी-कभी ऐसा होता है कि समय पर यह अवार्ड नहीं मिलते बाद में हमें पछतावा होता है।। जैसे गांधी जी को नोबेल नहीं मिला फिर पछताते हैं।। नोबेल भी किसी ने खिलौना बना दिया है।।नोबेल प्राइज नोबेल लोगों को ही मिलना चाहिए।। लेकिन नोबेल भी खो-खो की खेल जैसा कर दिया है।। भावनगर के राजवी के लिए लोगों श्रीफल लेकर मानता रखकर स्टेशन पर घंटों तक राह देखते थे उसे भारत रत्न मिलना चाहिए।।वह में कई बार बोला हूं और आज भी बोल रहा हूं।।
मेघाणी जी ने बिरादरी, खानदानी और शिलवंत लोगों की बातें लिखी है।।

