Homeगुजरातदेह को सदैव देव मानो,मन को मंत्र मानो,मति को पार्वती मानो।।

देह को सदैव देव मानो,मन को मंत्र मानो,मति को पार्वती मानो।।

अपने चित् में अपने गृह के पति को लो, अहंकार को शिव रूप बनाओ।।

खुद की निजता को जगत में चांद के जैसे फैला दे वही झवेरचंद में मेघाणी है।।

“बहुत शिष्ट साहित्यकारों को मिट्टी की धूल की एलर्जी है!”

मैं पर्सनल हैप्पीनेसडिस्ट्रीब्यूटर-मतलब पी.एच.डी. हूं!:बापु

गुजरात के बगसरागाॉंव जो राष्ट्रीय शायर झवेरचंदमेघाणी जी की पैतृक भूमि है-वहां चल रही रामकथा के पांचवे दिन बहनों के द्वारा पूछे गए एक प्रश्न से कथा का आरंभ किया।।पूछा गया था कि हम देह को क्या समझे?मन को क्या जाने?बुद्धि के लिए क्या सोचे? चित् का क्या करें और अहंकार के साथ कैसे बर्ते?

बापू ने कहा कि देह को सदैव देव मानना चाहिए।। बापू ने आज अखबार की भाषा में बात करते हुए कहा कि जैसे 16 पाना पन्ने का अखबार होता है लेकिन उनका सार सब कुछ आ जाए वह सिर्फ थोड़ा सा एक छोटा सा लेख होता है,अखबार की भाषा में संपादकीयएडिटोरियल कहा जाता है। तुलसी जी के मानस का एडिटोरियल है कथा मानस गाने से बहुत सुख मिलेगा।।

मेघाणी जी ने 100 से ज्यादा ग्रंथ लिखे। 100 साल भी हमारे लिए कम पड़ेंगे। किसी ने ऐसा भी कहा है, फरियाद की है कि मेघाणी ने रामायण के बारे में क्यों नहीं लिखा? बापू ने बताया कि सब कुछ प्रत्यक्ष हो ऐसा नहीं है,अप्रत्यक्ष भी लिखा जाता है। सिर्फ दो लाइन-शिवाजी को माता जीजाबाई सुलाती है तब राम और लक्ष्मण की बात करती है वह पूरा हालरडा लिखा है वह भी रामायण ही है।। मेघाणी को चांद बहुत प्यारा है, मेघानी चंद्र पक्षी है क्योंकि नाम में चंद है।। खुद की निजता को जगत में चांद के जैसे फैला दे वही झवेरचंद में मेघाणी है भुज कच्छ का एक छोटा सा गांव देपला। वहां एक हाथ कटा हुआ और एक ही हाथ में बंदूक के साथ अपने दोस्तों के साथ एक आदमी गांव में आता है। क्योंकि उनके दोस्त की पत्नी का कोई एक आदमी अपहरण कर गया है।। पूरे गांव की नाकाबंदी करके वह कहता है कि इसी गांव में वह पापी छिपा है, हाजिर कर दो! और वह आदमी का नाम है-नामोरीनामोरी की भी एक कथा है। जब वह चोरी करने के लिए रात को एक घर में धीरे से जा रहा है उसी घर में एक मां और बेटी सो रहे है।। एक दीपक जल रहा है और गलती से दीपक के ऊपर हाथ आने से दीपक बुझ जाता है।हाथ जल जाता है। लेकिन दूसरा हाथ गलती से पास सो रही एक छोटी सी बेटी के वक्ष स्थल पर स्पर्श हो जाता है।। दीप तो बुझ गया लेकिन नामोरी की आत्मा जग गयी! बेटी उठती है तब माफी मांग कर कहता है।। खुद अपने पास रखी कटारी निकाल कर अपना वह हाथ काट देता है और कहता है कि मैं सिर्फ चोरी करने के लिए आया था। बहन बेटी का स्पर्श हो मेरे लिए सह्यनहि है।। वही नामोरी के पास वह पापी हाजिर होता है और तीन बार हाथ जोड़कर माफी मांग कर बोलता है कि मैं तेरी गौ- गाय हूं।। बार-बार यह बोलने से नामोरी के साथ आए हुए दोस्तों कहते हैं कि उसे मार देना चाहिए।। लेकिन नामोरी कहता है कि गाय माता का नाम बोला तो उसे छोड़ देना चाहिए।। मेघाणी ने ऐसी बहुत बात खोज खोज कर निकाली है।।

झवेरचंदमेघाणी ने तीन कारण बताएं उस वक्त लोग बाहर वटा करते थे उनके कारण था: भूमि पतियों का त्रास, ब्याज खोरों के त्रास के कारण और खुद के पाप के कारण लोग बाहर बटी पर निकल जाते थे।।

उस वक्त शिष्ट साहित्यकार लोक साहित्य को कुछ भी मायने नहीं रखते थे।। इसीलिए एक बार अस्मिता पर्व में उपेंद्र त्रिवेदी ने कहा था कि: बहुत शिष्ट साहित्यकारों को मिट्टी की धूल की एलर्जी है! बहुत समय तक लोक साहित्य के तरफ शिष्ट साहित्य ने बहुत बुरी नजर से देखा है।।

बापू ने युवाओं को कहा कि गाना गाओ! यदि अभ्यासक्रम में स्कूल में ना हो तो भी हर एक स्कूल को 5-15 दिन के बाद झवेरचंदमेघाणी का साहित्य की गाथायें सुनानी चाहिए।।

क्षत्रिय किसे कहते हैं? वह बताते हुए बापू ने बताया कि शूरवीरता,दक्षता,तप,तेज,दुश्मन को पीठ ना दिखाएं ऐसी युद्ध कला,शासन करने की ताकत-ये सभी क्षत्रिय के स्वाभाविक धर्म है।।

तुलसी का अखबार एतबार पत्र और एडिटोरियल लेख है:राम नाम।।

बापू ने कहा कि पर्सनल हैप्पीनेसडिस्ट्रीब्यूटर का मतलब पी.एच.डी.और मैं एचडी हूं! मेरे सुख का अधिकार कोई छीन नहीं सकता मैं। क्यों सतत कथा कर रहा हूं? क्योंकि निज सुख को दो हाथ से में बटोर रहा हूं। और कथा ही मेरा सुख है।

पूछे गए प्रश्न के जवाब में बापू ने कहा कि देह सेवा, देव सेवा,देश सेवा,दिल सेवा और दीन दुखियों की सेवा करना चाहिए।। मन को मंत्र मानो।। मति को पार्वती मानो और अपने चित् में अपने गृह के पति को लो, अहंकार को शिव रूप बनाओ,अहंकार को गर्व नहीं गौरव समझो।जिससे हमारा और पूरे जगत का कल्याण होगा।।

कथा प्रवाह में जब शिव और पार्वती कुंभज के पास कथा सुनने जाते हैं। कुंभज को प्रणाम करते देखकर पार्वती के मन में शंका होती है कि यह कैसे कथा सुनाएंगे! और कथा में तो बैठी है लेकिन कथा में मन नहीं रहा।। कथा पूरी होने के बाद शिव और पार्वती लौटते हैं। बीच जंगल में उस वक्त के त्रेता युग की रामलीला चल रही है और राम अपनी सीता को खोज रहे हैं।। यह देखकर शिव दूर से प्रणाम करते हैं।सती को संशय होता है और वो राम की परीक्षा लेती है और विफल होती है।। राम अपनी पूरी व्यापकता का दर्शन सती को करवाते हैं और सती भाग कर कैलाश की तरफ जाती है।। लेकिन झूठ बोलती है कि मैं कोई परीक्षा नहीं ली। शिव समाधि में बैठकर सब देख लेते हैं और मन ही मन प्रतिज्ञा करते हैं कि अब सती के साथ यह संबंध नहीं रहना चाहिए और कैलाश में वेदविदित वटवृक्ष के नीचे शिव समाधि में बैठ जाते हैं।।

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