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भारत के 57% जिले, जहां तीन-चौथाई आबादी रहती है, अब ‘उच्च’ से ‘बेहद उच्च’ गर्मी के जोखिम का सामना कर रहे हैं:सीईईडब्ल्यू

  • अहमदाबाद में आयोजित एक नॉलेज-शेयरिंग वर्कशॉप में गर्मी और पानी पर शोध से जुड़े निष्कर्ष साझा किए गए
  • देश भर में बहुत गर्म दिनों की तुलना में बहुत गर्म रातों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो इंसानी सेहत पर दबाव डाल रही है
  • भारत का उपचारित अपशिष्ट जल 2047 तक 35 बिलियन डॉलर तक का आर्थिक अवसर खोल सकता है, जिससे 1 लाख से अधिक नई नौकरियाँ पैदा होंगी
  • प्रमुख औद्योगिक और सिंचाई संबंधी मांग को पूरा करने के लिए सालाना 31,265 मिलियन क्यूबिक मीटर उपचारित अपशिष्ट जल (TUW) का पुन: उपयोग किया जा सकता है

अहमदाबाद, गुजरात | 25 मार्च 2026 — क्लाइमेट थिंक टैंक ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर’ (CEEW) ने आज अहमदाबाद में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें भीषण गर्मी (Extreme Heat) की बढ़ती चुनौती और इसके पानी जैसे अन्य संसाधनों पर आ रहे दबावों और संभावित समाधानों पर बात की गई है। इसमें सीईईडब्ल्यू के विशेषज्ञ डॉ. विश्वास चितले और नितिन बस्सी ने अपने-अपने प्रमुख शोध निष्कर्षों को सामने रखा।
डॉ. विश्वास चितले ने बताया कि वर्तमान में भारत के 57 प्रतिशत जिलों के सामने भीषण गर्मी का जोखिम मौजूद है, जहां देश की 76 प्रतिशत आबादी रहती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय शहर और जिले जैसे जटिल और अनियमित जलवायु पैटर्न का सामना कर रहे हैं, उसे देखते हुए तत्काल गर्मी सहने में सक्षम बनाने वाली योजनाओं के निर्माण और कार्यान्वयन की जरूरत है।

सीईईडब्ल्यू का अध्ययन हाउ एक्सट्रीम हीट इज इम्पैक्टिंग इंडिया: असेसिंग डिस्ट्रिक्ट-लेवल हीट रिस्क (https://www.ceew.in/publications/mapping-climate-risks-and-impacts-of-extreme-heatwave-disaster-in-indian-districts ) 35 संकेतकों के आधार पर भारत के 734 जिलों के लिए गर्मी के जोखिम का पहला समग्र मूल्यांकन पेश करता है। यह बताता है कि 1982 से 2022 तक जलवायु परिवर्तन ने हीट हैजर्ड (गर्मी के खतरों) के रुझानों में किस तरह से बदलाव किया है। इस मूल्यांकन में देश के 417 जिले ‘उच्च’ और ‘अत्यधिक उच्च’ जोखिम श्रेणी में, जबकि 201 को ‘मध्यम’ जोखिम की श्रेणी में आए हैं। सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन तीन प्रमुख रुझानों को रेखांकित करता है: बहुत गर्म रातों (very warm nights) में चिंताजनक रूप से वृद्धि होना; पूरे उत्तर भारत, विशेष रूप से सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में सापेक्षिक आर्द्रता (relative humidity) में बढ़ोतरी होना; और तीसरा, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद, भोपाल और भुवनेश्वर जैसे घनी बसावट वाले शहरी व आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जिलों में गर्मी के प्रभाव में बढ़ोतरी होना।

गर्मी वाली रातों और सापेक्षिक आर्द्रता में बढ़ोतरी
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार, 1982-2011 की तुलना में पिछले दशक (2012-2022) में लगभग 70 प्रतिशत जिलों में प्रति गर्मी के मौसम में पांच से अधिक अतिरिक्त गर्म रातें देखी गई हैं। इसके विपरीत, केवल लगभग 28 प्रतिशत जिलों में ‘बहुत गर्म दिनों’ में वृद्धि देखी गई है। गर्म रातों में बढ़ोतरी से मानव शरीर को रात में भी दिन की गर्मी से राहत नहीं मिल पाती। शहरी या ग्रामीण, दोनों ही क्षेत्रों में स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, खास तौर पर बुजुर्ग, बाहर काम करने वाले मजदूर, बच्चे और उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर।।

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार, पिछले एक दशक में सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) 10 प्रतिशत तक बढ़कर 40-50 प्रतिशत पहुंच गई है, जो पहले 30-40 प्रतिशत रहती थी। दिल्ली, चंडीगढ़, कानपुर, जयपुर और वाराणसी जैसे पारंपरिक रूप से शुष्क शहरों में उच्च आर्द्रता स्तर दिखाई दे रही है। इससे ‘महसूस होने वाला’ (Felt) तापमान काफी बढ़ जाता है, जो कभी-कभी दर्ज तापमान की तुलना में 3-5 डिग्री सेल्सियस अधिक होता है। इससे सामान्य गर्मी भी अधिक खतरनाक हो जाती है, क्योंकि यह शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर पसीना निकलने की प्राकृतिक प्रक्रिया को रोक देती है, जिससे शरीर ठंडा नहीं हो पाता है।

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में विस्तृत डेटा का उपयोग करते हुए हीट एक्शन प्लान (HAP) को नियमित रूप से अपडेट करने, इसमें रात्रिकालीन गर्मी व आर्द्रता (humidity) की समस्या का सामना करने के उपायों को शामिल करने जैसे सुझाव दिए गए है। इसके लिए राज्यों को ‘राज्य आपदा शमन कोष’ (State Disaster Mitigation Fund) को इस्तेमाल करने की भी छूटहै, क्योंकि 2024 से लू (heatwaves) भी पात्र आपदा में शामिल है।

डॉ. विश्वास चितले, फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “भारत ने भीषण गर्मी की समस्या से निपटने में काफी प्रगति की है, लेकिन अब हमें दीर्घकालिक लचीलेपन (Resilience) में निवेश करना होगा। पैरामेट्रिक हीट इंश्योरेंस, अर्ली वार्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली), नेट-जीरो कूलिंग शेल्टर और कूल रूफ जैसे समाधानों को हीट एक्शन प्लान में बुनियादी तौर पर शामिल किया जाना बहुत जरूरी है। महाराष्ट्र, ओडिशा, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्य पहले ही स्थानीय योजनाओं में जलवायु और स्वास्थ्य डेटा को शामिल करते हुए कदम उठा रहे हैं।”

सीईईडब्ल्यू वर्तमान में भारत के 8 राज्यों में 140 से अधिक स्थानीय शहर और जिला-स्तरीय हीट एक्शन प्लान विकसित करने और उन्हें मजबूत करने में सहायता कर रहा है। वार्ड-स्तरीय हीट रिस्क मूल्यांकन के माध्यम से, लक्ष्य 2027 तक ऐसी 300 से अधिक योजनाओं को सक्षम बनाना है।

कार्यशाला में सीईईडब्ल्यू में फेलो नितिन बस्सी ने गर्मी बढ़ने के साथ पानी से जुड़ी चुनौतियों को सामने रखा। उन्होंने बताया कि गर्मी बढ़ने के साथ भूजल दोहन बढ़ जाता है और विभिन्न इलाकों से पानी की कमी होने की खबरें आने लगती हैं। उन्होंने इसके समाधान के तौर पर ताजे पानी पर निर्भरता घटाने के लिए प्रयुक्त जल की उपचारित करके गैर-पेयजल कार्यों के लिए दोबारा इस्तेमाल करने पर जोर दिया। “फाइनांसिंग फॉर ट्रीटेड यूज्ड वाटर रियूज इन इंडिया” अध्ययन का उल्लेख करते हुए नितिन बस्सी ने कहा कि भारत की उपचारित प्रयुक्त जल (TUW) से जुड़ी अर्थव्यवस्था 2047 तक 3.04 लाख करोड़ रुपये (35 बिलियन अमेरिकी डॉलर) तक के आर्थिक अवसर सृजित कर सकती है।

इस अध्ययन का अनुमान है कि यदि वित्तपोषण, विनियमन और बुनियादी ढांचे का सही तालमेल मिले तो भारत 2047 में 31,265 मिलियन घन मीटर उपचारित प्रयुक्त जल (Treated Used Water) को दोबारा इस्तेमाल कर सकता है। यह औद्योगिक और सिंचाई के लिए पानी से जुड़ी मांग के एक बड़े हिस्से की आपूर्ति के लिए पर्याप्त होगा। वर्तमान में, भारत निकलने वाले कुल प्रयुक्त जल के लगभग 28 प्रतिशत (20.24 बिलियन लीटर प्रतिदिन) हिस्से का ट्रीटमेंट करता है। 80 प्रतिशत से अधिक शहरों में या तो उपचारित जल का दोबारा इस्तेमाल नहीं होता या वहां पर ऐसा करने के लिए सक्षम बुनियादी ढांचे की कमी है। इससे एक विशाल अप्रयुक्त क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता है। उपचारित प्रयुक्त जल का पुनर्उपयोग बढ़ने पर 2047 तक देश भर में 1 लाख से अधिक नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन ने बताया कि कैसे भारतीय शहरों में ‘सर्कुलर इन्वेस्टमेंट’ के नतीजे सामने आने लगे हैं। सूरत उद्योगों को 36 रुपये प्रति किलोलीटर की दर से ‘टर्शियरी-ट्रीटेड’ जल उपलब्ध करा रहा है, जो ताजे पानी की दरों से थोड़ा कम है। इससे शहर को 2014 और 2021 के बीच 230 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व मिला। अध्ययन में ‘वॉटर रियूज सर्टिफिकेट’ जैसे बाजार-आधारित तंत्र का सुझाव दिया गया है। यह पुनरुपयोग लक्ष्यों से अधिक क्षमता में काम करने वाले बड़े यूजर्स को उनके साथ क्रेडिट का व्यापार करने का अवसर देता है, जो अपने लक्ष्य पूरा नहीं कर पाते हैं। इसके जरिए दक्षता को मौद्रिक लाभ से जोड़ा जा सकेगा और नियमों का अनुपालन बढ़ेगा।

CEEW के फेलो, नितिन बस्सी ने आगे कहा, “उपचारित प्रयुक्त जल (treated-used-water) के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा देना भारत के शहरों को जल के मामले में सुरक्षित बनाने के सबसे व्यावहारिक तरीकों में से एक है। शहरी स्थानीय निकायों को दीर्घकालिक नगर योजनाएं बनाकर, वित्तपोषण में विविधता लाकर और उचित लागत आधारित शुल्क तय करके भारत को उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल की तरफ ले जाना चाहिए। प्लांट संचालन में अपेक्षित एक लाख प्रत्यक्ष नौकरियों के अलावा, दोबारा इस्तेमाल बढ़ने से निर्माण और प्रौद्योगिकी सेवाओं में भी रोजगार पैदा होगा, नगर पालिकाओं के लिए एक टिकाऊ राजस्व उत्पन्न होगा, हरित निवेश आकर्षित आएगा और नदियों में प्रदूषण कम होगा। सही योजना, मूल्य निर्धारण और व्यावसायिक मॉडल के साथ, इस्तेमाल हो चुका जल भी एक वित्तीय रूप से सतत और पर्यावरणीय रूप से उपयोगी शहरी संसाधन बन सकता है।”

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