
जगत भर के तमाम सद्गुण राम में शिव और कृष्ण में हनुमान और जगदंबा में दिखते हैं इसलिए ही हम रामकथा गाते हैं।।
जानते हुए भी नहीं मानते हैं वह सबसे बड़ी अज्ञानता है।।
आज हमारे मन को अच्छा करने के लिए कथा जैसा कोई माध्यम नहीं है और कथा श्रवण करने जैसा कोई साधन नहीं है।।
श्रेय और प्रेय,आलोक और परलोक दोनों को रखे वह बेरखा है!
व्यक्तिगत इन्कम के संदर्भ में दुनिया का रीचेस्टगॉंव कहा जाने वाला माधापरगॉंव की ऐतिहासिक धरा पर बह रही रामकथा के तीसरे दिन साधन और साधना दोनों से संपन्न धरा को प्रणाम करते हुए मन के बारे में और ज्यादा कहते हुए बापू ने कहा कि कभी मन को दर्पण,कभी हृदय,कभी मुख को दर्पण कहा गया है।।एक दर्पण हाथ कंकण है।।मन रूपी मृग भी कहा गया है और स्मृति कारो ने मन को मछली कहा है।। मन को मर्कट कहा है। मन मयूर है और मन को मदोन्मत हाथी भी कहा हैं।।
बापू ने मनुस्मृति जैसे ग्रंथ के बारे में बताया कि कितना अच्छा ग्रंथ लिखा है। लेकिन तथा कथित विरोधियों कोई एक दो वस्तुओं को पकड़ कर मनुस्मृति की बहुत बड़ी आलोचना करते हैं तब दया आती है।।
मनु मन है और शतरूपा बुद्धि है।। बुद्धि अनेक रूप धारण करती है।।चैतन्य जड़ को आधिन हैं। पुरुष नारी और प्रकृति से अधीन है।।
हमने जो पंक्ति उठाई है वहां काई शब्द है। काई का मतलब है आवर्त, दबा हुआ, छिपा हुआ।। जैसे भाप किसी दर्पण पर आती है तो दर्पण पर आवरण हो जाता है।। किसी सरोवर में जब लील जम जाती है तो पानी स्वच्छ नहीं दिखता।। वैसे ही नव प्रकार की काई है जो इस पंक्ति में दिखाई है।।पहले है: अज्ञानता।। हमारी अज्ञानता मन रूपी मुकुर को ढंक देती है।।जब की इंद्रियों में मन में हूं ऐसा गीता में कृष्ण ने कहा है।।
मनु भगवान ने कहा है जिस गांव में धर्म ना हो या तो सनातन धर्म का सन्मान न हो रहा हो वहां से निकल जाना चाहिए।। जहां संक्रामक रोग हो उस गांव को छोड़ देना चाहिए।। यात्रा कभी अकेले नहीं करनी चाहिए और पर्वत पर ज्यादा समय रुकना नहीं चाहिए।।
जगत भर के तमाम सद्गुण राम में शिव और कृष्ण में हनुमान और जगदंबा में दिखते हैं इसलिए ही हम रामकथा गाते हैं।। जानते हुए भी नहीं मानते हैं वह सबसे बड़ी अज्ञानता है।।आज हमारे मन को अच्छा करने के लिए कथा जैसा कोई माध्यम नहीं है और कथा श्रवण करने जैसा कोई साधन नहीं है।।दूसरा है अकोविद।।कोविद का मतलब पंडित होता है।अकोविद का मतलब मूर्खता है।।कभी-कभी मूर्खता हमारे मन रूपी दर्पण को आवृत कर देती है और यह सब में से निकलने के लिए बाहर आने के लिए परम का संकीर्तन करना पड़ेगा।। विविध अंधा पन मोहांधता,कामांधता,देखते हुए भी अनदेखा करना मन रुपीमुकुर को ढंक देती है।।
बापू ने कहा कि श्रेय और प्रेय,आलोक और परलोक दोनों को रखे वह बेरखा है।।
अभागपना भी मन रूपी मुकर पर लगा मेल है।।
यह चार शब्दों के साथ पांच विषय:शब्द,स्पर्श,रूप, रस और गंध जो आंख,कान,हमारी जीह्वा हमारे शरीर और मन से जुड़ी हुई है।।
बापू ने ‘हनुमंत नाटक’ में आया एक प्रसंग भी कहा और कथा प्रवाह में चार घाट में से शंकर और पार्वती के घाट पर कथा चल रही है।। शिव और पार्वती कुंभज के वहां कथा सुनने जाते हैं लेकिन सती को कथा में मन नहीं लगता।। सती संशय करती है और इस कथा को सुनने के बाद रास्ते में उस त्रेता युग में रामलीला चल रही है।। सती को संशय होता है।।राम की परीक्षा करती है।। विफल रहती है और राम अपना सामर्थ्य दिखाते हैं।। सती और शंकर कैलाश पर आते है। शिव मन में ही प्रतिज्ञा करके समाधि लगाकर कैलाश पर बैठ जाते हैं यह शिव चरित्र का गान भरद्वाज और याज्ञवल्क्य संवाद में जब राम कथा को पूछा गया तब सेतुबंध करने किया गया हैं।।

