
प्रेम कि ये ताकत है,प्रेम चेतन को जड़ और जड़ को चेतन करता है।।
कुछ ना करो!सबको प्रेम करो! यह सबसे बड़ा यज्ञ, अनुष्ठान,बंदगी और साधना है।।
तन लौकिक है,मन अलौकिक है और आत्मा पारलौकिक है।।
मन को धोने के दो ही उपाय है:बुद्धपुरुष की बानी और हमारी आंख में से निकला हुआ पानी।।
प्राचीन कथाओं और आधार अनुभव के साथ कहने की इच्छा होती है कि कच्छ भूमि ने बहुत भक्त शूरवीर और दातारों को जन्म दिया है।पीरोंकी, समाधिओं की,साधुजनो की खूश्बू से सुगंधित कच्छ माधापर की भूमि पर चल रही रामकथा का पांचवा दिन।आरंभ में दो जिज्ञासाओं से रामकथा शुरू करते हुए बापू ने बताया:भरत श्रृंगबेरपुर गए वहां रुके और फिर चित्रकूट गए।राम लक्ष्मण और जानकी वन यात्रा में श्रृंगवेरपुर गए। तब गुह,केवट निषाद जो राम लक्ष्मण जानकी की दिन-रात चौकी करते हैं।लक्ष्मण भी सदा जागरुक है और दो ऐसी व्यक्तियों का मिलन जो दोनों प्रसंग पात भरत पर शंका करते हैं और कैकई पर आरोप लगाते हैं कि कैकई मंद मति,कठिन,कुटिल प्रणधारी है जिनके कारण सीताराम जी दुखी हुए हैं।।लेकिन सवाल यह उठता है कि निषाद गुह के मन दर्पण पर कोई मैल है की सजगता के कारण ऐसा हुआ?लक्ष्मण भी चित्रकूट में भरत पर रोष करते हैं।तो लक्ष्मण के मन का मेल है कि क्या है?
बापू ने कहा मुझे ऐसे समझ में आता है कि गुह,किरात,निषाद के मन दर्पण पर कोई मेल नहीं है लक्ष्मण के मन पर भी कोई मैल जमा नहीं है।गुह तो कहते हैं कि मुझे क्या नहीं मिला है?मेरे दोष,दुख और दारिद्र मुझे परेशान करता था वह तीनों मिट गए हैं-ऐसी कैकई को कैसे दोष दुं? लेकिन फिर भी दोष दिया। क्योंकि अतिशय प्रेम में जड़ता होती है। शास्त्र भी कहते हैं अतिशय प्रेम में जड़ता होती है।। लक्ष्मण के मन पर कोई मैल नहीं था लेकिन अति रामचरण के प्रीति के कारण जड़ता आई थी।।प्रेम कि ये ताकत है,प्रेम चेतन को जड़ और जड़ को चेतन करता है।।
कुछ ना करो!सबको प्रेम करो! यह सबसे बड़ा यज्ञ, अनुष्ठान,बंदगी और साधना है।।
आज श्वेताश्वेतारोपनिषद का एक मंत्र पठन करके बापू ने कहा कि वह दर्पण का दर्शन कराता है। वहां लिखा है जिन्हें बींब पकड़ में आ गया है, जैसे सोने की लगड़ी मिट्टी में गिर गई और मल से आवृत्त हो गई लेकिन जल लेकर साफ कर देने से कोई शौक रहता नहीं है।।मन किमिति है, मन सोना है।।मन को धोने के दो ही उपाय है:बुद्धपुरुष की बानी और हमारी आंख में से निकला हुआ पानी।।
तीन प्रकार के दर्पण है: देह-जो आधि भौतिक है,देही जो आधि दैविक है और विदेहि जो आध्यात्मिक है।।
भौतिक दर्पण हमें यह बताता है की मन महत्व का है।।जो आधि दैविक है।। तन है वह आधी भौतिक है और विदेहि है वह आध्यात्मिक है।।
मन सीधा ही देखता है लेकिन मैल लग जाने से उल्टा दिखाई देने लगता है।।
रामायण और महाभारत यदि पढ ना सको तो रा और म बोलो।।रा से रामायण और म से महाभारत होता है।।
तन देह दर्पण है,मन आत्म दर्पण है।।तन लौकिक है,मन अलौकिक है और आत्मा पारलौकिक है।। हमारे घर में मन पुरुष है,मन भटकता रहता है।। बुद्धि स्त्री है,सदैव घर में रहती है और हमारे बुजुर्गों और बालकों को सुख और सेवा करती है वह चित् है और दोनों के कारण अहंकार भी होता है।।
आज बापू ने ऐसी स्त्रीओं का लक्षण कहा जो घर के दर्पण को मेल लगाना ना दे।। हमारे घर रूपी दर्पण को स्वच्छ रखें।।ऐसी स्त्री:संतोषी,दक्ष,धर्म पालने वाली,प्रिय सत्य बोलने वाली,निरहंकारी,अप्रमादी, पवित्रता से भरी होती है।।
बापू ने कहा कि ब्रह्म हत्या,सूरापान ,चोरी,किसी का वापस न करना और गुरु पत्नी पर कुदृष्टि-ऐसे लोगों के साथ एक साल तक रहना वह महा पातक है।।
फिर शिव चरित्र में सती शिव को बियाहने के लिए कठिन तप करती है और सप्तर्शियाों सती की परीक्षा लेने आते हैं लेकिन सती जन्म जन्म शिव को ब्याहने की बात करती है और कठिन तप की परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाती है।।और शिवजी के गण शिव को सजाते हैं और शिव की पूरी बारात भूत प्रेत और देव सभी लोग के साथ हिमाचल में प्रवेश करती है।। शिव और पार्वती का विवाह होता है।। शिव विवाह के बाद पुत्र कार्तिकेय ताडकासुर राक्षस का नाश करता है।।बीच में काम प्रभाव का वर्णन बापू ने अपनी रस प्रधान बानी में किया और आज की कथा को विराम दिया गया।।

