
किसी के पास आंख नहीं लेकिन समाज में तिलक बनकर बैठे हैं और बहूतों के पास आंख है लेकिन निम्न दृष्टि रख कर बैठे हैं।।
कभी मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार का दर्पण स्वच्छ होता है तो जीवन का अनंत दर्शन होता है।।
आदेश और उपदेश पुत्र या आश्रित शिष्य को ही दे सकते हैं।।
आदेश और उपदेश वेद और उपनिषद ही दे सकते हैं ।।
दर्पण इसलिए कीमती है क्योंकि वह कुछ संग्रह नहीं करता,हम सामने से निकल जाते हैं तो दर्पण शून्य हो जाता हैं।।
ऐतिहासिक,धार्मिक और आध्यात्मिक चेतनाओं से भरी कच्छ धरा के माधापर गॉंव में चल रही रामकथा के सांतवे दिन कच्छ की महिमावंत भूमि को प्रणाम करते हुए बापू ने कहा कि कहीं पर आज भी रामनवमी मनाई जा रही है,सबको बधाई और कच्छ के स्थानिक अखबार एवं सभी अखबारों में रामनवमी और रामकथा के बारे में बहुत अच्छे अहेवाल प्रस्तुत किए।संपादकों और पत्रकारों को भी बधाई देते हुए बापू ने कहा कि हमें ललाट में तिलक करना हो तो दर्पण की जरूरत पड़ेगी।।मन रूपी दर्पण को गुरु चरण रज से स्वच्छ करके इस रज का तिलक करना है तो भी दर्पण हमारे पास होना चाहिए।।दर्पण भी होगा लेकिन यदि दृष्टि नहीं होती तो हम तिलक नहीं कर पाएंगे।।अज्ञानता वह अंधत्व है।कोई और तिलक कर दे तो और बात है।। कितने प्रज्ञाचक्षु साधुओं को देखे हैं जिन्हें चरण चक्षु नहीं लेकिन अपने दिल की आंख से बहुत अच्छा तिलक भी करते हैं।।किसी के पास आंख नहीं लेकिन समाज में तिलक बनकर बैठे हैं और बहूतों के पास आंख है लेकिन निम्न दृष्टि रख कर बैठे हैं।। दर्पण की मलिनता कैसे दूर हो उसी का स्वाध्याय यह कथा में हम कर रहे हैं।।
यहां भुज में एक आइना महल भी है।।कभी मन, बुद्धि,चित्त और अहंकार का दर्पण स्वच्छ होता है तो जीवन अनंत दर्शन रूपी दिखाता है,जैसे बहुतों के बाथरूम में बहुत दर्पण होते हैं वहां देखते हैं तो अनंत रूप दिखाते हैं।।
मुख से हवा देने से भी दर्पण शुद्ध नहीं होता क्योंकि मुख में से निकली हुई भांप दर्पण को और भी मलिन करती है।।दर्पण वो दिया भी नहीं है, लाइट भी नहीं है।।आईना जिन्हें गुजराती में दर्पण कहते हैं वह खुद कहता है-आई नो(I KNOW)!
दर्पण इसलिए कीमती है क्योंकि वह कुछ संग्रह नहीं करता,हम सामने से निकल जाते हैं तो दर्पण शून्य हो जाता हैं।
यह उपदेश नहीं है। मुझे मेरे दादा ने कहा था की कथा गान करना लेकिन किसी को उपदेश के रूप में कभी मत कहना।।आदेश और उपदेश पुत्र या आश्रित शिष्य को ही दे सकते हैं। आदेश और उपदेश वेद और उपनिषद ही दे सकते हैं ।।
बापू ने कहा कि पांच वस्तु जो आचार संहिता के रूप में हम करेंगे तो हमारा मलिन दर्पण शुद्ध होगा पहला है:जहां तक संभव हो,भूमि शयन करना। यह प्रयोग जरूर करना।।अच्छे से अच्छा पलंग हो फिर भी भूमि शयन करना क्योंकि भूमि शयन करने से मन का दर्पण धीरे-धीरे शुद्ध होने लगेगा।। गायत्री हवन या सत्यनारायण के हवन करने के लिए भी यजमान को भूमि शयन कराया जाता है। धरती धीरज और सहनशीलता सिखाती है।
दूसरा-संयम रखना।। संयम में भी वाणी का संयम, वर्तन का संयम, वस्त्र का संयम और भोजन का विवेक होना चाहिए।।
भोजन में भी स्वभाव दोष और आश्रय दोष होता है आज विश्व रंगभूमि दिन था। तुकडोजी का एक गायन लेकर बापू ने याद किया और अपने बचपन में बापू ने रंगभूमि में जो भूमिका है की थी उसे भी याद किया और कहा कि जो पात्र मिला है हो अच्छी तरह से पेश करके फिर रंगभूमि के पीछे परदे के पीछे चले जाएंगे!
भावेश पाठक नाम के शायर ने जो शेर भेजे थे:
हम फरिश्तों की तरह पेश आए।
जब उसे काम तो आदमी का था!
बद नजर से कभी नहीं देखा।
तेरी तस्वीर को भी हमने कंवारी रखी है!
नींद की गोलियां उसे भी दो।
चांद को भी यही बीमारी है!
एक साया था जो साथ मेरे।
धूप के खानदान का निकला!
उसके गालों की गर नहीं देखा।
खाक तुमने गुलाब देखा!
तीसरा है:गुरु स्मरण।।चौथा- विश्वास पूर्वक हरि नाम का स्मरण और पांचवा हो सके इतना मौन रखने से हमारा मन रूपी दर्पण शुद्ध होता है।।
बापू ने कहा की नव बिथी-गलियों और एक-एक गली में फिर तीन-तीन गली मिल कर २७ नक्षत्र बनते हैं वह विश्वास के आसपास के देवताई गलियों का संवाद और गायन करके राम और चारों भाइयों का नामकरण संस्कार, उपनयन संस्कार और फिर विद्या संस्कार होने के बाद विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को मांगने के लिए अयोध्या में प्रवेश करते हैं वहां तक की कथा का गान कर के आज की कथा को विराम दिया।।

