
कोई साधु गुरु मिले तब हम स्थूल से सूक्ष्म तरफ की यात्रा शुरू करते हैं।।
घड़ियाल स्थूल है लेकिन काल के अनुसार सचेत होना वह सूक्ष्म है।।
दर्पण स्थूल है इसलिए यह पकड़ सकते हैं लेकिन उनमें दिखता हमारा चेहरा प्रतिबिंब सूक्ष्म है इसलिए पकड़ में नहीं आता।।
बापू आप जय सियाराम क्यों बोलते हो?हमारे यहां नारा जय श्री राम का चलता है!
जय श्री राम एक आंदोलन का उच्चार है और जय सियारामआनंदोलन का उच्चार है।
वर्ण स्थूल है लेकिन साधू इनमें सूक्ष्म रूप है।।
साधु चारों वर्णों का ज्यूसहैअर्क हे।।
कच्छ की महिमावंत भूमि माधापर से स्वानत:सुखाय चल रही रामकथा के आंठवे दिन इस आधि भौतिक,आधि दैविक और आध्यात्मिक भूमि को प्रणाम करते हुए कहा कि फलद्रूप भूमि में जो कुछ पका वह बहुत कम प्रांतो में पका है। यहां देव जैसे आदमी लोग वह आधी दैविकताहै।जैसल जैसे को दैवत्व प्राप्त हुआ और यहां के मेकरणडाडा जैसे अध्यात्म पुरुष की परंपरा आध्यात्मिक भूमि है।।
किसी ने पूछा था कि बापू आप जय सियाराम क्यों बोलते हो? हमारे यहां नारा जय श्री राम का चलता है!
बापू ने कहा कि सब कुछ एक ही है।।जय श्री राम बोलो,जय सियाराम बोलो जी नाम बोलो!
जब अयोध्या में राम मंदिर बनना था तब विश्व हिंदू परिषद और अशोक सिंघल जी जैसे आगेवानों ने यह नारा बनाया था।।लेकिन मैं एक ऐसी साधु परंपरा में से आ रहा हूं जहां जय सियाराम ज्यादातर बोला जाता है। इसलिए मुख में वही बात आ जाती है।।लेकिन सब कुछ एक ही है, आप गलत अर्थ मत निकालना।।लेकिन इतना जरूर कहूंगा जय श्री राम एक आंदोलन का उच्चार है और जय सियारामआनंदोलन का उच्चार है। जो सीधा अंतर से निकलता है।सभी नदियां समुद्र को ही मिलती है ।लेकिन यह रूचि भेद है।बाकी सब कुछ एक है।।
बापू ने कहा कि हम जीव है इसलिए हम स्थूल को पकड़ लेते हैं। मैं नैपकिन को पकड़ु वह स्थूल है लेकिन उनमें सूक्ष्म रूपी कबीरी ताने और बाने हैं। घड़ियाल स्थूल है लेकिन समय सूक्ष्म रूप में है। कोई साधु गुरु मिले तब हम स्थूल से सूक्ष्म तरफ की यात्रा शुरू करते हैं।घड़ियाल स्थूल है लेकिन काल के अनुसार सचेत होना वह सूक्ष्म है। दर्पण स्थूल है इसलिए यह पकड़ सकते हैं लेकिन उनमें दिखता हमारा चेहरा प्रतिबिंब सूक्ष्म है इसलिए पकड़ में नहीं आता।ऐसी एक चौपाई तुलसी जी ने लिखी:
जो मुख मुकुरमुकुरनिब पानी।
गहि न जाइ अस अद्भुत बानी।।
जब चित्रकूट की सभा में भरत जी बोले तब विदेह राज जनक ने सभी ऋषि मुनियों और राम लक्ष्मण की हाजरी में बताया कि हम सब सुनते हैं वह दर्पण में पकड़ में तो आता है लेकिन भरत जी क्या कहना मांगते हैं वह सूक्ष्म रूप है, पकड़ में नहीं आता।। हमें कोई अंगूठी भेंट में दे वह स्थूल है लेकिन उनमें लिखा राम नाम सूक्ष्म है इसलिए हनुमान जी ने अंगूठी मुख में रखकर यात्रा की है।।
यह कुदरत की अद्भुत रचना है, स्थूल में से सूक्ष्म और सूक्ष्म में से स्थूल बनाता है। वट वृक्ष बीज में से निकलता है और बड़ा घेघूर बट बनता है इस वक्त वृक्ष की बीज में सूक्ष्म वट भी अंदर है। पोथी स्थूल है लेकिन इनमें से निकलते परमार्थिक अर्थ सूक्ष्म है आज यहां के पूज्य स्वामी जी-जो दयानंद स्वामी जी की परंपरा के आर्ष विद्या मंदिर के स्वामी है- उसने बताया कि संन्यासियों को रहस्य नहीं खोलना चाहिए लेकिन फिर भी बताया कि यह मेरे पीले वस्त्र का पका हुआ फल रामकथा के सफेद वस्त्र के कारण है।।मतलब कि जब वह छोटे थे तो मोरारी बापू की रामकथा गुजरात के जामनगर में सुनते थे बापू ने कहा कि इतना कुबूल करना बहुत कठिन है। यह स्थूल में से सूक्ष्म की ओर की यात्रा है।। रामायण के प्रसंग स्थूल है,इनमें रहे पदार्थ सूक्ष्म है। पृथ्वी स्थूल है लेकिन निकलते पदार्थ सूक्ष्म है। वर्ण स्थूल है लेकिन साधू इनमें सूक्ष्म रूप है। साधु चारों वर्णों का ज्यूस है,अर्क हे।।
बापू ने आज अनंत श्री विभूषित,परिव्राजकाचार्य कैलाश पीठाधीश्वर पंचम पीठ महामंडलेश्वर विष्णु देवानंद गिरि जी (बापू के चाचा दादा) की दो बात बताई।
विष्णु दादा ने लिखा कि जगत में पांच दर्पण है:
एक-शास्त्र दर्पण,दूसरा-गुरु दर्पण,तीसरा-गुरु ने दिया हुआ मंत्र दर्पण,चौथा-सूत्र वेदों के वाक्य का दर्पण और पांचवा सभी दर्पण का दर्पण-साधु दर्पण।साधु सूक्ष्म दर्पण है।।यह बात कर के दर्पण अष्टक भी लिखा है।
पूरे रामचरितमानस में साधुता शब्द एक बार,सब बिधि साधु एक ही बार और परम साधु शब्द भी एक ही बार आया है।।
बापू ने कहा कि साधु तसवीर नहीं हमारा तकदीर है जब दर्पण अष्टक लिखा,आठ दर्पण की बात की लेकिन वह कौन से आठ दर्पण वह नहीं लिखा है। बापू ने कहा कि मेरे दादा ने नहीं लिखा लेकिन पौत्र कहता है कि शायद मेरे दादा के मन में यही भाव होगा। उनके आठ दर्पणों में:मन,बुद्धि,चित्,अहंकार धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष रहे होंगे।।
विश्वामित्र के यज्ञ को पूरा करके राम जनकपुर की यात्रा करते हैं।।बीच में अहल्या का उद्धार किया। गंगा की कथा को सुनकर जनकपुर में जानकी जी के सुंदर सदन में निवास किया।।जहां भक्ति रहती है वही प्रभु बसते हैं।।भक्ति होती है वही सुंदर होता है शाम होने पर नगर दर्शन पर गए और विदेही नगरी में नाम और रूप का प्रभाव बढ़ाया।।और फिर धनुष यज्ञ हुआ। सीताराम जी का विवाह हुआ और धनुष्य के दो टुकड़े हुए तो उनका भाव बापू ने संवादी रूप से सुना कर सीता विदाई का करूण प्रसंग दिखाया और जब सीता जी अयोध्या में आई।।
बाद में विश्वामित्र ऋषि अयोध्या को छोड़कर वापस वन में जाते हैं वह करूण प्रसंग कहकर बालकांड का समापन किया।।
कल इस राम कथा का विराम का दिन है।।
साधु
साधु मन विशुध्ध एक तिरथ
साधु भक्तिगंग भगीरथ
साधु सकल लोक मां न्यारो
साधु बावन अक्षर बारो
साधु माळाकेरोमेरु
साधु दीन हीनननुंदेरुं
साधु वरण नथी के जाति
साधु सुर अनेसुकराती
साधु नरसिंह मीरां नानक
साधु थाकेलानुं थानक
साधु मानवतानुं मानक
साधु प्रेम नीतरतुंपानक
साधु सत्य राम सुखराशि
साधु पूर्ण प्रेम ब्रज बासी
साधु करुणा मां कैलासी
साधु तोडे बंधन बेडी
साधु महावीर नीकेडी
साधु शुध्ध रुप सोहागी
साधु बुध्धकोइबड़भागी
साधु परम तत्व परखंदो
साधु मोटा घर नोबंदो
साधु लाख जनेता तोले
साधु बाप! कही ने बोले
साधु गगन मारगीगाणुं
साधु निर्दोषोनुंनाणुं
साधु दोष कदी ना देवे
साधु शुध्ध सनातन सेवे
साधु करुणा कुमकुम चोखे
साधु पतित जनो ने पोंखे
साधु ब्रह्म बावडे झाली
साधुवआवे घर लग हाली
साधु भय कदी न भाखे
साधु निरभे पद मां नांखे
साधु सहज मंत्र सुखकारी
साधु नित्य नूतन अवतारी
साधु ब्रह्मा मुख बिरदायो
साधु गीता मां य गवायो
साधु चार वेद नोछांयो
साधु परमारथनोपायो
साधु जन्म्योनथीज्यायो
साधु नीज इच्छा ए आयो
साधु इश्वर एक कहायो
साधु ‘पार्थदास’ गुण गायो

