
गुरु की करुणा है तो पवित्रता और नसीब न होने पर भी हम उनके पास रह सकते है।।
प्रशंसा और निंदा सहन करना आज के काल का तप है।।
निंदा स्तुति सहन करें वह तप है।।
परम विष्णु-राम की चार भुजायें कौन सी है?
देवभूमि उतराखंड की दिव्य चेतनाओं से भरी विष्णु प्रयाग की भूमि से प्रवाहित रामकथा का आज छठ्ठा मुकाम बापू ने बताया कई प्रकार की यह संगम भूमि है।
श्रीमन महाप्रभु जी ने कहा है चिंता किस बात की? सेवा करो!
कुंभज ऋषि के आश्रम से कथा सुनकर शिव और सती लौटते हैं और रास्ते में भगवान राम की लीला चलती है वहां से उठाई गई पंक्तियों पर हमारा संवाद चल रहा है तब ब्रह्म का एक परिचय पतंजलि योग सूत्र में आया है।जो बिल्कुल विष्णु को भी लागू पड़ता है।वहां लिखते हैं:
तप: स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधानानी क्रियायोग
गुरुमुख हो जाए तो यह बहुत सरल है,विद्वत मुख होने से बहुत क्लिष्ट लगता है ।किसी साधु के पाले पड़ जाए तो मां के दूध की तरह पिला सकता है। तंदुरुस्त व्यक्ति को ८ घंटे की नींद चाहिए। लेकिन हमारे शरीर की रचना ऐसी है कि यह सूत्र सबको लागू नहीं पड़ता।।मां के पेट में २४ घंटा बच्चा सोता है तब कुछ सर्जन होता है। विज्ञान कहता है जो बच्चा २४ घंटा मां के पेट में सोया है वो बिल्कुल विकास करता है लेकिन यदि २४ घंटे नहीं सो पाया तो विकलांग पैदा होने की संभावना है। सोता है तो विकास होता है,जगेगा तो विकास रुक जाएगा।।फिर बाहर आने पर सोने का समय कम होता है। मां की गोद में बच्चा सोता है तो २४ घंटा नहीं सोता। जिन्हें मां की गोद और बाप का कंधा मिले वह भाग्यशाली है।।नींद धीरे-धीरे कम होती जाती है तंदुरुस्त व्यक्ति को कम से कम ८ घंटे की नींद करनी चाहिए।लेकिन उम्र होती है तो नींद कम होती जाती है।बड़े बुजुर्गों की नींद बहुत कम हो जाती है तीन-चार घंटा सोते हैं, लेकिन बुझुर्गों अन्य पर जल्दी उठने का दबाव डालता है यह हिंसा है।।शास्त्रों ने जो निर्णय दिया है वह समझना पड़ेगा। आचार्य गाधर्व राज कहते हैं: प्रत्येक नदियां अपनी गति से मोड़ लेती है,लेकिन सागर में मिल जाती है, वैसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशेषताएं होते हुए भी रुचि अनुसार ब्रह्म प्राप्त करती है।।
विष्णु भगवान के पंच कर्म है।वह वैष्णवन को भी करने चाहिए।सीधे-सादे,यदि ईमानदार हैं तो हम यह कम कर सकते हैं।पहला है-नित्य कर्म: हम प्रतिपल कर्म करते हैं,पैर हिलाते हैं,सांस लेते हैं, धड़कन चलती है और शरीर में रुधिर का बहन यह कर्म चालू है।।
कल मैंने कहा था कि पवित्र और नसीब वाला व्यक्ति ही बुद्धपुरुष के पास रह सकता है। लेकिन दोनों नहीं है और गुरु की करुणा है तो भी वह गुरु के पास रह सकता है।।पवित्रता का मतलब नहा धोकर,तिलक करके,बेरखा लेकर ऐसा नहीं है, राग द्वेष से मुक्त है वह पवित्र है।।दूसरा निमित्त कर्म है तीसरा काम्य कर्म जो हम शौच,स्नान संध्या आदि करते हैं,अनुष्ठान करते हैं।चौथ प्रायश्चित कर्म है: इरादा ना हो लेकिन कुछ पाप हो गए तो श्राद्ध,तर्पण तीर्थ में होम हवन यह हमारे प्रायश्चित कर्म है।और पांचवा देश काल के अनुसार कर्तव्य:जैसे कोरोना आया तो हमें बाहर नहीं निकलना।स्थिति के अनुसार वह निभाना पड़ता है।।आओ! हम ऐसे पांच कर्मों का दर्शन करें।।
भगवान पतंजलि ने तीन वस्तु को क्रियायोग कहा है पहले कहा है:तप क्रिया योग है। लेकिन कठिन जटिल तप नहीं।तप में मध्यम मार्गी रहना।। प्रशंसा और निंदा सहन करना आज के काल का तप है। निंदा स्तुति सहन करें वह तप है।। स्वाध्याय को तप कहा है। कोई भी सदग्रंथ का स्वाध्याय भी हो सकता है।।और तीसरा है तप और स्वाध्याय को ईश्वर को अर्पण करना वह क्रियायोग है।।
परम विष्णु राम की चार भुजा कौन सी है?बांए हाथ पर बिराजती जानकी बांई भुजा है।।भाई को भी भुजा कहा है।तीनों भाई राम-परम विष्णु की दूसरी भुजा है।।अपना मित्र सखा भी अपने हाथ है। सुग्रीव आदि मित्र राम की तीसरी भुजा है और सेवक हमारा हाथ है। हनुमान जैसा सेवक राम की चौथी भुजा है।।
विष्णु चार मुक्ती-गति प्रदान करते हैं:
सालुक्य मुक्ति:वह लोक प्रदान करते हैं जीस लोक में विष्णु रहते हैं।जो विभीषण को प्रदान की।
सारूप्य मुक्ति:उनका रूप प्रदान करते हैं।
सायुज्य मुक्ति:जहां तक विष्णु का आयुष्य है वहां तक मुक्त आयुष्य देता है।जो हनुमान जी को प्रदान किया।।सामीप्य मुक्ति: अपने समीप पास बैठाते हैं जो लक्ष्मण जी को प्राप्त हुई है।।
चारों राजकुमारों का नामकरण संस्कार और फिर विद्या संस्कार करके राजकुमार लौटते हैं और सभी विद्या उनमें आती है।। बाद में यज्ञ रक्षा के लिए विश्वामित्र दशरथ के दरबार में आने वाले हैं उस संवाद पर आज की कथा का विराम हुआ।।

