Homeगुजरातये स्थान प्रयाग कैसे?

ये स्थान प्रयाग कैसे?

बापु ने बताया अपना पूरा आरोग्य विभाग।

मुट्ठी खोल दो! तो मुक्त ही हो,बंद मुट्ठी खोल दो।।

एक दिन आएगा अपने मुल खुराक की और जगत को रिवर्स जाना पड़ेगा।।

शरीर साधना का पहला कदम है।।

फिर मन,बुद्धि चित्त की गुफा में जाते-जाते अहंकार के खड़क को तोड़ के आत्म उपलब्धि होती है।।

दो वस्तु रोज गानी चाहिए:गीता का गान करो और सहस्त्रनाम का गायन करो।।

 

जो कइ प्रकार से संगम भूमि है ऐसे विष्णु प्रयाग की पवित्र भूमि पर चल रहा रामकथा अनुष्ठान सांतवे दिन में प्रवेश कर रहा है तब बापू ने बताया जहां प्रयाग होता है वहां तीन वस्तु की प्रधानता होती है जैसे तीर्थराज प्रयाग में है:एक-यहां संगम जरूरी है यह शर्त नहीं लेकिन आवश्यक है।-दूसरा यहां अक्षय वट होना चाहिए,बिना अक्षय वट प्रयाग कहना प्रश्न है।और तीसरा माधव होना चाहिए।।

हम इस स्थान को विष्णु प्रयाग कहते हैं।लेकिन वह बात बताने से पहले एक श्रोता का प्रश्न था कि बापू में बहुत तामसी हूं।तमोगुण की बहुत प्रधानता है इसलिए तामस देह से भजन भक्ति नहीं कर पाऊंगा तो मेरी मुक्ति के लिए कोई उपाय बताएं।।बापू ने कहा कि हम जीव है।किसी में तमोगुण,किसी में रजोगुण,किसी में सत्वगुण मात्रा भेद से होता है।। मानस महामंत्र कथा में कहा था स्विकार,मौन, संतोष आदि नव महामंत्र बताए थे।।लेकिन मुट्ठी खोल दो! तो मुक्त ही हो,बंद मुट्ठी खोल दो।।जगतगुरु शंकराचार्य भगवान ने अपने ढंग से इस बात को प्रस्तुत किया है।जैसेभूमिती में सीधी रेखा खींच ने के लिए दो बिंदु को जोड़ने से रेखा सीधी बनती है।।बापू ने पाची पेन लेकर और शिक्षक बनकर व्यास पीठ पर यह दिखाते हुए कहा कि कभी मोड लेने से,गोलाइ से जाने से रेखा सीधी नहीं भी हो सकती।लेकिन रेखा बहुत काम करती है।रेखा का विज्ञान है।हस्तरेखा,भाग्य रेखा,पद रेखा आदि।।

शंकराचार्य कहते हैं एक बिंदु से सीधा चलो और वह पहला बिंदु है:प्राणस्पंदनिरोधात्।

आइंस्टीन बहिर जगत के और पतंजलि अंतर जगत के वैज्ञानिक थे ऐसा ओशो का निवेदन है।।

बापू ने अपनी पुरानी यादें ताजा करते हुए कहा कि जब छोटे थे।मॉं रोटी और भाकरी शेक देती थी,चाय के साथ खाते थे वही हमारा ब्रेकफास्ट था! और सुबह में सुदर्शन चूर्ण गर्म करके पिला देती थे। रात को हिंगाष्टक जो स्वादिष्ट लगता था तो हम चाट कर खा जाते थे!हमारे घर में अमृतांजनबाम की छोटी सी कांच की डिब्बी रहती थी।आज भी आश्चर्य चकित हूं कि अमृतांजनबाम पूरे गांव में सिर्फ प्रभु दास बापू,यानी कि हमारे घर में ही होती थी और गांव में से कोई भी यह लेने आए तो थोड़ा सा अमृतांजन देते थे।।लेकिन पूरी डाबी पूरे गांव के लिए पर्याप्त थी। शायद यही हमारा अक्षय पात्र है। आज भी मुझे यह आश्चर्य है।।हार्ट अटैक की बात ही तब पता नहीं थी।।कभी-कभी छाती में दुखता था तो नीलगिरी का तेल लगा देते थे।यही औषधि थी और गले के लिए कफ के लिए खदिरादीवटी रखता था,लेकिन खाता नहीं था।।यही हमारा आरोग्य विभाग!

न वॉक करना,न प्राणायाम,न कसरत।यहां बैठकर तीन-चार घंटे में सभी प्राणायाम और कसरत आ जाती है।।एक दिन आएगा अपने मुल खुराक की और जगत को रिवर्स जाना पड़ेगा।।

शरीर साधना का पहला कदम है।फिर मन,बुद्धि चित्त की गुफा में जाते-जाते अहंकार के खड़क को तोड़ के आत्म उपलब्धि होती है।।

शंकराचार्य जी कहते हैं दूसरा है:सतसंगात्- किसी साधु के पास बैठना।तीसरा वासना त्यागात् और चौथा सूत्र:विष्णुचरणभक्तियोगात्- धीरे-धीरे मन शांत होगा।लेकिन कोशिश निरंतर चलनी चाहिए। तमस देह से यह नहीं कर पाओगे। जिसका मन निर्विकल्प हो गया,हृदय शीतल हो गया,जो पूरे जगत को मुक्ति मानता हो इसकी मुट्ठी में मुक्ति आ जाती है।।

मन कोई पदार्थ या चीज नहीं जो किसी को दे सके मन का स्वभाव संकल्प विकल्प है।।

यह विष्णु प्रयाग है।।तो यह प्रयाग कैसे?विष्णु के पैर से गंगा निकलती है तो यह गंगा तो है ही।।यमुना क्या है?आदित्य में मैं विष्णु हूंप्रकाश में मैं सूर्य हूं ऐसा परम विष्णु ने कहा है।जहां सूर्य होगा वहां सूर्यपुत्री यमुना अदृश्य रुप में,भाव रुप से,श्रद्धा रूप में होगी और बैकुंठ और क्षीर सागर में विष्णु विराजते हैं।।भगवान को जब जगाये जाते हैं दो व्यक्ति विणा वादन करती है:एक है नारद और एक है सरस्वति।। इससे सिद्ध होता है गंगा,यमुना और सरस्वती का यह संगम है।।अक्षय वट भी है।विश्वास का वट वृक्ष यहां के अचल पहाड़ वटवृक्ष है।।माधव कौन है?भगवान के सहस्त्र नाम में एक नाम माधव है।।

शंकराचार्य जी ने कहा दो वस्तु रोज गानी चाहिए गीता का गान करो और सहस्त्रनाम का गायन करो फिर भज गोविंदम का गान करो।।रामचरितमानस में २७ स्तुतियांहै।।जो २७ नक्षत्र है।।

राम-लक्ष्मण विश्वामित्र की यज्ञ रक्षा के लिए निकले बीच में अहल्या का उद्धार करते हुए जनकपुर में पहुंचे।और जनकपुर नगर दर्शन के बाद जब धनुष यज्ञ हुआ राम ने धनुष्य भंग किया और राम सीता और चारों भाइयों का विवाह हुआ।।परशुराम जी आए और यह सब बातें संक्षिप्त में बताते हुए राम लक्ष्मण और चारों भाइयों अयोध्या में निवास करते हैं और यहां बालकांड का समापन किया गया।।

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