
मृत्यु जब अमृत का रूप धारण कर लेती है तब आदमी ब्रह्म को पाता है और खुद ब्रह्मरूप हो जाता है।।
सात प्रकार की कामना है जो नष्ट हो जाए तो आदमी ब्रह्म को प्राप्त कर ले,खुद ब्रह्ममय हो जाए
हमारा गुरु भी हमारी निजता बरकरार रखते है।। प्रकृति का अनादर करें वह परमेश्वर का अनादर करता है।
किसी बुद्धपुरुष के आश्रय में रहना परम स्वतंत्रता है
तीर्थ में आए तो यात्री बनकर आए, व्यापारी बनकर नहीं।।
आजकल बिकाऊ चिंतन है,टिकाऊ चिंतन रहा नहीं
पतित पावनी भगवती मॉं गंगा के तट पर चल रही रामकथा के दूसरे दिन बुधवार को कठोपनिषद के इस महिमावंत मंत्र से आरंभ किया
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥
(जब हृदय में स्थित (छिपी हुई) सभी कामनाएँ (इच्छाएँ) पूरी तरह से समाप्त हो जाती हैं,तब यह मरणधर्मा (नश्वर) मनुष्य अमर हो जाता है और इसी जीवन में ब्रह्म (परम सत्य/ईश्वर)को प्राप्त कर लेता है।)
“प्रमुख विशेषताएँ:कामनाओं का नाश: यह श्लोक बताता है कि वास्तविक मुक्ति या अमरत्व इच्छाओं के दमन से नहीं, बल्कि उनके हृदय से पूरी तरह मिट जाने से मिलती है।जीवनमुक्ति:’अत्र ब्रह्म समश्नुते’ का अर्थ है कि मोक्ष के लिए मृत्यु या कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है,इसी शरीर में रहते हुए परमानंद की अनुभूति की जा सकती है।मुख्य स्रोत: यह मंत्र मुख्य रूप से कठोपनिषद (२.३.१४) और बृहदारण्यकोपनिषद् में उल्लिखित है। इसे श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय २, श्लोक ५५ के संदर्भ में भी उद्धृत किया जाता है।।
यह मंत्र का सरल अर्थ यह है कि जब हमारे हृदय में रही सभी कामनाएं खत्म हो जाएं,मृत्यु अमृत में परिवर्तित हो जाएगा।।और मृत्यु जब अमृत का रूप धारण कर लेती है तब आदमी ब्रह्म को पाता है और खुद ब्रह्म रूप हो जाता है।।यह मंत्र उपयोगी होता है गंगा के तट पर हम बैठे हैं।गंगा के जल को ब्रह्मवारि कहा है।।यह जल एचटुओ नहीं है।।गंगा देवी के रूप में मॉं है। गंगा स्वयं अमृत है।गंगा का जल अमृत है। गंगा का दर्शन अमृत है।।गंगा की स्पर्श अमृत है।।गंगा में स्नान अमृत है।। गंगा की बुंद अमृत है।।यह अमृतमयीमें मॉं है।।गंगा का पान अमृत है।।
दरस परस मज्जन अरु पाना।
हरहि पाप कह वेद पुराना।।
हम दर्शन,आचमन,स्पर्श,स्नान तो कर रहे हैं।। वेद पुराण गलत नहीं हो सकते।तुलसी तो कभी गलत नहीं हो सकते।।यदि हमें पाप से मुक्त कर दे कैसे यह घटना घटेगी?
सात प्रकार की कामना है जो नष्ट हो जाए तो आदमी ब्रह्म को प्राप्त कर ले,खुद ब्रह्ममई हो जाए। हम सब अपने आप को पूछे कि सात प्रकार की कामना कम हुई? एक है:मनोकामना।।लोकेषणा, धन की इच्छा-वितेषणा,पुत्र कामना-सूतेषणा। विजय की कामना।स्वतंत्रता की कामना और कामना मुक्त रहने की कामना।।
कामादि दोष रहितम् कुरु मे-
समस्या यह है कि इस परिस्थिति में कोई साधु प्रवेश करता है तो परिवार उसे रोकता है!चैतन्य महाप्रभु के जीवन में भी ऐसी उदासीनता दिखती है।।
मेरे दादा विष्णु देवानंद गिरि जी को ममता छूट गई लेकिन महत्व बरकरार रहा था।।विष्णु दादा ने पूरे गांव के एक-एक आदमी को नाम से याद किया था स्वतंत्रता की कामना होनी चाहिए।।हमारा गुरु भी हमारी निजता बरकरार रखते है।। प्रकृति का अनादर करें वह परमेश्वर का अनादर करता है।किसी बुद्धपुरुष के आश्रय में रहना परम स्वतंत्रता है गंग सकल मुद् मंगल मूला।
सब सुख करनि हरनि सब सूला।।
गंगा मंगल का मूल,सब प्रकार का सुख देने वाली और सभी बाधाओं को मिटाने वाली है।।गंगा कहां से प्रगटी? विष्णु के नख कमल से,ब्रह्मा के कमंडल से,शंकर की जटा से।।लेकिन आदमी का जन्म अनेक माता होती है।।यह कामना नष्ट तो नहीं होगी मात्रा कम होगी तो भी हमारा काम बन जाएगा।। हमारे आसपास अमृत है। समझ में आए तो हम अमृत के संतान है।।वैसे चंद्रमा में अमृत है,देवों के पास स्वर्ग में अमृत की बूंद है,पाताल में अमृत है, स्त्री के होंठ पर अमृत है।।लेकिन पृथ्वी में चारों ओर अमृत है।।तीर्थ में आए तो यात्री बनकर आए, व्यापारी बनकर नहीं।।सभी जगह धंधा लेकर मत जाओ।।
लंका कांड में एक चौपाई में लिखा है: मरु मरु मरु धरू धरू….. माथा फोड़ डालो,हाथ खींच लो! मैने दादा से अर्थ पूछा।।यह इंद्रजीत जब प्रवेश करता है तब वर्णन आता है।इंद्रजीत काम है, कुंभकर्ण लोभ और रावणस मोह है।।कामना की बुद्धि मस्तक नष्ट करें और हाथ रूपी कर्म खत्म करो।।
आजकल बिकाऊ चिंतन है,टिकाऊ चिंतन रहा नहीं
== समाप्त ==

