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तलगाजरडी ‘शीरी झूबां’ ने हार्वर्ड की भव्य ऐतिहासिकता को दिव्य अध्यात्म में पलट दिया।

रामकथा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की नींव में सनातन मजबूत पत्थर बनकर युगों युगों तक स्थिर रहेगी:भुपेन्द्रभाइ पंड्या।।

सुंदर फ्लावर्स का बाग बनाने वाले हमारे बागबान-माली बापू को बहूत प्रणाम:भुपेन्द्र भाइ।।

बुद्धपुरुष के रहने के केवल चार स्थान है।।

सच्चा बुद्धपुरुष सज्जन मंडली में नहीं,खल मंडली में रहता है।।

समाज का उच्चारण दीर्घ ना हो,आचरण दीर्घ होना चाहिए।।

श्रेष्ठतम व्याख्यान मौन है।।

बुध्धपुरुष जगत कल्याण के लिए जलता रहता है।।

साधु का कोई धर्म नहीं होता,साधु स्वयं धर्म है।।

हार्वर्ड में बापू ने बताया ‘हाउवर्ल्ड’।।

जहां कइं विश्व प्रसिध्ध वैज्ञानिक,स्कोलर्स,बडे राजनेताओं और नोबल पारितोषिक से विभूषित विद्वजनों ने पढाइ की है ऐसी दुनिया की शिरमोर युनिवर्सिटी-हार्वर्ड के भव्य हॉल की सुंदरतम बेन्चीस पर खचाखच भरे हॉल में बैठे श्रोतागण और भी भव्य लगते है जब व्यासपीठ पर बापू बिराजीत है और बाप! शब्द की ध्वनि गूंजती है तो पूरा वातावरण भव्य में से दिव्य और ऐतिहासिक पल आध्यात्मिक अनुभूतियों में बदलने लगती है।।

जब सावन मास की नागपंचमी सोमवार के दिन रामकथा तिसरे दिन में प्रवेश कर रही है।।

कथा के आरंभ में विद्वान वक्ताओं के वक्तव्यों की श्रेणी में आज भागवत कार भूपेंद्र भाई पंड्या ने अंग्रेजी और हिंदी में विद्वता से भरा प्रवचन करते हुए कहा की व्होट इस ध परपज फॉर बीइंग हीअर? परपज से प्रभु प्राप्ति तक जीवात्मा का परम,श्रेष्ठ लक्ष्य है आनंद की अनुभूति।।

भूपेंद्र भाई ने श्रीमद् भागवत,विवेक चूड़ामणि शंकराचार्य जी और अनेक महानुभावों को क्वॉट करते हुए अपनी बात रखी और बताया कि मनुष्य जन्म दुर्लभ है लेकिन टेंपरेरी है।।और यहां एक भूल है:बहुत से लोग दुख के नाश को ही सुख और इंद्रिय से प्राप्त के सुख को आनंद समझते हैं! हालांकि आनंद सुख-दुख से पर है।।

और एआइ के इस जमाने में सोश्यल मीडिया में एल्गोरिथम करके युवा जनरेशन को टारगेट करना, मिसगाइड करना ऐसा समाज में चल रहा है, ऐसे वक्त पर मेन क्रीएटेड ध मशीन टू मेक लाइफ सिंपल।और वही मशीन आदमी को पूछ रहा है कि आप साबित करो कि आप रोबो नहीं है! जब सुपर एआई आएगा तब क्या होगा!?मानव मशीन न बन जाए और मशीन मानव ना बन जाए वह ध्यान रखना है।।

क्लोनिंग के फील्ड में सफलता के बाद यह संशोधन को रोका गया।लेकिन इसका बाय प्रोडक्ट रोबोट और एआइ आया है।।

भूपेंद्रभाई ने बताया कि ईस्ट और वेस्ट बोथ आर वंडरफुल,लेकिन उनका एक्सट्रीम गलत है।केवल पश्चिम या केवल पूर्व बूरा है यह आउटडेटेड विचार है।।बहुत पढे है उनके लिए स्कॉलर कहते हैं और स्कॉलर का संस्कृत बहुश्रृत कहते हैं।।बहुत पढ़ा है उनकी वैल्यू नहीं लेकिन बहुत सुना है उनकी वैल्यू है जो कुछ सुना या पढा वह हमारे जीवन में आए तब सफल होगा।।

रामकथा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की नींव में सनातन मजबूत पत्थर बनकर युगों युगों तक स्थिर रहेगी और सनातन के विचारधारा का मंदिर बनेगा और उसके ऊपर रिषी संस्कृति का ध्वज सदियों और सहस्त्राब्धियों तक लहराता रहेगा ऐसा सुंदर भाव व्यक्त करते हुए बताया कि ऐसे सुंदर फ्लावर्स का बाग बनाने वाले हमारे बागबान-माली बापू को मेरा खूब-खूब प्रणाम।।

कल इसी श्रृंखला में डॉक्टर अश्विनी कुमार राजगोर का वक्तव्य रहेगा।।

तिसरे दिन के आरंभ में लंडन से आये युवक ने प्रश्न पूछा था वो उठाते हुए बापू ने कहा की पूछा गया है की जब वाल्मीकि को राम जी रहने के स्थान पूछते है तब वाल्मीकि जी पहले तो ये पूछते है की आप कहां नहि है।राम जी ने कहा की अकेला मैं तो व्यापक हुं मगर जानकी और लक्षमण सहित मुजे रुकना है तो ऐसे स्थान बताये जहां किसी को उद्वेग न हो।

युवक ने पूछा कि भगवान के रहने के १४ स्थान है लेकिन बुद्धपुरुष का कौन सा स्थान है?मेरे फ्लावर! बुद्धपुरुष के रहने के केवल चार स्थान है।यद्यपि गुरु अखंड मंडलाकार सचराचर व्याप्त है।लेकिन हमारा गुरु हमें देख पाए हम उसे देख पाए।हमें रूबरू चाहिए।

शंकराचार्य जी कहते हैं पूरी दुनिया में अद्वैत रखना लेकिन गुरु के पास द्वैत रखना की यह मेरा बाप है और मैं उनका आश्रित हूं।।

शंकराचार्य खुद अद्वैतवादी है लेकिन गुरु की बात आती है तब द्वैत है।।बुद्धपुरुष कहां रहता है?सच्चा बुद्धपुरुष सज्जन मंडली में नहीं,खल मंडली में रहता है।।तंदुरुस्त लोगों की जमात में डॉक्टर नहीं रहता,मरीजों के बीच रहना चाहिए।।

विभीषण को राम ने साधु,सज्जन और संत कहा। राम ने तीन संबोधन कीये।। हमारे सुभाष भाई को संत शब्द बहुत प्रिय है।सत् शब्द पर आचरण की ध्वजा लग जाए तो संत होता है।।

बापू ने बताया कि उच्चार छोटा मगर आचरण बृहद रखना चाहिए।में वाचन नहीं लेकिन पाचक जरूर हूं मानस में दो-तीन प्रपंच गुरु कालनेमी,कपट मूनि जैसे भी है।।नारद है,त्रिभुवन गुरु शिव है,बृहस्पति है आवेशावतार के कारण परशुराम जिसने अनावश्यक वस्तुओं का नाश किया। व्यास और शुक भी है।।वाल्मीकि ने कहा आपको ब्रह्मा,विष्णु महेश भी नहीं जान पाए मगर आप जिन्हें जनाना चाहते हैं वह जान पाते हैं।।

समाज का उच्चारण दीर्घ ना हो,आचरण दीर्घ होना चाहिए।।और श्रेष्ठतम व्याख्या मौन है इसलिए दक्षिणा मूर्ति गुरु मौन बैठा है।।

विभीषण रूपी साधु को हनुमान पूछते हैं कि खल मंडली में रात दिन रहते हो तो धर्म का निर्वाह कैसे करते हो?गुरु बंधन को काटने वाला है,लेकिन स्वयं बंधन में रहता है।।श्रद्धा और प्रेम की डोर से गुरु बंध जाता है।किसी को परवश नहीं करता खुद परवश हो जाता है।इसीलिए हनुमान जी ने बंधन का स्वीकार किया।।तथा कथित ज्ञान बंधन है,वैसे ज्ञान मुक्ति का दरवाजा है।।

तीसरा स्थान:साधु अग्नि में रहता है।।जब राम प्रसाद से जानकी नहीं जली तो गुरु प्रसाद से बापू व्यासपीठ रूपी चिता में कैसे जलेंगे!बुध्धपुरुष जगत कल्याण के लिए जलते रहता है।।

गुरु हमारे मन,बुद्धि चित्त और अहंकार में रहता है।। कपट मुनि ने गुरु प्रसाद की मर्यादा बताइ और कहां गुरु कृपा जहां तहां कहेना मत, केवल अपने गुरु के पास ही कहना।।

रामकृष्ण मठ और मिशन के १३ वें अध्यक्ष स्वामी रंगनाथानंद जी को अमेरिका के शिकागो में एक महिला ने पूछा था तब स्वामी जी ने चार बातें बताई १-जिसे देखते ही लगे आदमी शुद्ध है वह गुरु प्रसाद प्राप्त व्यक्ति है।।२-जिसने अध्यात्म को स्वाभाविक रूप में पूरा पाया और पचाया हो।३-जिसके पास जाने से आंख में आंसू आ जाए।४-वाणी मौन हो जाए वह गुरु प्रसाद प्राप्त साधु है ।।

मैं मानस को विश्वविद्यालय समझता हूं। मुझे हार्वर्ड में ‘हाउवर्ल्ड’ कहना है।कैंब्रिज कथा में भी कुछ कहा था।सात सोपान से सात सूत्र मिलते हैं:

मानस में धर्म और अध्यात्म दोनों है।साधु का कोई धर्म नहीं होता,साधु स्वयं धर्म है।।राम साधु है। रामो विग्रह वान धर्म… सत्य,प्रेम करुणा आध्यात्मिक सूत्र है,तीनों सनातन है।।

तो १-धर्म अध्यात्म द्वारा दीक्षित है।।२-जीस विद्या धाम में ज्ञान और विज्ञान दोनों हो।मानस में दोनों है ३-हर विश्वविद्यालय में वसुधैव कुटुंबकम की भावना होनी चाहिए,जो मानस में है।।४-हरेक विश्वविद्यालय में संवेदनापूर्ण संवाद होना चाहिए।।५-हार्दिक बौधिकता होनी चाहिए।हृदय सिंधु बुद्धि सीप समाना।।६-निर्माण भी हो और निर्वाण भी हो।।७-विकास विश्राम दायी होना चाहिए।।जो सातों कांड में हमें दिखते हैं।।

रामकथा का आध्यातमिक इतिहास कहते हुऎ तुलसी जी ने लिखा की शिव ने सब से पहले ये कथा रचकर अपने मानस में रखी।फिर भुशुंडी जी को कही।।कैलास से उतरते कथा धरती पर आयी।। याज्ञवल्क्य से भरद्वाज से होते हुऎ तुलसी ने अपने गुरु से बार-बार सुनी और भाषाबद्ध करके अयोध्या में १६३१ में रामनवमी के दिन प्रकाशन हुआ।। रामचरित मानस नाम रखा गया है।।मान सरोवर का रूपक दे कर चार घाट बनाए।।हर घाट पर एक वक्ता और श्रोता बताया।।

एक बार के कुंभ में भारद्वाज ने संशय किया और जागबलिक से राम के बारे में प्रश्न पूछा।।वहां पूछी रामकथा और याग्यवल्क्य ने शिवकथा-शिव चरित्र से आरंभ किया।।पूरा शिव चरित्र सुनाते हुए शिव और पार्वती का विवाह हुआ और पार्वती एक दिन भल अवसर देख कर शिवजी से राम के बारे में प्रश्न पूछती है।।आज की कथा का वहां विराम हुआ।।

== समाप्त ==

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