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तुलसी जयंती का वैश्विक विस्तार: मोरारी बापू ने पहली बार भारत के बाहर मनाया तुलसी जयंती महोत्सव

कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स, 19 अगस्त 2026 — रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की जयंती, तुलसी जयंती, बुधवार को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सैंडर्स थिएटर में मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा ‘मानस गुरु प्रसाद’ के अंतर्गत मनाई गई। एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में, तुलसी जन्मोत्सव के अंतर्गत वर्ष 2010 से गुजरात के तलगाज़रडा में प्रतिवर्ष प्रदान किए जाने वाले तुलसी, व्यास, वाल्मीकि और रत्नावली पुरस्कार पहली बार भारत के बाहर प्रदान किए गए।

यह अवसर मोरारी बापू द्वारा 16 वर्ष पहले शुरू की गई उस परंपरा में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है, जिसके माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास की साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने, उसकी व्याख्या करने और रामकथा की परंपरा को आगे बढ़ाने में विशिष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता है।

बापू के लिए तुलसी जयंती समारोह को अमेरिका ले जाना सदियों पुरानी भारतीय साहित्यिक और आध्यात्मिक परंपरा को वैश्विक श्रोताओं के साथ संवाद में लाने का एक माध्यम भी है। हार्वर्ड के सैंडर्स थिएटर में आयोजित इस समारोह में संतों, विद्वानों, कथाकारों, संगीतकारों, कलाकारों और अकादमिक समुदाय के सदस्यों ने भाग लिया। यह विभिन्न संस्कृतियों और विषयों के बीच रामायण और रामचरितमानस के प्रति निरंतर बढ़ती रुचि को दर्शाता है।

तुलसी जयंती के पावन अवसर पर 19 अगस्त 2026 को तुलसी जन्मोत्सव एवं ग्लोबल अवॉर्ड्स समारोह आयोजित किया गया। पूज्य मोरारी बापू के आध्यात्मिक मार्गदर्शन में उनकी ‘मानस गुरु प्रसाद’ रामकथा के अंतर्गत आयोजित इस समारोह में नौ विशिष्ट विद्वानों, आध्यात्मिक नेताओं और सांस्कृतिक योगदानकर्ताओं को आठ प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किए गए।

वाल्मीकि पुरस्कार यूसी बर्कले के प्रोफेसर प्रो. सैली जे. सदरलैंड गोल्डमैन और प्रो. रॉबर्ट गोल्डमैन को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। वाल्मीकि पुरस्कार ओसाका यूनिवर्सिटी की प्रो. मडोका फुकुओका को भी प्रदान किया गया।

व्यास पुरस्कार कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रो. जॉन स्ट्रैटन हॉले, अमेरिका स्थित विद्वान डॉ. अश्विन भाई कांतिलाल राजगोर तथा प्रसिद्ध आध्यात्मिक वक्ता देवी चित्रलेखा (भारत) को प्रदान किया गया।

तुलसी पुरस्कार यूटी ऑस्टिन के प्रो. रूपर्ट स्नेल और सामुदायिक नेता पियूष भाई मेहता को प्रदान किया गया, जबकि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. डायना एल. एक को तुलनात्मक धर्म और भारत अध्ययन के क्षेत्र में उनके कार्य के लिए रत्नावली पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हार्वर्ड में इस ऐतिहासिक आयोजन को संभव बनाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा।

पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं का यह विविध समूह भारत के शास्त्रीय साहित्य के साथ बढ़ते अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव तथा रामायण और गोस्वामी तुलसीदास की विरासत की वैश्विक प्रासंगिकता को दर्शाता है।

इस अवसर पर बापू ने कहा, “पत्रं पुष्पं फलं — जैसे परमात्मा के चरणों में हम कुछ समर्पित करते हैं, पुष्प भी उसी ने खिलाए हैं, पत्र भी उसी ने टहनियों को दिए हैं, फल भी उसी ने लगाए हैं। फिर भी हम वही लेकर उसी को समर्पित करते हैं। मैं अपने हृदय के विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ।”

बापू ने आगे कहा, “मेरे मन में, मेरे दिल में, त्रिभुवन की कृपा के कारण, माँ सावित्री के कारण इतनी प्रसन्नता रहती है कि मेरे देश की व्यास पीठों की वंदना हो। और इस वंदना के उपक्रम में आज जिन-जिन महानुभावों को ये व्यास पुरस्कार, वाल्मीकि पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार और माँ रत्नावली के नाम से पुरस्कार प्रदान किया गया और आप सभी ने हमारी वंदना स्वीकार की, इसलिए मेरे सभी साधु-संतों का आशीर्वाद लेकर हम आपको प्रणाम करते हैं। हम आपकी वंदना करें और आप ‘थैंक यू’ कहें, यह मुझे रास नहीं आता। इसलिए आपकी प्रतिक्रिया, आपकी आँखों से, आपके दिल की धड़कनों से मैं समझ सकता हूँ और आपको प्रणाम करता हूँ।”

इस रामकथा के मुख्य आयोजक पावन पोपट ओबीई ने कहा, “बापू द्वारा दिए गए सत्य, प्रेम और करुणा के संदेश के माध्यम से रामकथा कुछ ऐसा प्रदान करती है जो पूरी तरह सार्वभौमिक है — स्वीकार, आनंद और प्रेम की ऐसी अनुभूति, जो भौगोलिक सीमाओं और संस्कृतियों से परे है। तुलसी जन्मोत्सव और इसके पुरस्कारों को हार्वर्ड तक लाना उसी यात्रा का स्वाभाविक विस्तार है। यह रामचरितमानस की कालातीत ज्ञान-परंपरा को ऐसे वैश्विक दर्शकों तक ले जा रहा है, जो इसके मूल्यों और आदर्शों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।”

बापू ने 2010 में तुलसी जयंती कार्यक्रम की शुरुआत उन व्यक्तियों को सम्मानित करने के उद्देश्य से की थी, जिन्होंने अपना जीवन रामकथा और रामचरितमानस की परंपरा को संरक्षित करने, उसकी व्याख्या करने और आगे बढ़ाने के लिए समर्पित किया है। तब से प्रत्येक वर्ष गुजरात के तलगाज़रडा में तुलसी जन्मोत्सव के अवसर पर संतों, विद्वानों, कथाकारों और अन्य विशिष्ट योगदानकर्ताओं को एक साथ लाया जाता रहा है। 2026 में यह कार्यक्रम अमेरिका पहुँचा और तुलसी जन्मोत्सव की इस परंपरा को वैश्विक दर्शकों तक ले गया।

हार्वर्ड में तुलसी जयंती का यह अंतरराष्ट्रीय आयोजन एक नए अध्याय का प्रतीक है। यह तुलसीदास की कथा, काव्य और आध्यात्मिक चिंतन को एक नए दर्शक वर्ग और एक अलग परिवेश तक पहुँचाता है, जबकि इस परंपरा की मूल भावना को अक्षुण्ण रखता है।

मोरारी बापू के बारे में

मोरारी बापू रामायण के प्रख्यात व्याख्याता हैं और पिछले छह दशकों से विश्वभर में रामकथा का वाचन कर रहे हैं। उनकी कथा का मूल उद्देश्य सार्वभौमिक शांति तथा सत्य, प्रेम और करुणा का संदेश फैलाना है। कथा का केंद्र स्वयं धर्मग्रंथ होता है, लेकिन बापू अन्य धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं के उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं तथा सभी धर्मों के लोगों को कथा में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामायण के लोकप्रिय रूप रामचरितमानस का वाचन करने की बापू की यह उल्लेखनीय यात्रा तब शुरू हुई, जब वे मात्र चौदह वर्ष के थे और तीन ग्रामीण लोगों के सामने कथा कह रहे थे। आज यह यात्रा उन्हें विश्व के विभिन्न हिस्सों तक ले गई है — भारत के प्रमुख शहरों और तीर्थस्थलों से लेकर श्रीलंका, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, इज़राइल और जापान तक — जहाँ लाखों लोगों ने उनकी कथाओं को सुना है।

बापू ने अनेक सामाजिक रूढ़ियों से परे जाकर समाज के विभिन्न वर्गों के लिए रामकथा आयोजित की है, जिनमें सेक्स वर्कर्स, ट्रांसजेंडर समुदाय तथा समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग शामिल हैं। वे भारत और विदेशों में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में सहायता पहुँचाने के कार्यों में भी सक्रिय रहे हैं, जिसमें युद्धग्रस्त यूक्रेन जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।

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