
कहानी सुलाती है, कथा जगा देती है।।
कथा को सुनने के लिये हमें सूक्ष्मश्रवा बनना पड़ेगा।।
कथा कहानी नहीं सुहानी है।।
हर सौंदर्य शिकार का भोग बनता है।।
हार्वर्ड युनिवर्सिटी के सभागार में भाव और प्रेम मग्न होकर बापू नाच उठे।।
पोथी के प्रताप से विश्व में सेतुबंध के लिये सदैव विचरण करती रहती तलगाजरडी व्यासपीठ से विश्व प्रसिध्ध हार्वर्ड विश्व विद्यालय के सेन्डर्स थियेटर मेमोरियल हॉल में रामकथा गुरुवार छठ्ठे दिन में प्रवेश कर रही है तब अनुष्ठान के रूप में रामकथा का गान हो रहा है। साथ तुलसी जन्मोत्सव अंतर्गत विविध संगोष्ठियां चल रही है।उस विशिष्ट वकतव्यों की शृंखला में लंडन यूके से पीयुष भाई मेहता ने अपने शब्द भाव रखें।।पीयूष भाई मेहता को कल तुलसी अवार्ड भी अर्पण हुआ ।।पीयूष भाई ने बताया कि हार्वर्ड में हरिद्वार की अनुभूति होती है। गुरु प्रसाद पर श्रीमद् भागवत का सूत्र लेकर बताया कि गुरु की प्रसन्नता क्या कुछ नहीं कर सकती! रामचरितमानस में अविद्या,अस्मिता,राग,द्वेष और अभिविनिवेश-जो पतंजलि के पंचकलेश है, तुलसी जी ने अपने रूप से लिखा है।
अविद्या को मोह कहा है और यह सब कुछ से बचने के लिए गुरुसेवा,गुरुकृपा ही साधन है।।
कल इसी श्रृंखला में शरद भाई व्यास और शनिवार को रामहृदय दास जी का वक्तव्य होंगा।।
बापू ने सभी अवार्ड पानेवालें और जिनकी उपस्थिति में यह कार्यक्रम हुआ सबको प्रणाम करते हुए बनारस से आया एक प्रश्न उठाया।।पूछा गया: विद्यापीठ और व्यासपीठ में श्रेष्ठ कौन? बापू ने कहा यहां कोई उच्च नीच नहीं,सब अपनी जगह पर योग्य स्थान पर बैठे हैं।फिर भी एक बात तो है,अपनी रचना किसी को प्रिय नहीं लगती?जो दूसरों की रचना को सुनकर हर्षित हो जाता है वे दुनिया को बहुत प्रिय होते हैं।।और एक प्रश्न था कहानी और कथा में क्या अंतर है?
बापू ने गुजरात विद्यापीठ का एक कार्यक्रम,परि संवाद याद किया जो वार्ता के विषय पर था।बापू को बुलाए गए और एक अध्यापक ने निवेदन किया की वार्ता में यह ताकत है कि हमारी दादी पलने में किसी बालक को वार्ता कहती है और बच्चा सो जाता है।।लेकिन ये कहानी होती है जो विकसित करती है।।कथा केवल वार्ता नहीं, कथा केवल कहानी नहीं है। वार्ता सुलाती है,कथा जगा देती है। सूक्ष्मश्रवा बनना पड़ेगा।। हम बहुधा स्थूल श्रवा रहते हैं।सूक्ष्म श्रवा बन जाते तब रहस्य उद्घाटित हो जाते हैं।जहां इंद्रिय प्रधान नहीं इंद्रियातित श्रवण प्रधान होता है।।मैं आपकी श्रवण भक्ति सफल करने के लिए कह रहा हुं मेरा परिश्रम के लिए नहीं,मुझे कोई थकावट नहीं है।।
बापू ने अज्ञेय जी की एक कहानी जो १९५० में लिखी गई।बापू ने कहा कि मेरे जन्म के ४ साल बाद लिखी गइ।।थोड़ी साहित्यिक बात है।कहानी का नाम है:सांप।।गुजरात में अज्ञेय ने एक यात्रा निकाली थी।।यह कथा कहानी नहीं सुहानी है।
मंगल करनि कलीमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गतिकूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।।
एक लड़की थी।निर्दोष चित्, भोली भाली। युवानी के आंगन में कदम रख रही थी और एक युवक आकर्षित होता है।।दिन-रात उसी के बारे में सोचता रहता है।लड़की को मिलने का मनोरथ था।वह सो गया।स्वप्न में वह लड़की दिखाई दी।जागा, लड़की को मिलने जाता है।दोनों कुछ कदम आगे बढ़ते हैं। प्रगाढ़ जंगल आता है।दूर जाते हैं।एक मकान आया मकान की दीवार के पास एक सांप पड़ा है। सर्प सुंदर है। भारत ने हर एक में सौंदर्य का दर्शन किया है। कुछ कूरुप नहीं,कूरुप सिर्फ नजर है।। लड़की स्वयं सुंदर है।लेकिन वह एक सांप को भी सुंदर कहती है। इस वक्त युवक कहता है कि कुछ सुंदर नहीं है।पत्थर मार कर मारूंगा तो गिर जाएगा! पुरुष हर सुंदरता का शिकारी होता है। इसी समय लड़की हाथ छोड़कर निकल जाती है और कहती है इतनी सुंदरता को पत्थर मारने की क्या जरूरत है? इसका जवाब कोई नहीं दे पाता है।।यह सूक्ष्मश्रवा ही समझ सकते हैं।हर सौंदर्य शिकार का भोग बनता है।कहानी लिखी,पढी,कहीं और सुनी जा सकती है।समझी और समझाइ भी जा सकती है यह कहानी के छह पहलू है।।कथा के भी छह पहलू है।।कथा जगा देती है। देश-विदेश में कथा युवान क्यों है? कान लेकर मत सुनो,नाक लेकर सुनो! नाक का मतलब है अपनी परंपरा,खानदानी,शील, सभ्यता लेकर सुनो! कथा की गंध आनी चाहिए। बापू ने बताया कि मिशन के लिए कोई अस्पृश्य नहीं है।।राजकोट में फूलछाब को कथा दी है।अगली जनवरी में।।और रामकृष्ण मिशन राजकोट का केंद्र उनके कुछ साल पूरे होने जा रहे हैं तो फूलछाब की कथा में रामकृष्ण मिशन की ओर से बात चली कि हमें भी हमारा नाम इससे जुड़ जाए!वैसे हमें कुछ प्रतिष्ठा नहीं चाहिए।।पूछा तो फूलछाब ने कहा की मिशन में कोई भेदभाव नहीं है।।गंगा सती ने ५२ पद लिखे लेकिन सूक्ष्मश्रवा बनाकर सुने तो वे बावन के बाहर है।।
बापू के प्रति द्वेष और विरोध करने वालें लिखते रहते हैं लेकिन मानो ये सब का बापू ने जवाब दे दिया हो ऐसे व्यास पीठ से उतर कर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मंच पर रास का गान करते हुए प्रेम और अश्रु भाव से मिश्रित खुद मुक्त मन से तुलसी जी की जयंती के उपलक्ष में नाच उठे और बापू के नृत्य ने पूरे हॉल को लिफ्ट कर दिया।भावमय बनाकर बापू को देखकर पूरा हॉल भावावेश में आ गया।।
== समाप्त ==

