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पहली बार विदेश की धरातल पर तुलसी जन्मोत्सव और देश-विदेश के विद्वदजनों को एवॉर्ड्स देकर वंदना की गइ।।

त्रिभुवन को तुलसी जयंति और राम जन्म की बधाइयाँ दी गई।।

रामकथा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में क्यों?

मेरी व्यासपीठ विश्व विद्यालय में शांति की खोज करने के लिए आई है।

विद्यापीठ को मिलने के लिए व्यासपीठ आई है।

राम शीला पत्थर लेकर सेतु बनाते हैं,मैं पोथी लेकर सेतु बना रहा हुं।।

हम पत्थर लेकर नहीं,पोथी लेकर आये है।।

गुरु तीन प्रकार से प्रसाद बांटता है : सविता द्वारा, कविता द्वारा और सरिता के द्वारा।।

पहली बार विदेश की धरातल पर त्रिभुवनीय सदग्रंथ के सर्जक तुलसीदास जी के जन्मोत्सव की बहुश्रृत विद्वजनो, कथावाचकों, साहित्य और कला के उपासको की विशेष उपस्थिति में विशेष समारोह के समांतर बह रही रामकथा धारा पांचवे दिन विश्व विख्यात हार्वर्ड युनिवर्सिटी के ऐतिहासिक हॉल में शुरु हूइ।तब आरंभ में भारत से विशेष पधारे हूए अनंत श्रीविभूषित परिव्राजकाचार्य जगदगुरु पूज्य स्वामी श्री रामकमलदासजी वेदांती जी महाराज ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए बचपन में तलगाजरडा में बापू की कथा सुनने श्रवण करने आए थे और आज बताया कि तुलसी जी ने वंदना करते हुए कविश्वर वाल्मीकि की वंदना कपीश्वर हनुमान जी से पहले की है। वह पूरा रस भरा प्रसंग बताया और अपना भाव रखा।।

कथा के मध्य यानी कि पांचवें दिन तुलसी जन्मोत्सव जब आज होने जा रहा है तब एक छोटा सा उपक्रम व्यास पीठ पर रचा गया।

तीन पुस्तकों का लोकार्पण बापू के शुद्ध हस्तों द्वारा हुआ।।

हेमा बहन ठक्कर(कर्मनों सिद्धांत लिखने वाले हीरा भाई ठक्कर की बेटी)जिन्होंने हीरा भाई के दौहित्र अनुज ने इंग्लिश में भाषांतरित किया हुआ एक ग्रंथ लोकार्पित किया।।

बाद में दो पुस्तक:’राम अल्टीमेट ट्रुथ एंड मीथ’ और ‘काम-बियोंड पेशन’ जो युग तुलसी पद्म भूषण संत रामकिंकर जी महाराज के विचारों का संकलन, भाषांतर मां मंदाकिनी रामकिंकर जी ने खुद प्रकाशित किया है-वो दोनों पुस्तक बापू के शुध्ध हस्तों से लोकार्पित हुए।।

और अष्टादश पुराण दर्शन(संकलन और लेखन डॉ. महादेव प्रसाद मेहता)जहां १८ पुराणों के प्रमुख तत्वों और उनके अप्रकाशित विषयों का संकलन है- वह भी बापू के शुद्ध हस्तों से लोकार्पित किया गया।।

कथा के आरंभ में बापू ने तुलसी जयंती के पावन दिन,कथा के मध्य दिन-पांचवें दिन पर पहुंची राम कथा पर यह बात बताई कि कई लोग सोचते हैं कि रामकथा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में क्यों?

भगवान राम सेतु बना करके जहां सीता बैठी है उसी लंका में सामने से गये। मेरी व्यास पीठ विश्व विद्यालय में शांति की खोज करने के लिए आई है। विद्यापीठ को मिलने के लिए व्यास पीठ आई है। मैं राम के कदमों पर चल रहा हूं।।लंका ने निमंत्रण नहीं दिया था कि राम यहां आए।रावण के अंतरंग भावनाओं को हम नहीं समझ पाएंगे। इस लंका में राम गए हैं जहां सीता बैठी है,शांति चिंतित है। समस्त विश्व की ऊर्जा का अपहरण हुआ है। जिनका सामर्थ्य जगत का सर्जन,पालन और विलय करना है।मानस के अंतर्गत सीता भगवान की विद्या और माया है,राम की छाया भी है और अभिन्न काया भी है।।एक अपहरित मातृशक्ति जो गलत हाथों में गई,उसे पुनः प्राप्त करने राम गए हैं,किसी को मारने नहीं गये। सेतु बनाने वाला मारता नहीं,तारता है। सेतु बना तब सबसे पहला पत्थर किसने रखा होगा? नल,नील,नागर ने पर्वत रखें और एक गिलहरी ने की अपना सहयोग दिया।।एक रज भी सेतु निर्माण करने अपना योगदान देती है लेकिन मॉडर्न दुनिया हर प्रकार के सेतु तोड़ने पर तुली हुई है! धनुष्य तोड़ो! सेतु ना तोड़ो।।

समष्टि के अहंकार रूपी महादेव का धनुष्य तोड़ो। इतने समय से युद्ध क्यों चल रहे हैं? बहुत बार कहा है आज भी साहस करके कहता हूं कि मेरी व्यास पीठ का मनोरथ है जहां युद्ध चलता हो उसी बॉर्डर के बीच में जाना।।

विश्वविद्यालय से यह मेरे प्यारे विश्व को प्यारी पृथ्वी को प्रणाम करके यह कहना चाहता हूं सेतु के लिए कण से लेकर पर्वत का उपयोग हुआ है।।

पहला पत्थर किसने रखा? गुरु प्रसाद कहता है अहल्या का उद्धार हुआ और प्रकट हुई तब शीला वहीं पड़ी रही और राम ने लक्ष्मण से आदेश किया कि शीला की चेतना को,शीला की सूक्ष्मता को उठा लो। गुरु आज्ञा करें तो ‘क्यों’ ऐसा पूछना छोड़ दो। बोझ ऐसे उठाओ मेरे युवान भाई बहनों! की मां-बाप परिवार को भी पता ना चले,केवल गुरु को पता चले,यह गुरु प्रसाद है।।

रामानुज लक्ष्मण ने शीला उठाई और राम ने पहले शीला रखकर कहा कि एक नारी को मेरी चरणों से मुक्त किया वहीं शीला एक नारी(सीता) को मुक्त करेगी।

बापू ने बताया कि माफ करना लेकिन कहना पड़ता है कि अयोध्या का राम मंदिर बना तब सबसे पहले शीला नींव तलगाजरडा के द्वारा रखी गई थी।। राम वह शीला पत्थर लेकर सेतु बनाते हैं,मैं पोथी लेकर सेतु बना रहा हुं।।हम इसलिए यहां आए हैं

समाज में कोई मातृ शरीर का अपमान होता है तो कवि ही पहले आता है इसलिए कपीश्वर से पहले कविश्वर वाल्मीकि जी को तुलसी याद करते हैं।। हम पत्थर लेकर नहीं,पोथी लेकर आये है।।

नाभाजी के भक्त माल का मेरु तुलसी,जगत के नक्षत्र का चांद तुलसी और राम की कथा से दुनिया का मंगल करने वाले तुलसी जी की जयंती पर सबको बहुत-बहुत बधाई देते हुए बापू ने प्रणाम किया।।

विश्वविद्यालय को बताया कि यदि आपके नियमों में कोई तकलीफ ना हो तो चारों वेद,रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण यहां रख कर जाना चाहते हैं।।यह वैश्विक ग्रंथ की स्थापना करनी है। यह ग्रंथ को गहराई से पढ़ो।।यह सरलता भरी गहनता और ऊंचाई से भरी गहराई से भरा हुआ ग्रंथ है।।

पूछा गया था कि गृहस्थ के घर के प्रसाद और गुरु के घरके प्रसाद में क्या अंतर है?

हम जैसे गृहस्थ के घर में प्रसाद कैसा?विषाद ही भरा है।।फिर भी संसारियों के घर में आयास- प्रयास होता है,गुरु का घर सहज होता है।।गृहस्थ के घर में यंत्र होते हैं,गुरु के घर में महामंत्र होता है।। सांसारियों के घर में विपुल मात्रा में साधन है गुरु के घर में अखंड साधना होती है।।गृहस्थों के घर में असूया होती है सद्गुरु के घर में अनसूया रहती है। गृहस्थ के घर में स्पर्धा होती है और गुरु के घर में केवल श्रद्धा होती है।।गृहस्थ के घर में सुख और दुख होता है,गुरु सुख दुख से पर होता है।।

गुरु तीन प्रकार से प्रसाद बांटता है:सविता यानी कि सूर्य के द्वारा,कविता यानी कि वाल्मीकि जैसे कवियों के द्वारा और सरिता के द्वारा।।सविता-सूर्य सत्य है,कविता प्रेम है और सरिता-करुणा है।।

फिर राम जन्म के कारणो का संवाद करते हुए पुत्र कामेष्टी यज्ञ के बाद दशरथ के घर भगवान राम मां कौशल्या के उदर में आते हैं।।राम प्रागट्य की पंक्तियों के गायन के बाद मध्य दिन में,मध्यान्ह के समय हार्वर्ड युनिवर्सिटी में विराजित तलगाजरडी व्यास पीठ से पूरे त्रिभुवन को राम जन्म और तुलसी जयंती की बहुत बधाइयां देते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

🌿तुलसी जयंती महोत्सव — हार्वर्ड यूनिवर्सिटी 🌿

आज शाम हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित तुलसी जयंती महोत्सव के पावन अवसर पर भारतीय संस्कृति, संत परंपरा और गोस्वामी तुलसीदास जी के अमूल्य योगदान पर भारत एवं विदेशी स्कोलर्स के विचार एवं प्रवचन प्रस्तुत हुए।।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के माध्यम से भगवान श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा,भक्ति और मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी वाणी और साहित्य आज भी पूरे विश्व को प्रेम, करुणा, धर्म और सदाचार का मार्ग दिखाते हैं।

विश्व की प्रतिष्ठित हार्वर्ड युनिवर्सिटी में तुलसी जयंती के इस आयोजन के माध्यम से भारतीय ज्ञान,अध्यात्म और संस्कृति की सुगंध वैश्विक मंच तक पहुँचना में सहभागी देश-विदेश के विद्वजनों को बापू के शुध्ध और शुभ हस्तों से सादगीसभर गरिमापूर्ण समारोह में वाल्मीकि,व्यास,तुलसी और रत्नावली एवोर्ड्स अर्पण किये गये।।

जो सभी धर्मो और सनातन के लिए गौरव का पल है।

संत तुलसीदास जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन।

== समाप्त ==

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