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मोरारी बापू ने हार्वर्ड से भारत के पवित्र ग्रंथों को संरक्षित करने का आग्रह किया, नौ दिवसीय राम कथा का समापन

कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स | 23 अगस्त 2026 | मोरारी बापू की राम कथा ‘मानस गुरु प्रसाद’ का रविवार को हार्वर्ड विश्वविद्यालय के सैंडर्स थिएटर में समापन हुआ। इसके साथ ही एक ऐसे अभूतपूर्व आयोजन का समापन हुआ, जिसमें रामचरितमानस की परंपरा, भारतीय शास्त्रीय चिंतन और अकादमिक जगत एक साथ आए।

समापन अवसर पर बापू ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से विशेष आग्रह किया कि वह चारों वेदों, रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण की प्रतियों को संरक्षित कर अपने पास रखे, ताकि ये भारतीय ज्ञान परंपरा के आधारभूत ग्रंथ आने वाली पीढ़ियों के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ रह सकें।

यह आग्रह राम कथा की उस भावना को प्रतिबिंबित करता है, जिसका उद्देश्य केवल रामचरितमानस से जुड़ी आध्यात्मिक और साहित्यिक परंपराओं को वैश्विक श्रोताओं तक पहुंचाना ही नहीं था, बल्कि भारत की शास्त्रीय ज्ञान परंपराओं और समकालीन अकादमिक विमर्श के बीच एक गहरा संवाद स्थापित करना भी था।

19 अगस्त को गोस्वामी तुलसीदास की जयंती तुलसी जयंती के अवसर पर सैंडर्स थिएटर में तुलसी जन्मोत्सव एवं ग्लोबल अवॉर्ड्स समारोह आयोजित किया गया। राम कथा की 16 वर्ष पुरानी परंपरा में यह पहली बार था जब भारत के बाहर तुलसी, व्यास, वाल्मीकि और रत्नावली पुरस्कार प्रदान किए गए। नौ विद्वानों और सांस्कृतिक योगदानकर्ताओं को कुल आठ पुरस्कार प्रदान किए गए। इनमें यूसी बर्कले के प्रो. सैली जे. सदरलैंड गोल्डमैन और प्रो. रॉबर्ट पी. गोल्डमैन तथा ओसाका विश्वविद्यालय की प्रो. मडोका फुकुओका को वाल्मीकि पुरस्कार; कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन स्ट्रैटन हॉले, डॉ. अश्विन भाई कांतीलाल राजगोर और देवी चित्रलेखा को व्यास पुरस्कार; तथा यूटी ऑस्टिन के प्रो. रूपर्ट स्नेल और सामुदायिक नेता पीयूष भाई मेहता को तुलसी पुरस्कार प्रदान किया गया। हार्वर्ड की प्रो. डायना एल. एक को तुलनात्मक धर्म के क्षेत्र में उनके कार्य के लिए रत्नावली पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हार्वर्ड में इस आयोजन को संभव बनाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भारत से आए कथाकारों, विद्वानों, संगीतकारों और कलाकारों ने हार्वर्ड के अकादमिक समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर इस आयोजन में भाग लिया। कार्यक्रम के साथ 16 से 18 अगस्त तक तीन दिवसीय विद्वत् वार्ताओं का भी आयोजन किया गया, जिसमें जापान, नीदरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका के विभिन्न हिस्सों से विद्वान और परंपरा के साधक शामिल हुए तथा भारत की साहित्यिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया।

इस प्रकार, हार्वर्ड में बिताए गए ये नौ दिन केवल राम कथा के समापन का अवसर नहीं थे, बल्कि रामचरितमानस की परंपरा और वैश्विक अकादमिक समुदाय के बीच एक व्यापक संवाद की शुरुआत भी थे।

बापू ने कहा, “किसी ने मुझसे पूछा कि मैं हार्वर्ड क्यों आया। मैंने कहा, ‘मैं पढ़ने नहीं आया, मैं पढ़ाने नहीं आया; मैं प्रसाद बाँटने आया हूँ।’”

राम कथा के मुख्य आयोजक पावन पोपट OBE ने कहा, “इन नौ दिनों के समापन पर हमारे हृदय कृतज्ञता से भरे हुए हैं। हमने देखा कि विद्वान, श्रद्धालु और व्यापक समुदाय के सदस्य खुलेपन, सीखने और ज्ञान के भाव से एक साथ आए। यह सब सार्वभौमिक मूल्यों — सत्य, प्रेम और करुणा — की पृष्ठभूमि में हुआ।”

मानस गुरु प्रसाद कथा ने भक्ति, विद्वत्ता, संगीत और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को एक साथ जोड़ा। ऐसा मंच तैयार हुआ, जहां भारत की शास्त्रीय परंपराओं से अंतरराष्ट्रीय दर्शक सीधे परिचित हो सके। इस आयोजन ने रामचरितमानस की यात्रा को उसकी पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ाया, जबकि बापू की शिक्षाओं के मूल भाव — सत्य, प्रेम और करुणा — को केंद्र में बनाए रखा।

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