
गुरु अनुराग-प्रसाद है।।
गुरु ज्ञान भी प्रसाद है।।
गुरु वचन-प्रसाद है।।
गुरुग्रंथ-प्रसाद है।।
गुरु सेवा भी प्रसाद है।।
गुरु दृष्टि और गुरु मंत्र प्रसाद है।।
सब विद्या गुरुकृपा,गुरु प्रसाद से बिना प्रयास प्राप्त होती है।।
हम मोरारी बापू के समकालीन है यह हमारा सद्भाग्य है: शरदभाइ व्यास।
कजोड़ा, नि:संतानता की पीड़ा,कुपुत्र और अत्यंत दरिद्रता ये जीते जी पार करनी पडती वैतरणी है।
विश्व प्रसिध्ध विश्व विद्यालयों में शिरमोर अमेरिका की हार्वर्ड युनिवर्सिटी के सेन्डर्स हॉल में चल रही रामकथा सातवें दिन में प्रवेश कर रही थी तब विशेष वक्तव्यों की धारा में भारत से आये भागवत कथाकार शरदभाइ व्यास ने आरंभ में अपने शब्द पुष्प रखते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि हार्वर्ड र्में कुंभ लगा है।।इतनी मात्रा में विदेश में,भारत से साधु संत लोग बापू ही इकट्ठे कर सकते हैं।।भागवत में गजराज कहता है भगवान का स्वभाव है जो हमें आश्चर्य चकित कर देता है।बापू का स्वभाव भी ऐसा है। बापू के कई काम जो मानवीय नहीं लेकिन मानवता से ऊपर लगते हैं।।हम मोरारी बापू के समकालीन है यह हमारा सद्भाग्य है।।
भागवत की कथा में भागवतियों की कथा है और बापू जैसा भागवती कौन! यह कहकर अपना पूज्य भाव रखा।।
कल शनिवार शाम को गोष्ठी के साथ कथा के साथ चलता उपक्रम का समापन हो जाएगा। कल सुबह इसी श्रृंखला में रामहृदय दास जी महाराज का वक्तव्य रहेगा।
बापू ने कहा कि यह युनिवर्सिटी का लोगो ‘सत्य’ है और विनम्रता से कहूंगा भारत का परम सत्य,परम प्रेम,परम करुणा सत्य को मिलने आए हैं।
भागवतकर कहते हैं सत्यं परम धीमहि।पूर्व की मनीषा यह कहती है परम सत्य को सुरक्षित रखने के लिए सत्य को छोड़ना पड़े तो छोड़ देना चाहिए और यह प्रमाण है जब नंद राजा ने वचन दिया था कंस को हर बालक सौंप दिया जाएगा।मगर आठवां बालक नहीं दिया।यह सत्य वचन पूरा नहीं किया। परम सत्य श्री कृष्ण को रखने के लिए सत्य को छोड़ा जा सकता है।।दशरथ जी ने सत्य वचन पकड़ रखा और परम सत्य राम को वन भेज दिया।भगवान बुद्ध को एक शिष्य ने पूछा कि सपने में चार पर्वत बार-बार उड़कर मेरे ऊपर गिरते हुए दिखते हैं रहस्य बताएं! बुद्ध ने कहा कि तुम्हें नहीं यह सब को दिखते हैं,सब पर गिरते हैं।वह जन्म,मृत्यु,जरा और व्याधि नाम के पर्वत है।।
रवि शंकर महाराज से पूछा गया हम समस्या से कैसे छूटे?तब महाराज ने बताया विवेक की ज्योति लेकर निकल पडो और उजाले में ग्रंथि को छोड़ो।। मृत्यु के बाद वैतरणी पार करनी पड़ती है। लेकिन जीते जी चार प्रकार की वैतरणी हमें पार करनी होगी।।दंताली वाले स्वामी सच्चिदानंद जी ने कहा यह चार वैतरणी है: कजोड़ा,नि:संतानता की पीड़ा, कुपुत्र और अत्यंत दरिद्रता।।
हमारे सुभाष भाइ ने कविता लिखी और कहा प्रश्न करोगे तो उत्तर मिलेगा,पुकार करोगे तो रब मिलेगा। मानस ऐसी विधा है,हर समस्या अपने आप सुलझ जाती है।।मानस सूत्र ग्रंथ है। सूत्र ही सूत्र है। रामचरित श्रेष्ठ सूत्र-धागा है।।रामचरित बर ताग ऐसा तुलसी जी ने कहा है।।विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा की तो राम लक्षमण ने सब विद्या पाई ऐसा बीज पंक्ति में लिखा है।।रमण महर्षि ने कहा मैं कौन हूं? लेकिन हनुमान जी पूछते हैं आप कौन हैं? तीसरा प्रश्न यह भी है कि आप यानी कि गुरु से पूछना आप कौन है मुझे पूछना है तो मेरा गुरु कौन है?धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष,मिथिला,चित्रकूट,अवध,वृंदावन,काशी मेरे गुरु है।।और यह विद्या कौन सी है?वेद विद्या,योग विद्या, अध्यात्म विद्या,ब्रह्म विद्या,लोक विद्या,मंत्र विद्या,तंत्र विद्या-यह सब विद्या गुरुकृपा,गुरु प्रसाद से बिना प्रयास प्राप्त होती है।।लेकिन मख रखवारी यानी कि जीवन यज्ञ को संभालना पड़ेगा।।गुरु प्रसाद से शास्त्र के रहस्य खूलना लगते हैं।।
गुरु अनुराग-प्रसाद है।गुरु ज्ञान भी प्रसाद है। गुरु वचन-प्रसाद है।प्रवचन जाहिर और वचन एकांत में किया हुआ प्रसाद वितरण है।।गुरुग्रंथ-प्रसाद है।गुरु सेवा भी प्रसाद है।गुरु दृष्टि प्रसाद है और गुरु मंत्र प्रसाद है।।
फिर संक्षिप्त में राम विवाह,नामकरण और सीता सहित सभी कन्याओं के विदाई के बाद अयोध्या से विश्वामित्र की विदाई का गान करके बालकांड का समापन किया गया।।
== समाप्त ==

