Homeगुजरातकथारस, प्रेमरस, नामरस औषधि है।

कथारस, प्रेमरस, नामरस औषधि है।

गोपी गीत प्रपत्ति परक गीत है,आखिर में केवल अश्रुपात है।।
व्यास पूर्ण है,शुक शून्य है।।
शुक व्यास के केंद्र बिंदु है।।
मृत्यु आये इससे पहले हम तैयारी करें तो मौत नहीं आएगी,मधुसूदन आएगा।।
जानने योग्य जान लेना ज्ञानयोग है।।
हमारे भाग में आया कर्म कर लेना कर्मयोग है।। जिसे पाना है पूरा पा लेना भक्तियोग है।।
भागवत कथा से क्रमशःआत्म जागृति होने लगती है।।
परमात्मा की कथा पुष्ट करती है।।
शब्द भी औषधि है,स्पर्श भी औषधि है।
गोपियां प्रवृत्ति परक नहीं,निवृत्ति परक भी नहीं केवल प्रपति परक शरणागत का लक्षण है।।

भागीरथि गंगा और भागवती गंगा की अखंड धारा जहां समांतर बह रही है ऐसे शुकतीर्थ में बह रही रामकथा धारा मंगलवार को चौथे दिन में प्रवेश कर रही है।। परम पावन तीर्थ भूमि की प्रगट-अप्रगट चेतनाओ और पद्म विभूषण कल्याण देव जी महाराज,शुकताल के सभी धर्म स्थान में विराजित सभी देव देवताओं को प्रणाम करते हुए बापू ने कहा इस भूमि पर उस वक्त बहुत ऋषि मुनि इकट्ठे हुए हैं। उसे कल में परीक्षित की आयु में ७ दिन बाकी है और पूरा लिस्ट भी मिलता है कि कौन-कौन ऋषि यहां मौजूद थे।।परीक्षित सब का स्वागत पूजन करता है।।

भागवत के दरमियान बहुत प्रश्न परीक्षित ने किये लेकिन एक मात्र प्रश्न उसे हम सात प्रश्नों में विभाजित कर सकते हैं वह शास्त्रीय दृष्टि से नहीं साध्वीय दृष्टि से देखने से अंतरंग रहस्य खुलते हैं। महत्व का एक ही प्रश्न लेकर बैठा हूं।परीक्षित को मृत्यु का भय नहीं है।।

जीव जब भयभीत होता है तब कितनी वस्तु उसे छूती है:एक-आदमी चैन से सो नहीं सकता।दो-जब भय होता है तब आदमी ठीक से खा नहीं सकता। खुद का अनुभव देखना! लोग भयभीत होते हैं तब उन्हें अशक्ति और कमजोरी आ जाती है।यह शरीर तो रोग का घर है। गीता जी कहते हैं:जन्म मृत्यु जरा व्याधि।।प्रतिकार शक्ति कम होने से रोग प्रबल होता है।।लेकिन परीक्षित को भय नहीं इसलिए इनमें से कुछ नहीं है।।किसी की प्रतीक्षा है इसलिए परीक्षित ने झपकी नहीं ली है। प्रत्यक्ष रूप से लगेगा मृत्यु की प्रतीक्षा है,लेकिन साध्वीय दृष्टि से लगता है मृत्यु ही परमात्मा है।।सत भी में असत भी में यह गीता का घोष है।।परीक्षित को मालूम है की मृत्यु आएगी तो कृष्ण के रूप में आएगी! मृत्यु आये इससे पहले हम तैयारी करें तो मौत नहीं आएगी,मधुसूदन आएगा।। मृत्यु में भी वह माधव और तक्षक में त्रिभुवन पति को देखता था।।बहाना कोई भी हो आएगा तो वही! परीक्षित अभय है।साधु अभी होना चाहिए।। यह जागरण है।।परीक्षित को भूख नहीं लगती क्योंकि शुक के मुख से कथामृत बह रहा है।।शरीर कमजोर नहीं हुआ।।आत्मबोध होने लगा।आत्म जागरण (सेल्फ अवेयरनेस)का मतलब यह मेरा कुर्ता है लेकिन कुर्ता में नहीं,शरीर का ढक्कन है।।देह भी में नहीं आत्मा का ढक्कन शरीर है।।एक-एक दिन यह आत्मबोध बढ़ता गया।। इनमें राग द्वेष नष्ट होने लगते हैं।।राग और द्वेष दोनों मिट जाए फिर कोई विकार की चिंता नहीं करनी है।।

मेरी इतनी साल की मेहनत है मेरे लिए और आपके काम में आए तो आपके लिए।।न मे  द्वेष रागा- ऐसा शंकराचार्य लिखते है।। जानने योग्य जान लेना ज्ञानयोग है।। हमारे भाग में आया कर्म कर लेना कर्मयोग है।। और जिसे पाना है पूरा पा लेना भक्तियोग है।।भागवत कथा से क्रमशः आत्म जागृति होने लगती है।।परमात्मा की कथा पुष्ट करती है।।शब्द भी औषधि है। स्पर्श भी औषधि है। गोपिया प्रवृत्ति परक नहीं,निवृत्ति परक भी नहीं केवल प्रपति परक शरणागत का लक्षण है।। जो हाथ अपने श्री(सीता जी,लक्ष्मी जी) को दिया है वह हाथ हमें अभय करता है।।तुलसी जी ने भी विनय पत्रिका में ऐसा ही पद लिखा है।। व्यास पूर्ण है,शुक शून्य है।।शुक व्यास के केंद्र बिंदु है।। किसी का दर्शन रूप भी औषधि है।।कथारस,प्रेमरस,नामरस औषधि है।गंध-नूरानी खुशबू भी औषधि है।।गोपी गीत प्रपत्ति परक गीत है,आखिर में केवल अश्रुपात है।।

अभय तीन-चार वस्तु से हुआ जाता है। मूल में तो सत्य से अभय हुआ जाता है।।निरंदंभ, निष्कपट होता है वह भी अभय रहेगा। जो उनकी शरण में चला जाएगा वह अभय हो जाएगा। गुरु का हाथ पकड़ता है वह अभय होता है।।
बापू ने साप्रत स्थिति के बारे में बताया कि ममता जी आए की समता की सनातन धर्म की निंदा नहीं होनी चाहिए।। रामायण के पात्रों के प्रति कितना द्वेष था! आजकल एक ग्रुप वालों ने ऐसा कह दिया कि गणपति और उनके जो भगवान है हो मौसी के भाई है।।अपनी मौसी कौन है वह तो पहले खोजें! वेदों में हिंसा नहीं है लेकिन पीछे से तथाकथित लोगों ने क्षेपक द्वारा डाल दी है।।

विश्वास(शिव)और श्रद्धा(पार्वती)के मिलन से कथा रूपी कन्याकुमारी(कथा कायम कुमारी,नित नूतन है) प्रगट होती है।।कथा से राम प्रागट्य होता है। राम प्रागट्य से चरित्र प्रगट होता है और इससे कई प्रकार के शील का प्रागट्य होता है।।शील प्रागट्य हुआ उस साधक को कोई परास्त नहीं कर सकता। पृथ्वी पर रावण आदि राक्षसों का आतंक बढ़ने लगा पृथ्वी गाय का रूप लेकर देवताओं के साथ प्रार्थना करने जाती है और आकाशवाणी हुई कि मैं आ रहा हूं।।फिर प्रतीक्षा करते हैं और शिव पार्वती से राम जन्म के पांच कारणों की बात करते हैं और पुत्र कामेष्टी यज्ञ के बाद राजा दशरथ के वहां मां कौशल्या की कोख से राम का अवतरण होता है। और बाल राम प्रकट होते हैं।।राम प्रागट्य की संवादी पंक्तियों का गान करते हुए पूरे त्रिभुवन को राम जन्म की बधाई के साथ आज की कथा को विराम दिया गया।।

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