
- सत्ता प्रधान होती है तब सत्य पीछे रह जाता है,जो देश और दुनिया का दुर्भाग्य है।।
- भागवत में विद्वानों की और वाल्मीकि रामायण में विवेकीयों की परीक्षा है।।
- भागवत समाधि भाषा और रामचरितमानस हृदय की भाषा में लिखा गया है।।
- गीतावलि और कविता वली राम के चरण है। दोहावली राम का कटी भाग है।
- हृदय सुंदरकांड है।।
- अरण्य और किष्किंधा प्रभु के कंध है।।
- जानकी मंगल और पार्वती मंगल भगवान के दो वरद हस्त है।।
- कृष्ण गीतावली भगवान की दृष्टि है।।
- विनय पत्रिका वाणी है और हनुमान बाहुक,हनुमान चालीसा मस्तक है।।
लातुर के पास किल्लारी की तीर्थ भूमि पर बह रही रामकथा सोमवार को तीसरे दिन में प्रवेश कर रही है तब पूछा गया कि वाल्मीकि रामायण,तुलसीकृत रामचरित मानस और शिव का रामचरित तीनों में समानता और बिलगता क्या है?
बापू ने कहा कि वाल्मीकि जी ने रामायण की कथा राम के चरित्र से पहले लिखी।ऐसा कौन होगा कौन होगा यह सोचकर…
भागवत में विद्वानों की और वाल्मीकि रामायण में विवेकीयों की परीक्षा है।।
वाल्मीकि जी ने नारद से पूछा है यह महद् पुरुष के चरित्र है उसका नाम क्या है? नाम में रुचि जगी।। महाभारत में व्यास लेखक भी है और पात्र भी है। वाल्मीकि रामायण में भी वाल्मीकि जी कर्ता भी है और पात्र भी है।।
भागवत समाधि भाषा और रामचरितमानस हृदय की भाषा में लिखा गया है।।मैं प्रमाण पत्र तो क्या दूं लेकिन यह मेरा प्रेम है वाल्मीकि रामायण अद्भुत है। वैसे २४ अवतारों में कोई पूछते भी है कि वाल्मीकि जी का अवतार क्यों नहीं?लेकिन बुद्धपुरुष को रुचि नहीं वह खुद अद्वितीय होते हैं।।
रामचरितमानस को भी श्रीमद् कहा गया है?वह बताते हुए बापू ने कहा की मिटर को ध्यान में रखना पड़ता है।
नवमी भोम बार मधु मासा।
अवधपुरी यह चरित प्रकासा।।
किसी ने लिखा है:
मिलेंगे हम यह वादा है।
रोज रात के चांद के जरिए।
मैं भेजूंगी पैगाम तुम्हें।
इसी बहती हुई हवा के जरिए।।
मूल शिव के हृदय में भाव के रूप में जो मानस था तुलसी जी ने १६३१ में रामनवमी के दिन अयोध्या में भाषा बध्ध करके प्रकाशित किया।।अनादि शिव का रामायण अवधूत है।।
श्रीमद् भागवत और श्रीमद् रामायण दोनों के गायक अवधूत है।।वहां शुकदेव जी अवधूत यहां शिव अवधूत।। शिव जैसी अवधुती किसकी!
राख और भस्म में अंतर है।। यज्ञ कुंड में से जो निकले वह भस्म है और भोजन पका कर बाकी बचती है उसे राख कहते हैं।।
तुलसी का शास्त्र अनुभूत है।। कितने कालों की जन्म जन्म की अनुभूति है।।
सिया राम मय सब जग जानी।
करहु प्रनाम जोरि जुग पानी।।
और आपके अंतःकरण की प्रवृत्ति गवाह हो सकती है।
वाल्मीकि के मन में दो प्रश्न है:एक-राम महान पुरुष है उसने सीता का त्याग क्यों किया?दो-सांप्रत काल में ऐसा कौन महद पुरुष जिसमें इतने लक्षण है? बाल्मीकि रामायण का पूर्व भाग पढ़ लेना।।सांप्रत का मतलब है वर्तमान में ऐसे ज्ञानवान,विर्यवान,धृतिवान,धैर्यवान,आत्मज्ञानी प्रजा पालक-ऐसा कौन है?और रामकथा का गायन भी वाल्मीकि आश्रम से लव कुश के मुख से हुआ है। एक अर्थ में वाल्मीकि आश्रम केंद्र बिंदु है।
अंग देश के राजा रोम पाद को जो दशरथ के मित्र थे राजा ने अपनी बेटी शांता को दत्तक दी थी।। कालांतर में शांता का श्रृंगी ऋषि से ब्याह करवा दिया।।वही रोम पाद के घर एक बहुत बड़ा यज्ञ हो रहा था।।केंद्र में वाल्मीकि आश्रम है इसलिए यह कह रहा हूं।।
भगवान राम बहुधा जल वन और पर्वत हो वहां रहे हैं।पंचवटी में गोदावरी के तट और वन भी है। लंका में भी जल भी है वन भी है पर्वत भी है।अयोध्या में भी जल है वन भी है और विचारों का शिखर भी है जहां भाव का जल विचारों की ऊंचाई और वन का वैराग्य हो उनका सेवन करना।।
जानकी जी राम के साथ वन में गई और जानकी जी को वन का व्यसन इतना हो गया कि मत पूछो!
रोम पाद के घर यज्ञ है। महाराजा स्वर्गवासी है अयोध्या को निमंत्रण आया और तीनों रानियां वहां गई है।।सीता जी अयोध्या में है।।
बापू ने कहा कि लोग कहते हैं तुलसी नारी निंदक है लेकिन यह भी कहते हैं कि वाल्मीकि ही तुलसी भये तो वाल्मीकि रामायण में सीता का चरित्र ही महद है और रामचरितमानस में तुलसी जी पहला मंत्र वाणी का मध्य में रघुवीर विवाह और अंत में कामिही नारी प्यारी लिखा।।आदि मध्य और अंत में नारी का मातृ शक्ति का स्थापना किया है।।
सीता के गर्भ में ८ माह का गर्भ है वह भी रोम पाद के वहां जाने को उत्सुक थी।।
तब अयोध्या में परमात्मा की समग्र लीला का चित्रण किया गया था। चित्र प्रदर्शनी जिन लोगों ने लगाई उनका आग्रह था कि जानकी जी उनका उद्घाटन करें।।और जानकी की गई।दीप प्रज्वलित हुआ और अपना पूरा चरित्र चित्रण में देखा।।
राम जन्म से लेकर राज्याभिषेक तक के प्रसंग। कैसे धरती में से प्रकट हुई,धनुष को घोड़ा बनाया, गोबर से लिंपन किया, बाएं हाथ से वह धनुष्य को उठाकर रखा। पुष्प वाटिका का मिलन। वनवास सब कुछ वहां चित्रित है।।जानकी जी ने राज्याभिषेक तक की चित्रावली देखी।थोड़ी थकान हुई।यह सब लीला है।सांस घर में नहीं। मां जानकी जी श्रमित है।प्रभु राम आते हैं जानकी जी को श्रमिक देखकर पूछा और बाद में राम ने सीता जी को कहा देवी! राज्याभिषेक के बाद समारंभ में मुझ से जिसने भी कुछ मांगा था मैंने दिया। आपने कुछ मांगा नहीं, आज कुछ मांग लो! यह ललित नर लीला है।।
गीतावलि और कविता वली राम के चरण है। दोहावली राम का कटी भाग है। हृदय सुंदरकांड है किष्किंधा कांड प्रभु के रूप का वर्णन किस रूप से हुआ है।अरण्य और किष्किंधा प्रभु के कंध है जानकी मंगल और पार्वती मंगल भगवान के दो वरद हस्त है।।कृष्ण गीतावली भगवान की दृष्टि है। विनय पत्रिका वाणी है और हनुमान बाहुक,हनुमान चालीसा मस्तक है।। प्रभु की वांग मयी मूर्ति तुलसी जी के कई ग्रंथ रह जाते हैं।।रामाज्ञा प्रश्न, राम नहूष संकटमोचक… और दोहावली,कवितावली गीतावली पर स्वतंत्र कथा करनी है।।वैराग्य सांदीपनि यह सब तुलसी के ग्रंथ के अवलोकन किए बिना लोग कहते हैं रामायण में श्रीमद् नहीं है! जानकी जी को चित्रावली देखकर वन का वह सुख याद आया।।जानकी जी कहती है मैं जनक पुत्री हूं परम पुरुष की पत्नी हूं।महाराजा दशरथ की पुत्रवधू और जगत की माता हूं।।वन में गई थी तब ऋषि पत्नियों ने मुझे कुछ न कुछ दिया है। लेकिन वनवासियों को, ऋषि पत्नियों को कुछ नहीं दे पाई रथो में ने रतन और खदान भरकर वन में सबको देना है। कुछ समय वन में निवास करना है प्रभु मुझे वन में रहना है।।
राम ने कहा मां और सबको आने दो।।और बाद में भगवान राम महल का एक खंभा पकड़ कर चुपचाप खड़े हैं।। रात्रि के २ बजे है। रक्षक लोग पहरा लगा रहे हैं। एक रक्षक आया और कहा कि क्षमा करना इस वक्त हम नहीं आ सकते आपका आराम का समय है, लेकिन राज्य का एक दूत आपसे मिलना चाहते हैं। दूत का नाम भद्र है। राम ने कहा भेजो। भद्र नाम का दूत आया प्रणाम किया आंखें झुकी है, नेत्र में आंसू बरस रहे हैं। कुछ बोलो! चुपचाप खड़ा है।।राम ने कहा मुझे आशंका होती है कि फिर कहीं मंथरा नहीं आई२ मंथरा में भी राम है लेकिन पहले म है आखिर में रा है और बीच में थ घुस गया है।।
रामचरितमानस में थ अक्षर वाली छे ही पंक्ति आती है।।मंथरा मानस में छह बार दिखती है।
जब अष्टावक्र राम से मिलते हैं तो कहते हैं कि यदि तुझ से तेरी प्रजा खुश है तो ही राज्य करना। ऐसी ताकत थी।आज कौन है ऐसा जो शासन के सामने ऐसा बोल सके! राम ने कहा कि कोई अनुचित बोले तो भी रोक नहीं पाऊंगा।।राम ने कहा था कि मेरी प्रजा ही मेरे लिए सब कुछ है। मुझे जो कुछ त्याग करना पड़े सीता का भी त्याग करना पड़े लेकिन मेरी प्रजा की खुशी के लिए मैं सब कुछ करुंगा।।
भद्र ने जवाब नहीं दिया।फिर पूछा मेरे भरत से लक्ष्मण से शत्रुघ्न से कोई भूल हुई! पिता तो स्वर्ग में है, माता से कोई भूल हुई क्या? बोले,कोई भूल नहीं क्या जानकी से कोई भूल हुई?तो कहा कि जानकी के बारे में जनता कुछ ऐसा बोलती है। वाल्मीकि जी ने यहां जो बोलते हैं उनकी जाति या वर्ण का नाम नहीं लिया। लेकिन समूह बात करता है इतने समय असुर की नगरी में रही जानकी को महारानी बनाना उचित था? ऐसी बात होती है।।
सत्ता प्रधान होती है तब सत्य पीछे रह जाता है,जो देश और दुनिया का दुर्भाग्य है।।
भद्र रो पड़ा। मेरे भाग में यह संदेश क्यों आया! यह जानता हूं हमारी महारानी सगर्भा है फिर राम ने कहा तुम जाओ।
राज भवन के खंभे को पकड़कर हमारा इष्ट देव फूट फूट कर रोए।। पूरा जगत जानता है मेरे पास आने से पहले सीता अग्नि परीक्षा देकर आई है।।
कोलाहल सुनकर भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न तीनों आ गए ठाकुर को रोते देखकर कहे हम आपके आंसू नहीं देख सकते।लक्ष्मण जी बोले बताओ मैं अयोध्या को आग लगा दूंगा।। तब राम ने कहा कि मैं अपने स्वभाव से विरुद्ध पहली बार बता रहा हूं।। मैं जो कहूं वही करना। ‘क्यों’ ऐसा नहीं कहना।व्हाय नहीं, डू और डाय! यह मेरा आदेश है।
और बताया जानकी की इच्छा है वन में रहने की और कारण भी है।। यह कार्य भरत नहीं कर पाएगा शत्रुघ्न छोटा है, लेकिन लक्ष्मण सुमंत को कहो रथ तैयार करें। और आप जानकी जी और उनके साथ सामान लेकर गंगा के पार वाल्मीकि जी का आश्रम निकट पड़े वहां छोड़कर आ जाओ।।वाल्मीकि के आश्रम से थोड़े दूर सीता का सामान और जानकी को उतार देना।।जानकी पूछे तो कठोर बनकर कहना अयोध्या के राजाधिराज ने आपका त्याग किया है।फिर लौट आना।।
जानकी को राम ने बताया कि आपकी इच्छा थी वन में रहने की। जानकी बोली प्रभु हम जाएंगे ऐसा कहा था। राम जी ने कहा मुझे बहुत राज कार्य है आप जाइए।।और जगत जननी समझ गई। पराम्बा है।जिद नहीं कि वह सब जानती है। सुमंत रथ चलाता है। गंगा के तट पर सब सामान नौका में भर के सुमंत को कहा यही रुकना और कुछ दूरी पर वाल्मीकि का आश्रम था। एक वृक्ष के नीचे जानकी को छोड़ा।।जानकी जी पूछती है भैया! और कुछ प्रभु ने कहा है? लक्ष्मण ने कहा नहीं,आपका त्याग हो गया है। कारण हम पूछ नहीं सकते। लेकिन नगर चर्चा में ऐसा हुआ।।जानकी राम के, नगर जनों के रघुवंश के खिलाफ एक शब्द नहीं बोली। मेरी अग्नि परीक्षा तो हो चुकी थी।।
और सुबह वाल्मीकि जी के ऋषि कुमार समिध लेने के लिए निकलते हैं जानकी जी को वृक्ष के नीचे पाया। ऋषि को बताया और आश्रम में ले आए और अयोध्या की महारानी को वाल्मीकि जी ने कहा कि आज से मैं तेरा बाप हूं।।रधुकुल के वंश यदि अयोध्या में जन्म लेते तो राजनीति का संग होता शतरंज सीखते, लेकिन ञुषी के आश्रम में जन्म लिया तो सरगम सीखते हैं।। यह जनक सूता जग जननि जानकी की हम कथा सुनाते हैं। अतिसय प्रिय करुणा निधान कि हम कथा सुनाते हैं।।
राम ने अष्टावक्र को कहा था मैं प्रजा आराधक हूं मुझे सीता को छोड़ना पड़े तो छोड़ दूंगा यह निभाया और सीता की वन में रहने की इच्छा पूरी की।।
ऐसा कौन सा पेड़ है जो चार फल देता है? आम का पेड़ चार फल प्रदान करता है।।धर्म आम लोगों का है आम अर्थ प्रदान करता है।काम दायी है और मोक्ष दाई भी है।।
जिनकी एक वाणी,एक बाण और एक ही बहाना हो ऐसे का ही आश्रय करना।।
धर्म के फल का रस विरति है। अर्थ का रस दान शीलता है।काम का रस रति है और मोक्ष के फल का रस बार-बार जन्म लेना है।।
बापू ने कहा कि जीवन में एक निजी गुरु भी होना चाहिए।।

