गौ माता सर्व औषध मयी है।
गौ माता सर्व देवमयी है।
गौ माता सर्व धाम मयी है।
पांच मिनट गाय के पास बैठने से चारों धाम की यात्रा हो जाती है।।
क्योंकि गायों के चार चरण चार धाम है।।
कथा में रजोगुणी भी मत बनो।।कथा के लिए कथा में बैठो!
राम कथा बींब है,प्रतिबिंब नहीं।।
राम कथा सूर धेनु है,बगैर चारा चरें पुष्ट है।।
रामकथा,हरिकथा कभी वासुकती नहीं।।
कथा स्वयं हमें शीलवंतत बनायेगी।।
राधाराणी जी की दिव्य यादों से भरी भूमि बरसाना में रामकथा के पांचवे दिन यहां की प्रगट अप्रगट चेतनाओं को और संतसभा को प्रणाम करते हुए तीसरे नवरात्र पर गौ सूक्त में से और एक मंत्र का उच्चारण करवाया:
यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं
चित्कृणुथा सुप्रतीकम्।
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद्
वो वय उच्यते सभासु॥५॥
यह श्लोक पर बड़े-बड़े भाष्यकारों ने भाष्य किए हैं। लेकिन यहां तीन बात मुख्य है: गाय हमारा शरीर यदि ज्यादा कृश दुर्बल हो गया हो तो गौ माता हमें पुष्ट करती है। दूध,घी,पंचगव्य से मेदस्वीता नहीं ओजस्वी, जैसा हो ना चाहिए ऐसा करती है।। गौ माता सर्व धर्ममयी है। गौ माता सर्व औषधी मयी है। गौ माता सर्व देवमयी है। गौ माता सर्व धाम मयी है। और पांच मिनट गाय के पास बैठने से चारों धाम की यात्रा हो जाती है।।क्योंकि गायों के चार चरण चार धाम है।। गांव सर्व कष्ट को हरण करती है। हमें पुष्ट करती है और केवल शरीर को ही नहीं मन से भी हमें सुंदर बनाती है।। विशेष रूप में यह मंत्र आकर्षण ऐसी गाय हमारे आंगन में है और भद्र शब्द का रांभना,उच्चारण करें वह आवाज हमारे कान में आए फिर हम सभा में कथाओं में जाए तो हमारे अंदर शील प्रकट होता है।। रामचरितमानस में श्रोता और वक्ता दोनों को ज्ञान निधि कहा है।। हम कृत कृत्य हो जाते है।।
कृष्णाशंकर दादा कहते थे कि यदि संभव हो तो प्रत्येक कथाकार को अपने घर एक गाय रखनी चाहिए।। गाय को अपने हाथ से गुड़ खिलाने से वह अपने जीह्वा से हाथ चाटती है तो हमारे लकीर मिटा देती है ऐसी जूनागढ़ में वनराज बापू हमें कहते थे।। क्योंकि गाय की जीव थोड़ी खरोंच वाली होती है।। कथा के लिए कोई एक मंत्र पढ़ कर और कोई युवा शास्त्री विप्र हमें मंत्र सुनाएं वह सुनकर कथा में आना चाहिए।।
अष्ट शील होंगे तो कथा हमें लिफ्ट करा देगी।।
जब से कथा कर रहा हूं अभी खोज रहा हूं एक गुणातित श्रोता मिल जाए! यदि कोई नहीं मिलेगा तो मैं ही गुणातित श्रोता बन जाऊंगा! मैं ही मेरा श्रोता हो जाऊंगा! तमोगुण श्रोता कथा में आते हैं तो लड़ाई करते हैं। रजोगुणी श्रोता उठते हैं बैठने कुछ इधर-उधर करते रहते हैं।। कथा में रजोगुणी भी मत बनो।।कथा के लिए कथा में बैठो!
तो गाय का रणकार सुनकर, पुष्ट होकर गाय हमें सुंदर बना देती हो सुंदर होकर आएंगे तो ८ शील निर्माण होंगे।।भगवती कथा के अष्टशील है:
समयशीलता, स्थानशिलता,समझ शीलता,श्रवण शिलता,शब्द शिलता,स्वर शिलता,सूर शिलता और शरीर शिलता।।
राम कथा बींब है,प्रतिबिंब नहीं।।
राम कथा सूर धेनु है।। बगैर चारा चरें पुष्ट है।।
रामकथा,हरिकथा कभी वासुकती नहीं।। कथा स्वयं हमें शीलवंतत बनायेगी।।
आज चंद्रघंटा मां का तीसरा नवरात्रा है जो मन के साथ संबंध रखता है।। गीता जी में तीन बार गौ शब्द का, रामचरितमानस करीब साठ बार गाय शब्द लिखा है।।
भगवान महादेव समाधि में रहे।
संकर सहज स्वरूप सम्हारा।
लागी समाधि अखंड अपारा।।
८७ हजार साल की समाधि के बाद जब समाधि छुट्टी तो समाधि का फल क्या है?
राम नाम सिव सुमिरन लागे।
जानेउं सती जगत पति जागे।।
समाधि का फल है रामनाम,हरिनाम। यह परिणाम है।।
शिव समाधि के जागने के बाद दक्ष प्रजापति ने बडा यग्य किया लेकिन सती को नहि बूलायी।।सती फिर भी गइ,वहां शिव का भाग और स्थान न देखकर अपमानित हो कर दक्ष यग्य का ध्वंस किया और अगले जनम शैलराज हिमाचल के वहां जन्म लिया।।

