
भगवान की भक्ति लाभ नहीं शुभ है,शुभ को परखो!
भक्ति जैसा कोई शुभ तत्व नहीं है।।
वैराग्य रस है।।
साधु मरमी है ज्ञान वैराग्य उनके नेत्र होते हैं।।
बैरागी के तीन वस्त्र है:मैत्री करुणा और अंतिम *सांस तक जगत को देते ही रहना।।
वैराग्य का अपना एक रूप है।
वैराग्य की अपनी एक गंध है।।
वैराग्य मक्खन है।।
दूसरे विश्वयुध्ध से पहले युरोपीय-ज्यूझ की ९.५ मिलियन लोगों की बसति में से विश्वयुध्ध के समापन पर केवल ३ मिलियन ज्यूझजींदा बचे!,६ मिलियन ये सामूहिक नर संहार में स्वाहा हो गये ऐसे होलोकोस्ट विनाशक लीला के साक्षी बने केटोवीसपोलेन्ड में विश्व शांति और मृतकों के आत्माओं की शांति एवं अमन के हेतु चल रही रामकथा के चौथे दिन कथा के आरंभ में बौध्धभख्खूभन्ते जी ने एक प्रश्न पूछा था।एक पत्र लिखा था की मन का दीपक जब कभी वैराग्य से जगमगाता है तब संसार की आंधी उसे बुझा देगी ऐसा डर लगता है।।वैराग्य कितने प्रकार के होते हैं?वैराग्य में सबसे बड़ी रुकावट कौन सी होती है?मन का मोह या माया का जाल? किसी परम बैरागी को देखकर दूसरे के वैराग्य को आंखों को चमकता देखकर वह मन को खींचता है।।परम बैरागी का मार्ग कैसा होता है? बापू ने कहा वैराग्य केवल शब्द न बना रहकर जीवन का अनुभव बन जाए।।
कई प्रकार के वैराग्य है।लाभ शब्द मुझे प्रिय नहीं, शुभ शब्द प्रिय है।।इसलिए भगवान की भक्ति लाभ नहीं शुभ है। शुभ को परखो! भक्ति जैसा कोई शुभ तत्व नहीं है।। राम का भूमि शयन देखकर विषादग्रस्तगुहराज लक्ष्मण के प्रति कैकई के बारे में कठिन शब्द बोला है, लेकिन छोटा आदमी बड़ों के लिए कुछ भी बोल सकता है।।
वैराग्य के कई प्रकार है। इसमें एक वैराग्य रस है। रस का रूप नहीं,रंग नहीं,केवल स्वाद है।। सब रस पानी से आया है।। पानी का कोई आकार नहीं, कोई रंग नहीं।।बैरागी की आंख भीगी होनी चाहिए।। साधु मरमी है ज्ञान वैराग्य उनके नेत्र होते हैं।।
गांधी सीधे-साधे कपड़े में भी वैरागी थे।विनोबा जी भी बैरागी थे। रवि शंकर महाराज भी बैरागी थे।। अच्छा बैरागी के तीन वस्त्र है: मैत्री करुणा और अंतिम सांस तक जगत को देते ही रहना।। ऐसे बुद्ध ने किया।। कोई आदि बैरागी,कोई अंतिम बैरागी लेकिन बुद्ध मध्य मार्गीहै।।वेश भी विरागी होता है वृत्ति का भी बैराग होता है। वाणी का भी वैराग होता है और बैरागी अपनी इज्जत खोकर दूसरों को इज्जत देता है।। खुद हार कर अन्य को जिताता है। रामचरितमानस में वैराग्य की तीव्रता को दिखाई गई है। बैरागी की वाणी अलग होती है।वर्तन अलग होता है। वैराग्य का अपना एक रूप है। वैराग्य की अपनी एक गंध है।। वैराग्य मक्खन है।।
मोरबी के पास ववाणिया गांव के पुरुष श्रीमद् राजचंद्र ने कहा है कि है पुराण पुरुष यदि तू मुझे ना मिले तो कोई चिंता नहीं लेकिन तुम जिसे प्रेम करता है ऐसे महापुरुष को मेरी जिंदगी में मिला देना।।
फिर भगवान राम के जन्म की ओर ले जाते हुए भगवान शिव को पार्वती ने राम जन्म के बारे में पूछा और शिव ने राम जन्म के हेतु की संवाद और गान के साथ चर्चा करते हुए पांच हेतु दिखाएं।।
पांच हेतु बताये और महाराजा दशरथ के महल में शिशु रुप में राम के साथ और तीन राजकुमारों का प्रागट्यहुआ।।पूरे त्रिभुवन को राम जनम की बधाइयां के साथ आज की कथा राम जन्म को समर्पित हुइ।।

