
कथा जैसा कोई माध्यम नहीं,श्रवण जैसा कोई साधन नहीं,राम जैसी कोई प्राप्ति नहीं।।
वाल्मीकि ने वेदों के छंद वाणी में ले लिये है।
शास्त्रीय बात भी साध्वीय ढंग से करनी चाहिए,शास्त्रीय ढंग से नहीं।।
वृत्ति शुद्ध ना हो तो आदमी धर्म को भी धंधा बना लेता है।।
राम आराम देता है,कृष्ण आकर्षित करता है,हरि हमें व्यापक बनाता है।।
जहां तलगाजरडा के राम मंदिर के राम दरबार के स्वरुपों की स्थापना की गइ है ऐसे महाराष्ट्र के किल्लारी में चल रही रामकथा मंगलवार जब चौथे दिन में प्रवेश कर रही है तब बताया की वर वारकरि संप्रदाय के साथ पक्षपात नहीं प्रेमपात है। जब तुकाराम महाराज को सपने में रामकृष्णहरि- मंत्र दिया था।रामानुजिय,रामानंदी,वैष्णवी साधु, वल्लभीय परंपरा और निंबार्की परंपरा एवं वारकरि परंपरा सब के प्रति आत्मीयता रही।।यह प्रवाही पवित्र और परोपकारी परंपरा के प्रति हृदय का भाव है। निंबार्की और वारकरीटि परंपरा में साम्य है। हमारे आचार्य श्वेत वस्त्र धारण करते हैं।।
बापू ने,जब बहुत छोटे थे,वह प्रसंग याद करते हुए कहा कि सावित्री मां को एक बार पेट की बहुत पीड़ा हुई।कोई इलाज नहीं और बहुत बारिश पड़ रही थी।रात के १०-११ बजे हमारे गांव के जगजीवन दादा भागवत कार,जो वैद भी थे वहां ले गए।जगजीवन दादा ने कहा कि महुआ अस्पताल में ले जाओ।हमारे घर के पास भवान राजा पटेल के घर प्रभुदास बापू गए बैलगाड़ी लेने के लिए।फिर सावित्री मां को सुलाइ और सावित्री मां की एक ही रटन रही कि मैं भी उनके साथ रहुं।हमारे चाची जया चाची और हम बैठे।मां का एक पर चाची दबा रही थी एक पैर में दबा रहा था।।अचानक मां बोलने लगी बेटा देखो! ध्यानस्वामी बापा! लेकिन हमारी आंखों में वह पवित्रता कहां!सब कहां देख पाते! कहने लगी अब चिंता नहीं।।और जया चाची,जया मां ने सावित्री मां से पूछा ध्यान स्वामी बापा ने कैसे वस्त्र पहने हैं?मां बोली सफेद पहने हैं।।तो यह साध्वीय प्रमाण है।।
वारकरि संप्रदाय में भी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। यह तर्क नहीं आध्यात्मिक मैचिंग है,निंबार्कीयों का और वारकारियों का।
द्वारका के पास गोपीताल में सब गोपी समा गई वहां की मिट्टी का गोपीचंद्रन और फिर काली बिंदी हम करने लगे।वारकरि संप्रदाय में भी उर्ध्व तिलक होता है।।कटी भाग में मृदंग बांधकर बजाते हैं।।
सबको अनुरोध की वैष्णवी भोजन करो।हमारा पेट फलाहारी,दुग्धाहारी और अन्नाहारी है।
बापू ने कहा कि अशास्त्रीय बात करनी ही नहीं और शास्त्रीय बात के बाद भी विरोध हो तो चुप हो जाना समय आने पर शास्त्र प्रमाण दिखा देना।।शास्त्रीय बात भी साध्वीय ढंग से करनी चाहिए,शास्त्रीय ढंग से नहीं।नहीं तो असत्य साबित कर देंगे।जब सत्ता, संपत्ति,पद,प्रतिष्ठा साथ हो तब सत पीछे रह जाता है।।
कथा में क्राउड नहीं होता,कंपनी होती है।।
कथा जैसा कोई माध्यम नहीं,श्रवण जैसा कोई साधन नहीं,राम जैसी कोई प्राप्ति नहीं।।
रामकृष्णहरि का साध्वीय अर्थ में सत्य,प्रेम और करुणा करता हूं।।साधु वह है जहां वृत्ति शुद्ध हो, परस्पर विनय हो।।वृत्ति शुद्ध ना हो तो आदमी धर्म को भी धंधा बना लेता है।।
वाल्मीकि जी का आश्रम दीक्षित है। हमारी बीज पंक्ति में लिखा है:सुंदर गिरी काननु जलु पावा- यह तीनों शब्द सन्यासी के।।हैं गिरि संन्यास का शब्द है कानन-वन भी सन्यास का और जल का मतलब सरस्वती भी संन्यास का शब्द है।।जो किसी का द्वेष नहीं करता और किसी से आकांक्षा नहीं करता वह नित्य सन्यासी है ऐसा गीताकार कहते हैं।।
बापू ने बताया कि मुनि महामुनि कौन है?
जो पलंग पर नहीं जमीन पर सोता है।। जो सिल्की कपड़ा नहीं पहनता। जो आंतर बाह्य इंद्रियों को बहुत लालच ना देता हो।जो दिन में सोता ना रहे। जो वाहन में यात्रा न करें।।छोटा गांव हो तो एक दिन,थोड़ा बड़ा गांव हो तो दो दिन,पुर हो तो तीन और बहुत बड़ा नगर हो तो पांच दिन रुके वरना चरैवैति करके चलता रहे।।
बहुत स्वाध्याय अध्ययन नहीं करना चाहिए केवल हरिनाम करना चाहिए।।राम आराम देता है,कृष्ण आकर्षित करता है,हरि हमें व्यापक बनाता है।। वाल्मीकिजी सुबह स्नान करने के लिए जा रहे हैं दो क्रौंच पक्षी का जोड़ा अपने विहार में मग्न था वह देखकर वाल्मीकि प्रसन्न है।।ध्यान देना यहां वाल्मीकि ने आंखें बंद नहीं कर दी।। अचानक पारधी ने तीर चलाया और नर क्रौंच को तीर लगा नीचे पटक गया।।देखकर चीखें मार कर मादा क्रौंच रोने लगी और वाल्मीकि के मुख से चीख निकल गई मा निषाद!! है पारधी तुझे शाश्वत सुख नहीं मिलेगा और जो चीख निकली वह अनुष्टुप जाति का छंद था यह शोक विश्व का पहला श्लोक बन गया।।वाल्मीकि ने वेदों के छंद वाणी में ले लिये।।पीड़ा हुई और एक आश्चर्य भी हुआ कि मुझ में यह श्लोक कैसे फूटा! फिर कुटिया में गए।चिंतन करते हैं और कुटिया में प्रकाश पुंज दिखा।आंखें खुली ब्रह्म तेज का दर्शन हुआ और कहा कि आपके अंदर बैठी सरस्वती से पुण्यवती रामकथा का सर्जन करो और ऐसे २४००० श्लोक निकलेंगे।
जब तक पर्वत रहेंगे,नदिया बहती रहेगी,हवा चलती रहेगी कथा अनंत काल तक चलेगी।।फिर नारद की प्रेरणा से ग्रंथ का आरंभ करते हैं और ग्रंथ का गायक कौन होगा वह वाल्मीकि सोचते हैं।।

