
*कृष्ण को नवनीत और नव नीत(नीत-नूतन)अच्छा लगता है।।*
*कृष्ण के साथ आठ प्रसंग जूडे है।।*
*कृष्ण दो जगह जन्मे:जेल में और जल में।।*
*कर्तव्य कर्म करने में हरि को भूला जाए वह घाटे का सौदा है।।*
*श्रुति मॉं है तो सबको अधिकार देती है।।*
*जो आदमी प्रयत्न करें वही साधक है,प्रमादी साधक नहीं।।*
*सद्गुरु के पास बैठना अडसठ तीर्थ है।।*
भगवान द्वारिकाधीश से जूडी,कर्णाटक की ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी उडुपी-गुरुवार को बापु की रामकथा का तीसरा दिन जन्माष्टमी की पूर्व सुबह वृंदावन बिहारी,द्वारिकाधीश,श्रीनाथजी बावा, शामलाजी,डाकोर वाला और उडुपीवाले को याद करते हुए कथा संवाद रचते हुए बापु ने बताया की भगवान शिव ने रति के पति कामदेव को पाने के लिए इतना वक्त क्यों बताया?संकल्प मात्र से सब कुछ कर सकते हैं,इतनी लंबी मुद्दत क्यों डाली?शिव त्रिभुवन गुरु है।रति त्रिभुवन गुरु का संकेत समय समझ गई।किसी भी बुद्धपुरुष का संकेत समझ जाए वह शिकायत नहीं करेगा।क्या संकेत होगा? त्रिभुवन गुरु का संकेत यह था आज तक काम को भजा,राम को भजा ही नहीं!जिसे मैं भजता हूं उन्हें तुंने भजा नहीं।अब इतना समय है।
रामनाम जपने वालों को काम नहीं मिलेगा ऐसा नहीं।शुद्ध-बुद्ध काम मिलेगा।।यह संकेत होगा कि तू हरि भज! तुझे फिर काम मिलेगा।। भौतिक कर्तव्य करने में हरि को भूल गई।कर्तव्य कर्म करने में हरि को भूला जाए वह घाटे का सौदा है।।यह दंड नहीं है अनुग्रह है।।काम तो क्या परम पद मिलेगा।
चिंतकों ने कहा है,प्रमाण तो नहीं मिला लेकिन काम देव की दो पत्नियों थी:एक रति और दूसरी प्रीति। रति है जुड़ी रहे काम से,प्रीति वाला पक्ष राम से जोड़ दे।। हमारे लिए बहुत बड़ी शिक्षा है।सदा भजन करने से परम पद मिलेगा।।त्रिभुवन गुरु के संकेत को समझ कर रति चली गई।
गुरु द्रोण और एकलव्य वाला प्रश्न पढ़ कर बापू ने कहा गुरु द्रोण है।गुरु शब्द तो लगा गुरुपने को कितना न्याय दिया गया में कुछ नहीं बता सकता लेकिन मैं आपको वेद का एक मंत्र ले कर कह सकता हूं कि अधिकार नहीं था,पात्रता नहीं थी ऐसा नहि-मंत्र कहता है कुछ विधाओं का अधिकार कुछ लोगों को नहीं यह वेद ने नहीं कहा।।जिम्मेदारी से बोल रहा हूं।श्रुति ने कभी नहीं कहा,स्मृति ने कहा है जो शब्द में कभी बोलता नहीं,आज तक नहीं बोलता उसी का नाम लेकर श्रुति कहती है:अधिकार है।परमात्मा सब का बाप है तो उनकी विद्या पर सब का अधिकार है।।श्रुति मॉं है तो सबको अधिकार देती है।।
किसी भी निर्णय करने के लिए चार वस्तु से परखों: बुद्धि विवेक से परखों। इष्ट तर्क कर सकते हैं,दुष्ट तर्क नहीं।।परम तत्व बुद्धि से बाहर है फिर भी परमात्मा ने ही बुद्धि दी है।शिव उसे प्रेरित करता है। शास्त्र प्रमाण है।अनुभवी से पूछो।कबीर से,नानक, रामकृष्ण देव,मीरां से पूछो,गुजराती हो तो नरसिंह मेहता से पूछो और बहुत ठेठ के आदमी है तो गंगा सती से पूछो।।कहीं से जवाब ना मिले तो अंतःकरण की प्रवृत्ति ही प्रमाण है।।गुरु द्रोण ने अधिकार नहीं देखा होगा।पांडवों को लेकर द्रोणाचार्य इस जंगल में क्यों गए?गुरु को मालूम है कोई बैठा है मेरी प्रतिमा ले कर।।आदमी प्रयत्न करें वही साधक है,प्रमादी साधक नहीं।।शायद गुरु को लगा अब दीक्षांत प्रवचन का समय आ गया।अब आखिरी परीक्षा बाकी थी।प्रश्नपत्र के रूप में आया भोंकता कुत्ता! खानदानी उधार नहीं मिलती,दुकानों में बिकती नहीं।।हमारे यहां आत्मा की याद आए बिना नहीं रहती।
कृष्ण गोकुल छोडकर गया,कभी लौटा नहि,देखा तक नहि!कृष्ण ज्यादा याद करता था।उनकी ज्यादा जिम्मेदारियां थी।बड़ों की जिम्मेदारी भी ज्यादा बड़ी होती है।एक बार गया फिर कभी लौटकर नहीं आया गोपियां भी नहीं गई!क्योंकि आग्या थी,मैं आऊंगा। और कृष्ण के सामने पूरे जगत का कार्य पड़ा था। कृष्ण भजनीय है,भजने योग्य कोई है तो श्री कृष्ण है।कृष्ण को नवनीत और नव नीत(नीत-नूतन)अच्छा लगता था।
कृष्ण दो जगह जन्मे:जेल में और जल में।। प्रेम भी करें,न्याय भी करें।प्रेम करने वाला पक्षपाती हो सकता है,न्याय करने वाला स्वार्थी भी हो सकता है कृष्ण दोनों है।।
त्रिभुवन दादा बहुत कम बोलते थे।लेकिन जब भी मैंने बोलते देखा हे हरि-कहते थे और प्रभुदास बापु हे गोविंद-बोलते थे।
कृष्ण के साथ आठ प्रसंग जुड़े हैं।।इनमें एक है: जन्मोत्सव-मथुरा की जेल से लेकर गोकुल का नंद उत्सव-यह पूरा प्रसंग है।।दूसरा प्रसंग:उनकी बाल लीलाएं।यह बाल लीला बचपना नहीं थी।छप्पन भोग खाने वाले ने छप्पन भोग पचाया भी था।।कभी बुद्धपुरुष के बैठ सकते हैं लेकिन वह पचता नहीं। तीसरी:वृंदावन की रासलीला-ऐसा रास ना हुआ है ना कभी होगा!क्योंकि आज भी वह चल रहा है!! चौथा प्रसंग:मथुरा लीला-अक्रूर क्रूर नहीं है।लेकिन कृष्ण ने संकेत किया था कि कुछ समय तुं क्रूर हो जा।मेरे सामने विश्व की समस्त घटनाएं मंडरा रही है पांचवी:द्वारिका की लीला-लोग बोलते हैं ट्रू कॉपी लेकिन कॉपी कभी ट्रू नहीं हो सकती।मैं जब भी द्वारका जाता हूं।बिरला धर्मशाला की मेरी कुटिया से खिड़की खोलती हूं। समंदर में सूर्यास्त दिखता है। लेकिन उस वक्त मुझे सूर्य भी नहीं,समंदर भी नहीं दिखाता। कृष्ण की हर शाम ऐसी होगी,द्वारिका की अटारी पर कृष्ण रोज ढलते सूर्य को निहारता वह मुझे दिखता है।।कृष्ण हमें बहुत याद करता है इसलिए हम उन्हें थोड़ा याद करते हैं।।छठी: हस्तिनापुर की लीला-शकुनी सबसे खतरनाक पात्र है।शकुनि का मतलब है रात्रि और शकुनि के बेटे का नाम उलूक रखा गया है!सातवीं:कुरुक्षेत्र की लीला गीता बोली नहीं गई है,मौन में कही गई है।।अर्जुन की क्षमता थी कि बुद्धपुरुष का मौन समझता था। मेरा गोविंद हिंसक नहीं है।उनके जैसा अहिंसक कोई नहीं।।शिकारी नहीं,शिकारी का खुद भोग बना है।आठवीं लीला है:देहोत्सर्ग की लीला-सोमनाथ के पास प्राची के पीपल के नीचे जो हुआ।सारथी बनाओ तो कृष्ण या कृष्ण भजन को बनाओ,कंस को ना बनाओ।।कृष्ण आया और रुदन किया तब यशोदा जागी है।।हमारी जीह्वा भी यशोदा है। सोई हुई है।बलराम कृष्ण हमारी जीभ पर नाम बनकर बैठे तब जागेगी।।
कभी विदेश में इस जिसे हिप्नोटाइज नाम देते हैं बहुदा ९० प्रतिशत बिमारीयां कृष्ण नाम से जाएगी १० प्रतिशत दवा से जाएगी।।हरिनाम रत्न है।परखने के लिए जोहरी चाहिए और वह जोहरी है सद्गुरु।।सद्गुरु के पास बैठना अडसठ तीर्थ है।। आज कृष्ण जन्म के पूर्व दिन पूरे पंडाल में और बापू के गायन में रास और रास महोत्सव का गान चलता रहा।।
== समाप्त ==

