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कृष्ण तीन प्रकार के सत्य का मालिक है: व्यावहारिक सत्य, प्रातिभाषिक और पारमार्थिक सत्य।।

कृष्ण है तो रस है,कृष्ण है तो रास है,कृष्ण है तो रीस है,कृष्ण है तो सब है,जगत में सिर्फ कृष्ण के सिवा कुछ नहीं है।।

कौन से कर्म बंधन में नहि डालते?

व्यास पीठ को प्रिय होना है तो राग से नहीं अनुराग से सुनो,व्यक्ति नहीं पीठ को देखो।।

विद्या,विनय,निपुणता,गुण और शील-यह पांच तत्वों से गुरु के द्वारा अपनी चेतना दीक्षित की जाती है।।

परम पुरुष पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के द्वारिकानाथ का एक स्वरुप जहां स्थापित है वैसी पावन भूमि उडूपी से श्री कृष्ण के जीवन प्रसंगो और अनकथ रहस्यों को खोलते हुए बापु ने रविवार सुबह संवाद स्थापित करते हुए उपनिषद के श्लोक गान से आरंभ किया और कृष्ण का एक नाम केशव है वो समजाते हुए बताया की भगवान श्री कृष्ण को गीता के न्याय से आठ रूप में प्रस्तुत किया है,इसी का विशिष्ट रूप वाला यह मंत्र है।

यद्यपि कोई कुछ नहीं कह सकता की कृष्ण कैसा है फिर भी हम चेष्टा करते हैं।।

एकमात्र देव(दिव्य रुप में,स्वार्थी या पौराणिक देवता के रूप में नहीं) है।समग्र भूत में गुप्त रूप में व्याप्त है।

केशव का मतलब-वह चाहे तो रहस्य खोलें,चाहे तो ना खोलें!केश-इव-बालों की तरह जिनकी बड़ी जुल्फें-घटा है।वह चाहे तो जुल्फों से चेहरा छुपा दे चाहे तो खोल दे!कृष्ण अंतर ध्यान नहीं हुए,दिखते बंद हो गए हैं।।

तीन प्रकार के सत्य का मालिक-व्यावहारिक सत्य, प्रातिभाषिक और पारमार्थिक सत्य।

आत्मास्वरुप,मन स्वरुप,प्राण स्वरुप इंन्दीय स्वरुप और शरीर ऐसे कृष्ण के पांच स्वरूप वल्लभाचार्य जी ने कहे है।।

कृष्ण है तो रस है,कृष्ण है तो रास है,कृष्ण है तो रीस है,कृष्ण है तो सब है,जगत में सिर्फ कृष्ण के सिवा कुछ नहीं है।।

कृष्ण का मूल सत्य परमार्थिक सत्य है-जो राम,कृष्ण का मूल रूप परम सत्य है।।

साधवीय परिभाषा में बताया की वह कर्म बंधन नहीं करेंगे:एक-राग,द्वेष से मुक्त कर्म कभी बंधन में नहीं डालते।।दो-अहंकार मुक्त कर्म बंधन में नहीं डालता हम कुछ नहीं करते,हो रहा है।।जितना आदमी सहज हो जाएगा उतना कर्म नहीं बढ़ेगा।तीन-खुद के लिए नहीं,पूरे जगत के कल्याण के लिए करें तो कर्म बंधन नहीं लगता।रस्सी के धागे अलग कर दो तो वह बांधने योग्य नहीं रहती।।चा-र विश्व का प्रत्येक कर्म परमात्मा को राजी करने के लिए करें। पांच-यदि फल की आकांक्षा ना रखें तो कर्म बांधेगा नहीं,क्योंकि वह हमारा कर्माध्यक्ष है।।

बापु ने बताया कि व्यास पीठ को प्रिय होना है तो राग से नहीं अनुराग से सुनो,व्यक्ति नहीं पीठ को देखो।।

कथा प्रवाह में नामकरण संस्कार और फिर गुरु के पास चारों राजकुमार पढ़ने गए।जहां विद्या संस्कार पाया।अल्पकाल में सब विद्या पाई।।

विद्या,विनय,निपुणता,गुण और शील-यह पांच तत्वों से गुरु के द्वारा अपनी चेतना दीक्षित की जाती है। विश्वामित्र का आगमन हुआ और राम लक्ष्मण को लेकर निकले।तब बापु ने बताया की मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार रूपी तत्व और आखिर में धनुष्य भंग, सीताराम जी का विवाह और विश्वामित्र का अयोध्या से गमन हुआ और बालकांड का समापन किया गया।।

 

कथा-विशेष

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।कर्माध्यक्षः

सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥

-श्वेताश्वतरोपनिषद् (अध्याय 6, मंत्र 11)

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं

नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं

तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥

-यह कठोपनिषद् 2.2.15 का मंत्र है-मुण्डक और श्वेताश्वतर में भी आता है।

(• एको देवः सर्वभूतेषु गूढः:वह एक ही परमेश्वर सभी जीवों (भूतों) में छुपा हुआ है।

* सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा:वह सब जगह व्याप्त (हाजिर) है और सभी प्राणियों की अंतरात्मा (भीतरी आत्मा) है।

* कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः: वह सभी कर्मों का अध्यक्ष (मालिक/निरीक्षक) है और सभी जीवों का निवास स्थान (आश्रय) है।।

* साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च:वह सबको देखने वाला साक्षी है,परम चेतना है,अकेला (अद्वैत) है और तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे यानी निर्गुण है।

वहाँ उस परम पद में,उस ब्रह्म में-सूर्य प्रकाशित नहीं होता,न चंद्रमा और तारे प्रकाशित होते हैं।वहाँ ये बिजलियाँ भी नहीं चमकतीं,फिर यह लौकिक अग्नि तो कैसे चमकेगी?

वही एक प्रकाशित हो रहा है, और उसी के प्रकाशित होने के बाद सब कुछ प्रकाशित होता है।

उसी की आभा से यह सारा जगत भासित हो रहा है।

जैसे दीये को सूरज दिखाने की ज़रूरत नहीं, वैसे ही उस परम प्रकाश को किसी बाहरी प्रकाश की ज़रूरत नहीं। वही सब प्रकाशों का स्रोत है — जिसके होने से ही देखना, जानना, होना सम्भव है।)

==समाप्त==

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