Homeगुजरातसंत-पीरों की पावन भूमि कोटेश्वर-कच्छ से 952वीं रामकथा का शुभारंभ।

संत-पीरों की पावन भूमि कोटेश्वर-कच्छ से 952वीं रामकथा का शुभारंभ।

जो सर्व समर्थ है, वही ईश्वर है।

कच्छ की भूमि को संतों और रामकथा से अपार प्रेम है।

कथा तो रामकथा ही है! लीलाएँ कृष्ण की हैं और चरित्र शिव का विशेष है। 

कथा बीज पंक्तियाँ:

जो सबके रह ध्यान एकरस;

ईश्वर जीव ऊद कहऊं कस।

ईश्वर अंश जीव अविनाशी;

चेतन अमल सहज सुखरासी। 

कथा के शुभारंभ में नारायण सरोवर जागीर, जानकीदास बापू-कमीजला, दिनेशगिरि बापू – कोटेश्वर, दिलीप राजा कापड़ी-मोरजर, त्रिकमरायजी बापू – अंजार, महादेव बापू – मोडपर, कल्याणदासजी – हिंगराज, शिवराम साहेब-कबीर मंदिर मोरबी, जगदीश बापू, मूलदास बापू-राममढ़ी और रामानंदी साधु समाज द्वारा दीप प्रज्ज्वलन हुआ। 

बीएसएफ के जवान भी उपस्थित रहे। अबडासा के विधायक प्रद्युमनसिंह जाडेजा, भुज के विधायक केशुभाई पटेल, मांडवी के विधायक अनिरुद्ध दवे, झूलेलाल मंदिर ट्रस्ट के दीपकभाई भानुशाली, तथा पूर्व विधायक बाबूभाई मेघजी शाह की इस मौके पर विशेष उपस्थिति रही। 

कथा क्रम की 952वीं और कच्छ पर विशेष कृपा रूपी 35वीं रामकथा का शुभारंभ करते हुए पूज्य मोरारी बापू ने मनोरथी प्रविणभाई तन्ना परिवार की साधुभावना स्वीकारते हुए कहा कि त्रिकमरायजी की ध्वजा की छाया, भगवान कोटेश्वर, रामानंदी साधु समाज, झूलेलाल भगवान-इन सभी देव मंदिरों की छाया में कथा की विशेष प्रसन्नता है। 

पूज्य बापू ने कहा कि कच्छ की भूमि को साधु-संतों और रामकथा से अपार प्रेम है और इसका मैं वर्षों से साक्षी हूँ। कोटेश्वर शब्द स्वतंत्र रूप से मानस में नहीं है। ईश्वर शब्द को चुना गया है। एक बार मानस ईश्वर पर धृष्णेश्वर में कथा हुई थी। ईश्वर तत्व, परमात्म तत्व, ब्रह्म तत्व, परम तत्व क्या है? वास्तव में यह सब एक ही है, लेकिन विभिन्न शब्दों से परम को पुकारा जाता है। ईश्वर शब्द आते ही अधिकांशतः भगवान शिव की ओर संकेत होता है। राम, कृष्ण, जगदंबा भी ईश्वरीय शक्तियां हैं। ईश्वर शब्द भगवान शिवजी की ओर अधिक संकेत करता है। शंकर का चरित्र, उसकी विशेषता आदि को केंद्र में रखकर संवाद करेंगे। 

हमारे यहाँ कथा, लीला और चरित्र – तीन शब्द हैं। कथा तो रामकथा ही है! लीला कृष्ण की और चरित्र शिव के विशेष हैं। इसलिए रामकथा के प्रारंभ में शिव चरित्र गाया गया। उसके कुछ अंशों और रहस्यों पर संवाद करेंगे। ईश्वर वह है जो सब कुछ कर सकता है। जो नहीं हुआ उसे भी विलीन करने में समर्थ है। जो सर्व समर्थ है, वही ईश्वर है। ईश्वर सुई के छेद में ऊँट प्रवेश करवा सकते हैं, ऐसी नारद जी से जुड़ी कथा है। समर्थवान होना ही ईश्वरत्व है। दूसरा समर्थ शब्द सदगुरु से जुड़ा है। निर्वाण प्राप्त करने वाला चला जाता है, लेकिन परम निर्वाण प्राप्त करने वाला जब चाहे तब वापस आ सकता है। समाधियों में एक चेतन समाधि भी होती है। कच्छ में भी कई चेतन समाधियाँ हैं, इसलिए कच्छ अधिक कथा को आत्मसात करता है, यही उसकी महिमा और गरिमा है। 

यह कच्छ में 35वीं कथा है और 36वीं कथा माधापर में हो, ऐसा मनोरथ है। परमात्मा के नाम द्वारा भी समाधि प्राप्त होती है। ईश्वर शब्द मानस में आठ बार आया है। शिव अष्टमूर्ति हैं और शिवजी के अष्टकों में रुद्राष्टक श्रेष्ठ है। 

कथा महात्म्य, वंदनाएँ, पंचदेवों की वंदना, गुरु वंदना और हनुमान वंदना का पवित्र, प्रवाही क्रम कहकर आज का विश्राम दिया गया। 

कथा विशेष: 

पीरारी-धोरारी, कच्छ की भूमि पर पूज्य मोरारी बापू की 35वीं रामकथा। 

कच्छ के नारायण सरोवर में बापू के मुख से कच्छ में गूंजने वाली यह 35वीं रामकथा है। श्री प्रविणभाई तन्ना इस कथा के मनोरथी हैं। 

कच्छ का नारायण सरोवर सनातन धर्म संस्कृति के पाँच पवित्र सरोवरों में से एक है। मानसरोवर, पंपा सरोवर, बिंदु सरोवर, पुष्कर सरोवर और नारायण सरोवर – ये पाँच पुराण प्रसिद्ध जल तीर्थ हैं। 

नारायण सरोवर का अर्थ है – भगवान श्री विष्णु का सरोवर। पौराणिक कथाओं के अनुसार सरस्वती नदी, नारायण सरोवर के पास समुद्र में मिलती थी और इस सरोवर को अपने जल से भर देती थी। इसलिए यह स्थान सनातन धर्म का पवित्र तीर्थ है। 

यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर है सनातन धर्म का एक और प्राचीन तीर्थ – कोटेश्वर। भारत की सीमा का अंतिम स्थान कोटेश्वर समुद्र तट पर स्थित है। रावण को उसकी कठोर तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव ने वरदान दिया था। यह वरदान शिवलिंग के रूप में था, लेकिन देवताओं ने छल किया। ब्रह्माजी ने कीचड़ में फंसी गाय का रूप धारण किया और दूसरा रूप गाय को बचाने वाले ब्राह्मण का लिया। गाय को बचाने के लिए ब्राह्मण ने विनती की, जिससे रावण ने शिवलिंग नीचे रखा और उसी क्षण मूल शिवलिंग कोटि शिवलिंगों में परिवर्तित हो गया। रावण उनमें से एक शिवलिंग लेकर चला गया, लेकिन मूल शिवलिंग यहीं रह गया। भगवान महादेव का यह दिव्य शिवलिंग बाद में कोटेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

कच्छ के इन दो पुराण प्रसिद्ध तीर्थों के मध्य स्थित श्री झूलेलालजी मंदिर के विशाल प्रांगण में कथा का आयोजन हो रहा है। 

कच्छ में पूज्य मोरारी बापू ने पहली रामकथा अक्टूबर 1973 में अंजार में की थी, जो कथा क्रम की 66वीं कथा थी। 

कच्छ की भूमि पर 34वीं कथा मार्च 2024 में रावेची धाम में “मानस मनोरथ” नाम से हुई थी। 

नारायण सरोवर में इससे पूर्व 11/03/1989 से 19/03/1989 के बीच मोरारी बापू ने एक कथा की थी, जो कुल कथा क्रम की 391वीं रामकथा थी। इस कथा का शीर्षक था मानस कथा। 

इसी प्रकार, कोटेश्वर में भी पूर्व में एक रामकथा का आयोजन हुआ था, जो 26/02/2005 से 06/03/2005 तक चली थी। वह कुल कथा क्रम की 635वीं रामकथा थी, जिसका शीर्षक था मानस सेतुबंध। 

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