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ओशो भूमि पर कथा ने विराम लिया,नइ-९६९ वीं कथा २० डीसेम्बर से बालाजी तिरुपति से प्रवाहित होगी।।

कोई कोई सौंदर्य ऐसा होता है जितना निकट जाओ और सुंदरता का अनुभव होता है।।

राम सुंदर है सुदूर नहीं है।।

राम एक ऐसा सौंदर्य बोध है जो दूर नहीं,जरा गरदनन झुकावो दिल में ही दिखते हैं।।

राम सूजान है मतलब हमारी जान की बातें जानने वाला है।।

साधक जप ना करें परमात्मा उसका जप करें,यह आखरी है,यह सूजान जप है।।

सब कुछ होने के बाद कथा में रुचि नहीं तो हम अनाथ हैं।।

विश्व प्रसिध्ध दार्शनिक ओशो की जन्म,कर्म और तपोभूमि जबलपुर से चल रही रामकथा के विराम के दिन ओशो की दिव्य चेतना को वंदन करते हुए उपसंहारक बातों आरंभ के पूर्व ये छंद,जो बीज पंक्तियों के तहत लिया गया है इनका गान हुआ:

सुंदर सुजान कृपानिधान अनाथ पर कर प्रति जो।

सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।

जाकी कृपा लवलेश ते मतिमंद तुलसीदास हूं।

पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाही कहूं

-उत्तरकॉंड दोहा-१३०

बापू ने बताया कि हमारे गुजराती में एक कहावत है पर्वत दूर से सुंदर दिखते हैं।लेकिन यह पूर्णतया सत्य नहीं 80% सत्य है।।फिर भी कभी-कभी जितना निकट मानसिक और आत्मिक उतना ज्यादा सुंदर दिखता है।।और पहाड़ों को छोड़िए,आपने हिमालय की यात्रा की होगी तो देखा होगा हिमालय के निकट जाते ही वह ज्यादा सुंदर लगता है।। मैं अनुभव और महसूसी की है कि विमान से कैलाश निकट दिखाई देता है तो हम फूट-फूट कर रोये है। कोई कोई सौंदर्य ऐसा होता है जितना निकट जाओ और सुंदरता का अनुभव होता है।।गोस्वामी जी ने कैलाश के लिए सुंदर नहीं परम रम्य गिरी वर कैलासु कहा है।।

राम सुंदर है सुदूर नहीं है।।राम एक ऐसा सौंदर्य बोध है जो दूर नहीं।।जरा गरदनन झुकावो दिल में ही दिखते हैं।।

गोस्वामी कहते हैं:

जिनके श्रवण समुद्र समाना।

कथा तुम्हारी सुभग श्रुति नाना।।

ऐसे आंख बंद की और सौंदर्य महसूस किया। राम सूजान है मतलब हमारी जान की बातें जानने वाला है। किसी ने मौन से पुकारा,किसी ने मुखर होकर, किसी ने रोकर,किसी ने नृत्य कर कर पुकारा,सुन लिया है।। क्योंकि चींटी के पैर के नूपुर की आवाज भी परमात्मा सुन लेता है।।

शास्त्रों में नाम जपने की तीन विद्या कही है:वाचिक जप है। दूसरा उपांशु जप है।आपको ही सुनाई दे इतना मंद स्वर में जाप होता है। और तीसरा मानसी जप खुद भी ना सुन सके केवल मन रटन करें।। लेकिन में दो और जोड़ना चाहता हूं।चौथा जब जप को भी पता नहीं अंदर ही जप चालू रहे।।खुद जप अपने अंदर जप-जप रहा है।। और पांचवा प्रकार साधक जप ना करें परमात्मा उसका जप करें। यह आखरी है।यह सूजान जप है। जिसे हम पुकारे वही हमें पुकारता है।।

भरत सरीस को राम सनेही।

जग जपु रामु,रामु जपु जेही।।

राम कृपा निधान है कृपण नहीं है।। कोई भी सद्गुरु उसे कृपा निधान तब समझो जब पांचो प्रकार की कृपा करें।।जीने में कृपा पंचक कहता हूं:शब्द से कृपा करें।जासू वचन रवि कर निकर। बोले सो निहाल! दूसरा स्पर्श कृपा-डिवाइन टच। जिसके हाथ पूर्णतः पवित्र है। हाथ ही परमात्मा है।। रूप कृपा-आंतर बाह्य रूप नितांत निर्दोषिता।। रस कृपा पत्थर को भी पिघला दे। संवेदना मुक्त में भी रस पैदा करें, रस जगा दे।। पांचवा है गंध कृपा- सद्गुरु की महक, पिराई खुश्बू।

सब कुछ होने के बाद कथा में रुचि नहीं तो हम अनाथ हैं।।

रामेश्वर की स्थापना के बाद राम रावण युद्ध हुआ। रावण को निर्वाण पद दिया गया। राम राज्याभिषेक हुआ। राम राज्य का वर्णन के बाद कागभुसुंडि का चरित्र और गरुड़ के सात प्रश्न बाद में अयोध्या के वारिस का नाम देकर तुलसी ने कथा को विराम कीया। तीनों घाट पर कथा ने विराम लिया। हम भी कथा के आयोजन पर बहुत प्रसन्नता व्यक्त करते हुए साधुवाद देकर कथा के विराम पर इन कथा का सुफल आज तक अनादि काल से सभी भूखंडों पर जिन-जिन बुद्ध पुरुषों ने परम विश्राम पाया है सबके चरणों में फल अर्पण करते हुए कथा को विराम दिया गया।।

अगली कथा जो कुल कथा क्रम की ९६९वीं रामकथा है।।२० डीसम्बर से तिरुमला म्युझीयम के सामने तिरुमला तिरुपति(आंध्र प्रदेश) से शुरु होने जा रही है।।

ये कथा का जीवंत प्रसारण नियत समय पहले दिन शनिवार को शाम ४ बजे से और बाकी के दिनों में सुबह १० बजे से आस्था टीवी चेनल और चित्रकूटधाम तलगाजरडा यु-ट्युब चेनल से होगा।।

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