
“साधुओं के लिए यह एक मध्यम मार्ग की यात्रा है।”
“स्मृति प्रसाद है, स्मरण प्रयास से आता है।”
“हम नीलकंठ तो नहीं बन सकते, पर यदि शीलकंठ बन जाएँ, तो भी बहुत है।”
“बुद्ध ने जब घर, परिवार और संसार का त्याग किया, और अंततः तप व निर्वाण (मुक्ति) का भी त्याग किया — तभी उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई।”
लगातार दो दिनों की रेल यात्रा के बाद पूज्य मोरारी बापू की ऐतिहासिक मानस रामयात्रा तमिलनाडु के पवित्र तीर्थस्थल रामेश्वरम पहुँची। सातवें दिन की कथा के अवसर पर बापू ने पूर्व राष्ट्रपति, अजात शत्रु डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को श्रद्धा से स्मरण करते हुए कहा, “यह उनकी भूमि है और उन्होंने ‘जय विज्ञान’ का संदेश दिया था।”
आज की कथा में दिल्ली रामकथा के मनोरथी जैनाचार्य लोकेश मुनिजी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
पूज्य मोरारी बापू ने कथा के दौरान कहा, “देश में अनेक पीठें हैं, पर एक ऐसी पीठ की ज़रूरत है जहाँ न कोई वैर हो, न कोई विग्रह, न कोई विरोध।जो केवल सद्भाव का प्रतीक हो।”
बापू ने आगे कहा कि संसारिक दृष्टि से देखने वालों को यह यात्रा बाह्य यात्रा लगेगी, और विरक्त या संन्यासी के लिए यह अंतरयात्रा है। “किन्तु मैं अपने दृष्टिकोण से कहूँ तो यह साधुओं के लिए मध्यम मार्गी यात्रा है।ठीक उसी तरह जैसे देहरी पर रखा दीप भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश फैलाता है।”
बापू ने कबीर साहेब का स्मरण करते हुए कहा: “जल में कुम्भ, कुम्भ में जल, बाहर भीतर दोंनो पानी…”
बापू ने कहा, “तीन मुख्य बिंदु समझने योग्य हैं। राम प्राकट्य, रामसेतु और रामराज्य। राम प्राकट्य के बिना रामसेतु नहीं बन सकता, और रामसेतु के बिना रामराज्य की कल्पना संभव नहीं हो सकती।”
राम ने जो सेतु बनाया था, वह कालांतर में टूट गया, पर तुलसीदासजी ने ‘रामचरितमानस’ में जो रामसेतु रचा है, उसे तोड़ना असंभव है। ऐसी यात्राएँ उसी रामसेतु के पुनर्निर्माण का माध्यम हैं। पहले राम प्राकट्य, बीच में रामसेतु, और अंत में अयोध्या में रामराज्याभिषेक, यही क्रम है।”
भगवान शिव के विवाह उपरांत वे कैलाश पर वेदों में वर्णित वटवृक्ष की छाया में स्वयं अपने आसन पर विराजमान हुए।
“निजकर दासी नागरिपु छाला, बैठै सहजहि शंभु कृपाला।”
उसी समय पार्वतीजी ने उचित अवसर देखकर भगवान शिव से राम प्राकट्य के कारणों के विषय में प्रश्न किया। शिवजी ने बताया कि पृथ्वी पर जब रावण का अत्याचार बढ़ गया, तब पृथ्वी गौमाता का रूप धारण कर ब्रह्मा से प्रार्थना करने गई, और सब देवताओं ने मिलकर पुकार की। तब आकाशवाणी हुई, और उसके बाद अयोध्या में पुत्रकामेष्टि यज्ञ द्वारा चार पुत्रों का प्राकट्य हुआ।
बापू ने कहा, “गुरु धर्म और मोक्ष के समय साथ होते हैं, अर्थ और काम की यात्रा हमारे विवेक पर छोड़ते हैं, फिर भी वे छाया की तरह सदा हमारे साथ चलते हैं।
स्मृति और स्मरण में अंतर है। स्मृति प्रसाद है, स्मरण प्रयास से आता है। हम नीलकंठ नहीं बन सकते, पर यदि ‘शीलकंठ’ बन जाएँ तो भी बहुत है।
त्रिभुवन ने राम प्राकट्य का स्वागत अत्यंत सहजता से किया। दशरथ को परमात्मा की प्राप्ति प्रयास से नहीं, प्रसाद से हुई।
जब उन्होंने वस्त्र, धेनु, स्वर्ण और रत्नों का दान किया, तब उनकी पुत्री शांता (शांति)आई। त्याग से ही शांति आती है।
उसी प्रकार बुद्ध ने घर, परिवार और संसार का त्याग किया, और अंत में तप व निर्वाण (मुक्ति) का भी त्याग किया, तब बुद्धत्व प्राप्त हुआ।
बाल काण्ड के समापन के बाद, राम सभी काण्डो का उल्लेख करते हुए रामेश्वरम की भूमि पर आते हैं। लंका काण्ड में जहाँ रामेश्वर की स्थापना हुई थी, वहीं अब कथा आगे बढ़ेगी। एक दिन की हवाई यात्रा के बाद अगली कथा का गान कोलंबो (श्रीलंका) में होगा।
आज की कथा रामेश्वर को अर्पित की गई।
अब एक दिन कथा का विराम रहेगा, और 3 नवम्बर को आगे की कथा का आरंभ होगा।

