नालंदा:
“गुरु गृह गये पढ़न रघुराई।
अल्प काल विद्या सब पाई।।
तब ऋषि निज नाथहि जियं चीन्ही।
विद्या निधि कहौं विद्या दीन्ही।”
बालकांड की इन दो चौपाइयों को केंद्र में रखते हुए पूज्य मोरारी बापू ने राजगीर की धरती पर रामकथा का शुभारंभ किया।
बापू ने कहा, “मैं यहां केवल प्रवचन के लिए नहीं, बल्कि इस पावन धरती को प्रणाम करने आया हूं। प्रणाम के बाद जो प्रसाद प्राप्त होगा, उसी को प्रवचन के रूप में बांटूंगा। मैं इस भूमि पर थोड़ा स्वाध्याय करने आया हूं। उपनिषद कहता है कि स्वाध्याय के बिना प्रवचन संभव नहीं। इसलिए इस विद्याभूमि को प्रणाम करके, स्वाध्याय करूंगा और जो प्रसाद प्राप्त होगा, उसे आप सबके साथ साझा करूंगा।”
बापू ने कहा कि उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में कथा की है और अब हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भी करने जा रहे हैं, लेकिन नालंदा विश्वविद्यालय में कथा करने का अनुभव अलग ही है। उन्होंने कहा, “तुर्क आक्रांताओं ने इस भूमि की इमारतें तोड़ीं, पुस्तकालय जलाया, लेकिन हमारे विश्वास को नहीं मिटा सके। आज भी वह आग बुझी नहीं है – यह धर्म की, विद्या की, साधना की अग्नि है।”
चीन के यात्रियों ने लिखा है कि नालंदा में प्रवेश से पहले द्वार पर ही परीक्षा ली जाती थी, और जैसे ही कोई विद्यार्थी भीतर प्रवेश करता, विद्या स्वयं उसके पास चली आती। बापू ने कहा, “तुलसीदासजी की पंक्ति ‘अल्प काल विद्या सब आई’ आज शताब्दियों बाद भी साकार होती प्रतीत हो रही है।”
नालंदा शब्द का अर्थ बताते हुए बापू ने कहा, “नालम् ददाति इति नालंदा। ‘नालम्’ का अर्थ होता है कमल की डंडी, जो असंगता का प्रतीक है। विद्या वही है जो असंग करे। जो आसक्त करे, वह विद्या नहीं। नालंदा ज्ञानपीठ है, विद्यापीठ है, व्यासपीठ भी है, और भगवान बुद्ध के चरणों की भूमि है। समीप ही भगवान महावीर की भूमि, विरायतन भी है।”
विरायतन का उल्लेख करते हुए बापू ने कहा कि यहाँ स्वच्छता भी है और पवित्रता भी है। उन्होंने आगे कहा कि देश में स्वच्छता अभियान तो सफल रहा, लेकिन अब पवित्रता का अभियान चलाना होगा।
नालंदा विद्यापीठ के संदर्भ में बापू ने कहा कि रामचरितमानस में नौ विद्यापीठों का उल्लेख है। उस समय विद्यापीठों को गुरुकुल कहा जाता था। पहली विद्यापीठ वशिष्ठ महाराज की थी, जहां स्वयं विद्या के निधि भगवान राम ने भी शिक्षा प्राप्त की थी। वशिष्ठजी शास्त्र की विद्या प्रदान करते हैं।उनका विद्यालय विशिष्ट और वरिष्ठ था। दूसरी विद्यापीठ विश्वामित्रजी की थी, जहां भगवान राम और शस्त्र के साथ शास्त्र की विद्या भी प्राप्त की। तीसरी विद्यापीठ भगवान परशुराम की थी, जो महेन्द्रगिरि पर्वत पर स्थित थी। चौथी विद्यापीठ प्रयाग की, महाराज भारद्वाजजी की थी। पाँचवीं विद्यापीठ महर्षि गौतम की थी, जो भगवान राम के चरण पड़ने के बाद पुनः सक्रिय हुई थी।
इसके बाद वाल्मीकि जी की विद्यापीठ का उल्लेख है, जहां सभी वेदों, विद्याओं और वाद्य संगीत की शिक्षा दी जाती थी। यह शून्य से पूर्णता तक की विद्या प्रदान करने वाली विद्यापीठ थी। महर्षि कुम्भज की विद्यापीठ विचारों की विद्यापीठ थी और उन्होंने भगवान राम को वैश्विक विचार प्रदान किए। उज्जैन का महाकाल मंदिर भी एक प्रकार की विश्वविद्यालय है, जहां परम साधुजन शिक्षा और दीक्षा देते हैं। नौवीं विद्यापीठ मेरु पर्वत के शिखर पर स्थित लोमस विद्यापीठ है, जो मानस की अंतिम विद्यापीठ मानी जाती है।
बापू ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि हमें अपने मन से प्रारंभ करके वैश्विक चेतना तक पवित्रता का अभियान चलाना है। हनुमानजी की चार पवित्रताओं का उल्लेख किया करते हुए उन्होंने कहा कि हनुमानजी महाराज में चार प्रकार की पवित्रता देखने को मिलती है। पहली है धर्म की पवित्रता — धर्म सदा पवित्र होना चाहिए। दुर्भाग्यवश कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए धर्म को भी अपवित्र कर डाला है। दूसरी है अर्थ की पवित्रता — अर्थ की पवित्रता बनाए रखना अत्यंत कठिन है। आज तो शास्त्र के अर्थ भी हम अपने स्वार्थ के अनुसार निकालते हैं। हनुमानजी में तीसरी पवित्रता है काम की पवित्रता — जब वे लंका पहुंचे और वहां स्त्रियों को देखा, तब भी उनके मन में कहीं भी काम का उद्भव नहीं हुआ। चौथी और अंतिम है मोक्ष की पवित्रता — मोक्ष की सर्वोच्च पवित्रता प्रेम है।
इस कथा का शीर्षक बापू ने “नालंदा विश्व विद्यालय” रखा और बताया कि यह मनोरथ परिवार की भावना और उनका संकल्प था कि नालंदा में एक बार कथा हो। पहले दो चौपाइयों में वशिष्ठ और विश्वामित्र की विद्यापीठों का दर्शन होता है। हमने जो केंद्रीय पंक्तियाँ पसंद की हैं, उनमें पहली चौपाई वशिष्ठजी के विद्यालय का दर्शन कराती है और दूसरी चौपाई विश्वामित्रजी के विद्यालय का।
कथा की शुरुआत में बापू ने कहा, “प्रथम दिन मंगलाचरण करने की परंपरा है। परंपरा पवित्र, प्रवाही और परोपकारी होनी चाहिए। मानस के सात कांडों की तात्त्विक, सात्त्विक और वास्तविक भूमिका को समझने के लिए गुरु के पास जाना चाहिए। यदि गान न कर सको, तो श्रवण करो।”
रामचरितमानस की शुरुआत सात मंगल मंत्रों से होती है और अंत में गरुड़जी सात प्रश्न पूछते हैं। मानस के केंद्र में न वर्ण है, न जाति, न कुल – केवल मनुष्य है। इसलिए भगवान भी मनुष्य रूप में अवतरित हुए।
वंदना प्रकरण में श्री हनुमानजी की वंदना के साथ बापू ने आज की कथा में वाणी को विराम दिया।
बॉक्स आइटम:
राजपीठ का कर्तव्य है कि वह व्यासपीठ को सम्मान दे।
विद्या वह है जो असंग करे, आसक्त करे वह विद्या नहीं।
इमारत को जलाया जा सकता है, लेकिन विश्वास नहीं को नहीं!
हमें अपने मन से लेकर वैश्विक चेतना तक पवित्रता का अभियान चलाना होगा।
परंपरा प्रवाही होनी चाहिए, बंदी नहीं।
हम मनुष्य को इकट्ठा कर सकते हैं, खड़ा नहीं कर सकते!
हमारे जीवन का केंद्रबिंदु हमारा गुरु होना चाहिए।
साधु कोई संज्ञा नहीं, विशेषण नहीं, क्रिया नहीं, कर्म नहीं – साधु एक स्वभाव है।

