Homeगुजरातवास्तु शास्त्र में पेड़-पौधों की भूमिका: कहां लगाएं, किनसे बचें

वास्तु शास्त्र में पेड़-पौधों की भूमिका: कहां लगाएं, किनसे बचें

पेड़-पौधे हमारे लिए काफी उपयोगी हैं। पेड़-पौधों से हमें खाने के लिए भोजन व फल मिलते हैं। ये हमारे स्वास्थ्य को उत्तम बनाते हैं। फल खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। हम विभिन्न रोगों से दूर रहते हैं। पेड़-पौधे वातावरण को शुद्ध व प्रदूषण मुक्त रखते हैं। ये प्राण ऊर्जा के प्रतीक हैं। पेड़-पौधों से हमें भरपूर ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है। हम शुद्ध हवा लेते हैं। इतने उपयोगी पेड़-पौधों का भला वास्तु में क्यों नहीं महत्त्व हो?

पेड़-पौधे भवन व स्थल की सुंदरता में भी वृद्धि करते हैं। भवन के आस-पास, सामने, पीछे, लॉन, बगीचे में पेड़-पौधों की उपस्थिति सौंदर्य व आकर्षण में वृद्धि करती है। ये पेड़-पौधे हमारी आंखों को प्रिय लगते हैं। हमारी आंखों को ठंडक पहुंचाते हैं। पेड़-पौधें वातावरण को शीतल रखते हैं। गर्मियों में राह चलने वाला राही कड़ी धूप से बचने के लिए पेड़-पौधे की छाया की तलाश करता है और पेड़ देखते ही उसकी तरफ खिचा चला आता है। पेड़-पौधे उत्साह व आनंद के प्रतीक हैं। ये अपना भोजन बनाने के लिए किसी पर आश्रित नहीं होते है। ये प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा संपूर्ण वातावरण को जीवंत बनाते हैं। प्राण-ऊर्जा की सृष्टि करते हैं। ये आस पड़ोस से आने वाली अशुभ ऊर्जा को रोकते हैं। इतना ही नहीं, ये परेशान करने वाले कोनों को भी ढक लेते हैं।

पेड़-पौधे जीवित प्राणी हैं। इनका रूप, आकार, भार आदि में बदलाव होता रहता है। इसके कारण आस-पास की ऊर्जाओं का अनुपात भी बदल जाता है। वास्तु शास्त्र में पेड़-पौधे की उपस्थिति जीवन व जगत के लिए अनिवार्य मानी गई है। भवन के पीछे विस्तृत हरित क्षेत्र होना अत्यत शुभ माना गया
है। भवन के पीछे बड़े-बड़े पेड घने वृक्ष आदर्श हैं। जबकि भवन के दरवाजे के सामने या खिड़की के सामने पेड़ नहीं होना चाहिए।

मुख्य प्रवेश द्वार के सामने भी पेड नहीं होना चाहिए. विशेषतः बड़ा वृक्ष का होना ठीक नहीं है। वास्तु में उसको वेध माना गया है। यह को इससे ज्यादा यह जानना जरूरी है कि हमारे भवन में पेड-पौधों की उपस्थिति कहां, कैसा व किस प्रकार से हो।

भवन के आगे या पीछे के द्वार के एकदम सामने कोई बड़ा वृक्ष न लगाएं। ये घर में आने वाली सौर किरणो को रोकते हैं। पेड़ों से घिरे द्वारों वाले घरों में रहने वाले लोग सुरत व निकम्मे हो जाते हैं।

नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क आदि देशों में लोगों को सूर्य का प्रकाश बहुत कम मिलता है। सर्दियों में तो यह बिल्कुल ही नहीं मिलता है। या अत्यंत कम मिलता है। एक वैज्ञानिक अध्ययन से यह पता चला है कि सूर्य का प्रकाश नहीं मिलने अथवा इसकी कमी से निवासी शराबी, आत्मघाती और अवसाद के शिकार हो जाते हैं।

भवन परिसर में कांटेदार पेड़ों का होना शुभ नहीं होता है। कोणीय या तीखे पौधे अत्यधिक रजस ऊर्जा की सृष्टि करते हैं। ये निवासियों को आवश्यकता से अधिक सक्रिय कर देते हैं। ऑफिस में लाल गुलाब का पौधा लगाने से सृजनात्मकता और सक्रियता बढ़ जाती है। इस तरह कुछ कांटेदार पौधे अपवाद हैं। घर में बबूल का पेड़ और मरूस्थलीय झाड़ियां नहीं लगाना चाहिए। वास्तु में ये शुष्क व कठोर व्यवहार के प्रतीक माने गए हैं। घर के लोग इनकी उपस्थिति के प्रभाव से संवेदनहीन हो जाते हैं।

रबर प्लांट, बरगद के वृक्ष तामसी वातावरण का निर्माण करते हैं। अतः भवन के आस-पास ये न हों। ये निवासियों को आलसी व मूर्ख बना देते हैं। ये धूप को भी घर में प्रवेश से रोकते

वृक्ष वृद्धि, विकास और दीर्घायु के प्रतीक हैं। ये निवासियों तथा प्रकृति में अच्छा तालमेल रखते हैं।

पतझड़ वाले पौधों की बजाए सदाबहार वृक्ष अधिक उत्तम हैं। बंद घरों में बाहरी पेड़-पौधों से निकलने वाली प्राण ऊर्जा नहीं पहुंच पाती। उसके कारण शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो जाती हैं। अवसाद के कारण अक्सर शरीर बीमार हो जाता है।

जानीर के अदर कुछ विशेष प्रकार के पौधों को लगाने से घर की नकार कक अदरजी दूर होती है। आस-पास हरे पेड-पौधे होने चाहिए। ये प्राण ऊर्जा के प्रतीक है।

बंजर धरती में स्थित हरित क्षेत्र मानवों के निवास के लिए उत्तम माने जाते हैं। गर्म मरूस्थल के बीच स्थित मरूद्यान ऐसी जगह का एक उदाहरण है।
पेड-पौधों की पत्तियां और फूल विभित्र रंगों के होते हैं। प्रकृति की इस रंग चिकित्सा से खराब वास्तु के अनेक दुष्प्रभावों

को कम व निष्फल किया जा सकता है।

अशुभ या अनिच्छित दृश्यों से बचने के लिए घर के गिर्द पेड़-पौधों को ढाल के रूप में लगाया जा सकता है। मंदिरों, श्मशान घाट, कूड़ाघर, तीव्रगति वाहन, खभों और कोनों से बचने के लिए पेड़-पौधों का प्रयोग करना अधिक शुभ रहता है।

घर के पास श्मशान घाट या कब्रिस्तान नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा है, तो घर के गिर्द पेड़ों की बाड़ लगाकर घर और श्मशान घाट को अलग-अलग किया जा सकता है। तब कब्रिस्तान या श्मशान घाट की अशुभ ऊर्जा को घर में प्रवेश करने से पेड़ों की बाड़ रोक देती है। प्रायः यह कहा जाता है कि घर के पास कब्रिस्तान हो, तो घर के निवासी दुखी, मायूस, व अवसाद के शिकार हो जाते हैं।

टी-चुमा मार्ग के दुष्प्रभावों से बचने के लिए वृक्षों का प्रयोग किया जा सकता है। वृक्षों का आकार गोल या पिरामिड नुमा होना चाहिए। रात में इनके आकार ठरावने न दिखें।

नुकीले पत्तों वाले पौधों की बजाए गोल पत्ते कले पौधे लगाना अधिक शुभ असर डालता है।

घर में बोनसाई के पौधों को नहीं लगाना चाहिए। ये दास के प्रतीक हैं। ये दबने-कुचलने के प्रतीक हैं। ये नैसर्गिक वृद्धि में बाध क बनते हैं। घर में चमकदार पौधों, चमकदार पत्तों, सुंदर फूलों और सुगन्धियों से भरे पौधों को प्राथमिकता देना चाहिए।

पौधे बहुत कुछ इशारा भी करते हैं। पौधे ज्ञान व विज्ञान के प्रतीक है। घर के बदलते वातावरण का आयास कराते हैं। यदि घर में तुलसी का पौधा या अन्य औषधीय पौधे बढ़ नहीं पाते अधया सूख जाते हैं, तो यह समझना चाहिए कि घर में अशुभ ऊर्जाओं की उपस्थिति हो गई है। याद रखें-पौधे ऐसी जगह पर अच्छी तरह उगते हैं, जहां खुली ताजी हवा, सौर प्रकाश, सही तापमान और नमी हो और जहां हानि कारक प्रदूषण न हो। यदि आपके घर में लगाया गया कोई पौधा अनुकूल वृद्धि व विकास करता है, तो यह समझ लेना चाहिए कि घर में सब कुछ ठीक चल रहा है। वास्तुदोष का खतरा नहीं।

घर में मुरझाए, कुम्हलाए पौधों को नहीं रखना चाहिए। ये अशुभ ऊर्जाओं के द्योतक हैं। सुगंधित प्रकृक्ति के पौधे सबसे उत्तम होते हैं। सुगंध प्राण वायु को आकर्षित करती है। दुर्गन्ध इसकी विकर्षित करती है। कुछ शुभ पेड़-पौधे इस प्रकार है: चेरी, बंस, चमेली, मोगरा, केला, चंदन, नारियल, जैतून, शहतूत, पान, नीम, सुपारी, तुलसी, लौंग, गुड़हल, अमलतास, शिरीष, चंपा, कुमुद, कमल, लिली, मेथी, अदरक, पुदीना, अशोक, इलायची, आदि। भवन के अंदर छोटे-पेड़ पौधे लगाना शुभ रहता है। अतः यह कहा जा सकता है कि सुंदर वास्तु के निर्माण में पेड़-पौधे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेखिका : साध्वी जी चिंतन प्रज्ञा श्रीजी

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