
तथाकथित पंडित और विद्वान के प्रमाण भी अनुमान सिद्ध हो जाते हैं।।
लेकिन अंतर्यात्रीभजनानंदी का अनुमान भी प्रमाण हो जाता है।।
प्रत्येक का हित सोचेगा उसे कोई दुख होगा नहीं। दूसरे का निरंतर द्रोह करने वाला कभी निर्भय नहीं रह सकता।
जो पूण्य कर्म करते हैं वह यश के भागीदार बन जाते हैं।।
मौन गुरु है और गुरु मौन है।।
निरंतर राम भजन विधि है, राम को भूल जाना सबसे बड़ा निषेध है।।
कहा कथा निज गुरु से सुनो।।
पर गुरु से अन्य बातें सुनो और सर्व गुरु को प्रणाम करो।।
दक्षिण अमरीका के लिटलरोक्स से चल रही रामकथा का मंगलमयी दूसरा दिन,नइ उर्जा के साथ
पहले दिन की कथा का अंग्रेजी सारांश बोस्टन से आए नरेश भाई ने सुनाया।।
आरंभ में थोड़े प्रश्न थे। किसी ने पूछा बापू मार्गी शब्द केवल आंतरिक यात्रा के लिए है या बाह्य यात्रा के लिए? बापू ने कहा कि मेरा इरादा आंतरिक यात्रा का ही था।लेकिन पहले बहिर यात्रा से मार्ग समझ में आ जाए।।अति से कृपा जिस पर होती है वही इस मारग के मार्गी बन सकते हैं।। मानस के सात सोपान सात मार्ग है।।हम सब यहां बहिर यात्रा के लिए इकट्ठे हुए लेकिन आए हैं अंतर यात्रा के लिए।। बहिर यात्रा का रिकॉर्ड इतनी बड़ी उपलब्धि नहीं। मोरारी बापू बैरागी मार्गी बनकर भीतर की यात्रा में कितने संपन्न हुए वहीं उपलब्धि है।।मैं भी आपको निमंत्रित करता हूं अंतरयात्रा के लिए चले! हजारों किलोमीटर की यात्रा करके आखिर में हम अपने घर जाते हैं, हृदय हमारा घर है।।
सात सोपान रूपी सात मार्ग का थोड़ा मर्म समझ ले पहले सोपान पहला मार्ग है बालकांड का। बालक की तरह निर्दोष रहने की चेष्टा करें।।होशियारी, चतुराई नेटवर्क बहुत खेल करते हैं हम! जहां एक मिनट में पहुंच जा जा सकता है वहां पहुंचने में 100 साल निकल जाते हैं, उपलब्धि नहीं होती। क्योंकि हम आर पार नहीं होते।।
श्रीमद् भागवत में उद्धव भगवान से पूछते हैं कि बड़े-बड़े योगी योग यात्रा करते हैं लेकिन गिरने का, सफलता के अहंकार का डर लगता है। कोई सरल उपाय होगा? भगवान ने एकादश स्कंद में एक प्रकरण सूत्र कहा:तथाकथित पंडित और विद्वान के प्रमाण भी अनुमान सिद्ध हो जाते हैं।। लेकिन अंतर्यात्रीभजनानंदी का अनुमान भी प्रमाण हो जाता है।।
कागभुसुंडि के अनुमान प्रमाण सिद्ध हुए वह पंक्ति बापू ने गाकर सुनाई।।जो प्रत्येक का हित सोचेगा उसे कोई दुख होगा नहीं। दूसरे का निरंतर द्रोह करने वाला कभी निर्भय नहीं रह सकता।जोपूण्य कर्म करते हैं वह यश के भागीदार बन जाते हैं।
राम काल में बड़े यज्ञ होते थे आजकल राम कथा इसे भी बड़ा आयोजन होता है।।
युवाओं को बापू ने कहा कि आपकी झोली में रामचरितमानस और गीता रखो। विषम परिस्थिति में जिंदगी के मोड पर आपको बचाएगा, आपकी मदद करेगा।।
इर्षा निंदा द्वेष से छुटकारा पाने के लिए भागवत धर्म कहा है कृष्ण ने कहा है सब में मेरा भाव पैदा नहीं करेगा तब तक इर्षा निंदा और द्वेष जाएगा नहीं।। जिसे अंतर यात्रा करनी है उसे भागवत का पाठ करना चाहिए।।
युद्ध का परिणाम कभी शांति दायक नहीं होता। महाभारत साक्षी है। एक जोक घूम रही है अमेरिका में मुरारी बापू ने राम रावण का युद्ध करवाया तब ट्रंप कहते हैं मैं समाधान करवा दूंगा!
मानस का युद्ध तो नव निर्माण के लिए है। यश किसी को भी मिले शांति हो जाए वही अच्छी बात है।।
दूसरा सोपान अयोध्या कांड युवानी में थोड़ा संयम रखने को कहता है। तीसरे सोपान में मौन की महिमा है। मौन रहो।। मौन गुरु है और गुरु मौन है।। चौथा सोपान है सबके साथ मैत्री। पांचवासोपान भरोसा है। समस्या बाद में आती है समाधान पहले आ जाता है।।स्पर्धा और संघर्ष को टालने की विवेकपूर्ण कोशिश को छठा सोपान है और सातवासोपान है डकार, परम विश्राम, संतोष भाव।।
किसी ने पूछा था अंत काल होगा तब इष्ट,कुलदेवी गुरु किसे याद करना चाहिए ?बापू ने कहा एक भी याद नहीं रहेगा।। जो सहज आ जाए वह होने दो। मानस में 15 बार मारग शब्द दो बार मारगु और चार बार कुमारग शब्द आया है।। पथ हमेशा संकीर्ण होता है मार्ग आकाश जितना चौड़ा होता है जैसे सनातन मार्ग।। हमारे लिए मार्गी बैरागी साधु (बावा) शब्द है।। शिवजी गरुड़ को मार्ग में मिले लेकिन समाधान नहीं दिया क्योंकि अर्थ के मार्ग पर समाधान नहीं होता परमार्थ के मार्ग पर होता है।। मार्ग पूछने पर भारद्वाज ने शिष्यों को बुलाये। 50 शिष्य दौड़ आए। इनमें से चार को पसंद किया। यह 50 शिष्य मूर्ति मंत्र शास्त्र रहे। जिनमें चार वेद,छह शास्त्र, 18 पुराण, 10 स्मृति ग्रंथ,12 उपनिषद इनमें से चार वेद को पसंद किया।।
निरंतर राम भजन विधि है, राम को भूल जाना सबसे बड़ा निषेध है।।वेद के मार्ग पर राम निकले यमुना के तट पर भगवान ने चारों वेदों को विदाई कर दिया। यह कर्म की नदी है जहां विचार भी लौटा दिए।
इस वक्त एक तापस प्रवेश करता है। यह कौन है कहां से आया पूरी कथा मानस तापस पर हो चुकी है। कोई कहे हनुमान जी थे।कोई कहते कहते हैं तुलसीदास जी ने ध्यान अवस्था में लिखा है। कोई कहे पूरा प्रसंग क्षेपक है।। लेकिन गुरुमुखी अर्थ कहते हुए बापू ने कहा यह प्रेम था।। कर्म में प्रधान कर्म प्रेम है।।प्रेम सदैव तपस्वी होता है। प्रेम जैसा कोई तप नहीं। प्रेम एकत्व से भरा, तेजस्वी, तपस्वी सदा युवान,अवर्णनीय और बैरागी होता है।। हनुमंत वंदना के बाद राम के अवतार कार्य में जिन-जिन ने सहयोग किया वह सब की वंदना की। मां जानकी और प्रभु के चरणों की वंदना के बाद नाम महिमा का लंबा प्रकरण गाया गया।। राम नाम ओमकार स्वरूप वेदों का प्राण है। महामंत्र है। कलयुग में नाम के सिवा कोई चारा नहीं।। बरसात का पानी ऊपर से नीचे आता है कुएं का पानी नीचे से ऊपर जाता है लेकिन गांव में जो वीरड़ होता है वहां चारों ओर से पानी आता है। रामचरितमानस की रचना का इतिहास शिव ने रचा और तुलसीदास जी के पास कैसे आया वह कम बताते हुए बापू ने कहा कथा निज गुरु से सुनो।। पर गुरु से अन्य बातें सुनो और सर्व गुरु को प्रणाम करो।।
1631 की रामनवमी पर अवध में रामचरितमानस का प्रकाशन किया गया।।

