Homeगुजरातप्रीति ना बढ़ती हो,नाम में रस उत्पन्न ना होता हो रुचि ना...

प्रीति ना बढ़ती हो,नाम में रस उत्पन्न ना होता हो रुचि ना बढ़ती हो उसकी पीड़ा,कसक दर्द होना चाहिए।।

शंकराचार्य जी ने कहा दो पंख चाहिए:अत्यंत वैराग्य और बोध।।

वैराग्य हृदय का धर्म है बोध बुद्धि प्रज्ञा का धर्म है।। नव वस्तु धीरे-धीरे छूटे तो नाम में तीव्रतम निष्ठा होगी

श्रद्धा रूपी पार्वती से हम ऐसा मांगते हैं कि हमारे भीतर की शांति को कैसा राम चाहिए ?

जो सहज सुंदर हो सांवरा हो करुणा निधान सूजान सील और स्नेह जानता हो ऐसा चाहिए।।

खूबसूरत स्विट्जरलैंड के दाएस में प्रवाहित राम कथा के दूसरे दिन स्विट्जरलैंड के भारतीय राजदूत मृदुल कुमार जी अपने परिवार के साथ व्यास पीठ वंदना के लिए आए और अपने खुशियों के भाव भी रखें।।

आज बापू ने कहा कि बहुत सी जिज्ञासायें भी है किसी ने पूछा है:मंत्र के कई प्रकार है हमने कल नाम मंत्र से शुरू किया था,तो नाम में रुचि कैसे बढें?बापु ने कहा: प्रीति ना बढ़ती हो,नाम में रस उत्पन्न ना होता हो रुचि ना बढ़ती हो उसकी पीड़ा, कसक दर्द होना चाहिए।। मेरी नाम निष्ठा बलवत्तर क्यों नहीं हो रही?चैतन्य महाप्रभु ने कहा है तुम्हारा नाम को सुनते कब मेरी बानी गदगद होगी? कब आंख से अश्रु धारा बहेगी? यह पीड़ा व्यक्त की है।। आपको यह पीड़ा है यह अच्छी निशानी है।।आगाझ अच्छा है यदि इसी तरह गति रही तो अंजाम भी अच्छा होगा।। कोकिल शुक भी राम नाम बोलते हैं हम क्यों नहीं? यह पीड़ा है।। नाम के 10 अपराध से मुक्त होने के बाद नाम मंत्र में हमारी निष्ठा बढ़ती है ऐसा कहा है।।

उद्धव जब गोपियों के पास गया।ज्ञान लेकर गया था प्रेम लेकर लौटा।शब्द लेकर गया था स्नेह और अश्रु लेकर लौटा।। कृष्ण पूछते हैं व्रजांगनाओं ने कुछ कहा है? तब साफ-साफ कह देती है हमें कृष्ण नहीं चाहिए।। दो बात बताई: कृष्ण नहीं चाहिए, कृष्ण की कुशलता चाहिए और कृष्ण नहीं चाहिए कृष्ण नाम चाहिए।।

हमारी चित् वृत्ति निरंतर मुरारी में हो।।

शंकराचार्य से किसी ने पूछा परम के नाम में रुचि के लिए क्या करना? शंकराचार्य जी ने कहा दो पंख चाहिए:अत्यंत वैराग्य और बोध।। वैराग्य हृदय का धर्म है बोध बुद्धि प्रज्ञा का धर्म है।। नव वस्तु धीरे-धीरे छूटे तो नाम में तीव्रतम निष्ठा होगी:

एक-धनाश्रय छूटे। पुरा ना छूट दसवां हिस्सा भी छूटे 10 गाय हैं तो एक पर ही हमारा दूध का अधिकार है।।

दो-जड़ाश्रय छूटे- जड़ वस्तुओं का आश्रय अच्छे से अच्छे मकान में रहे लेकिन एक जमीन के टुकड़े के लिए लोग अदालत में जाते हैं।।एक चैतन्य में पूरा वृंदावन दिखता है।।

तीन जीवाश्रय छूटे- हम लोग किन-किन पर आधार रख कर बैठे हैं? पड़ोसी,मेरा शेठ, मेरा पति, मेरी पत्नी काम आएगी।जरूरी है फिर भी छूटना चाहिए थोड़ा डिस्टेंस जरूरी है।।नाम निष्ठा के बाद रूप लीला धाम में रुचि होगी।।

वैराग्य रूपवान नमणो, सुंदर मासूम हो।

चार कर्माश्रय छूटे-अती कर्म छोड़ो कर्म का फल छूटे।।

पांच-धर्माश्रय भी छूटे- सर्वधर्म परी तज्यं।। ऐश्वर्य कीर्ति और सुगती चाहिए उसे धर्म की जरूरत है।। लेकिन मुझे नहीं।।

छे- ज्ञानाश्रय छूटे- जानकारी बहुत बड़ा बंधन है।। सात-स्वबलआश्रय-अपने बल का आश्रय छूट जाए विधि विधान भी छूट जाए।।

आठ देवाश्रय छूटे- देवताओं का आश्रय छूट इसमें देवताओं का अपमान नहीं।।

नव-अन्याश्रय छूटे।। कई महापुरुषों के नाम निष्ठा के कारण यह सब छूट गया है।।

श्रद्धा रूपी पार्वती से हम ऐसा मांगते हैं कि हमारे भीतर की शांति को कैसा राम चाहिए ?जो सहज सुंदर हो सांवरा हो करुणा निधान सूजान सील और स्नेह जानता हो ऐसा चाहिए।।

किसी भी परिस्थिति आए यह एक पंक्ति जेब में रखो:

हरि इच्छा भाविबलवाना।

हृदय बिचारसंभु सुजाना।।

तीन वस्तु नहीं करना:भगवत अपराध, साधु भक्तों का अपराध और भक्ति का अपराध न करना।।

नाम वंदना प्रकरण में पूरा नाम चरित मानस है।। तुलसी जी ने कर्म को क्रम लिखा ऐसे लगता है बहुत बड़ा साहित्य अपराध लेकिन तुलसी जी ने जानबूझकर ऐसा किया है क्योंकि इतने परम विद्वान है वह किसी को मालूम ना हो जाए।।

फिर रामायण का आध्यात्मिक इतिहास,कथा शंकर के मानस से उतरी सूकर खेत होती तुलसी जी के पास आॉटइ और रामनवमी १६३१ में प्रकाशन अयोध्या में हुआ।।

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