
सनातन धर्म मूल है,उनकी आड में पांच अधर्म आते है।।
इतिहास बतायेगा कौन सनातन की सेवा करते हैं।।
कृष्ण स्वयं सनातन धर्म है।।
आज मौलिक सर्जकों की जरूरत है।।
व्यास पीठ तक वही बात पहुंचेगी जो अंदर से उठी हो।।
गुरु का पूजन होना चाहिए,गुरु के वचन का सेवन होना चाहिए।।
मंगलवार शाम से मोरारिबापु की त्रिभुवनीय व्यासपीठ से इन बीज पंक्तियों का गायन करते हुए कर्णाटक की धरती पर १६ वीं और कथाक्रम की ९८३ वीं रामकथा का मंगल आरंभ-तेरहवीं सदी में द्वेत दर्शन के प्रणेता आचार्य माधवाचार्य जी द्वारा स्थापित सुप्रसिध्ध श्री कृष्ण मठ और मंदिर की पावन धरा पर हुआ।।
इस कथा के मनोरथी अति विनम्र,मीतभाषी,सरल स्वभाव के कथा रसिक श्रोता प्रविणभाइ तन्ना परिवार है।।
कथा आरंभ में तन्ना परिवार की बेटी ने सब का स्वागत अभिवादन किया,लिटल वंडर बॉय ने भी व्यास पीठ को नमन करते हुए सब को जय सियाराम कहा और पवित्र वेद ञुचाओं का गान और यहां के आचार्य संतो के हाथों दीप प्रागट्य हुआ।।
जब जदुबंस कृष्न अवतारा।
होइहि हरन महा महिभारा।।
-बालकॉंड-८७
कृष्न तनय होइहि पति तोरा।
बचनु अन्यथा होइ न मोरा।।
-बालकॉंड-८७/१
रति गवनी सुनी संकर बानी।
कथा अपर अब कहउं बखानी।।
-बालकॉंड-८७/२
इन बीज पंक्तियों का गायन करते हुए परमात्मा पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण की कृपा से कृष्ण धाम उडुपी में राम कथा का आरंभ करते हुए बापू ने पवित्र तीर्थ भूमि सभी देवताओं को प्रणाम किया। और इस कथा विषय के बारे में बताया की परम तत्व को केंद्र में रखकर सावन मास,कृष्ण भूमि में संवाद है।जो कृष्ण का स्वरूप विराजमान है उनका संबंध द्वारिकाधिश से है।शिव का महीना है,तीन दिन के बाद कृष्ण प्रागट्य जन्माष्टमी भी आ रही है तो मानस कृष्णावतार पर कुछ संवाद रखेंगे।
भगवान कृष्ण के लिए यह पंक्तियां भगवान शंकर स्वयं बोले हैं।केंद्र में भगवान श्री कृष्ण है और भवानी के सामने यह बात पेश करते हुए यह पंक्तियां बालकांड से ली गई है।।
कथा की भूमिका को स्पष्ट करते हुए बापु ने बताया भगवान शिव ने कामदेव का दहन किया।कामदेव की पत्नी रति रोती,चीखती,चिल्लाती हुई शिवजी के पास आती है।आक्रंद करती हुइ कहती है तब भगवान शिव वरदान देते हुए,करुणावतार सदा शिव भगवान शिव अबला का रुदन सुनकर कहते हैं तेरे पति का नाम अनंग होगा।बिना शरीर वह सब को व्यापेगा।तेरे पास अनंग रूप से रहेगा।
रति ने कहा बिना शरीर पति सबको व्यापे,ठीक है।मगर मुझे शरीर धारी पति चाहिए।आपने मनोज कर दिया! मुझे शरीर से कब मिलेगा? तब करुणा मूर्ति शिव बोले:द्वापर युग में यदुवंश में भगवान कृष्ण का अवतार होगा।।वह पृथ्वी का महाभार मिटाएंगे। समाज में व्याप्त दुष्कृतिओं को मीटा कर धर्म का स्थापना करेंगे।किस धर्म का स्थापना करेंगे?बापु ने कहा एक ही शब्द मुझे मिलता है:सनातन धर्म का स्थापन।।
श्रीमद् भागवत जी का अंतर दर्शन करें तो मिलता है यह मूल धर्म है।।जिनका आदि पकड़ना कठिन है। जिनके नीचे पांच प्रकार के अधर्म है।एक-विधर्म।दो-पर धर्म।तीन-उपमा धर्म।चार-आभासी छग्य धर्म पांच-छल धर्म।।
पृथ्वी को सबसे बड़ा बोझ धर्म के नाम से पांच प्रकार की बीमारियों का होता है।जब भगवान श्री कृष्ण गीता के अंतिम अध्याय में अर्जुन को स्पष्ट कहते हैं सर्वधर्म छोड़कर मेरे पास आओ।।वहां यह पांच धर्म की बात है।अर्जुन ने पूछा होगा आप कौन से धर्म है?कृष्ण ने कहा:मैं सनातन धर्म हूं।।यह मेरे शब्द नहीं अर्जुन ने कहा है:आप सनातन है।।
आज देश में और दुनिया में कई लोग हम कथा कारों की आलोचना करते हुए कहते हैं कि बड़े कथाकार सनातन धर्म की सेवा नहीं कर रहे,हम कर रहे हैं!लेकिन इतिहास बतायेगा कौन सनातन की सेवा करते हैं।।
मैं आपकी और यह ग्रंथ की कृपा से पूरी दुनिया घूम चुका हूं और आप कथा रसिकों को यह बात कहता हूं यह पांच बातें छोड़ दो।।कृष्ण स्वयं सनातन धर्म है क्या स्थिति होगी जगत की तब कहना पड़ा मेरी शरण में आ जाओ! मूल धर्म को ग्लानि हुई होगी तब कहा है: भारत! यह पांच धर्म को मीटा कर में खुद आता हूं।।साधु का परित्राण करने आता हूं। दुष्कृतियों का विनाश करके आता हूं।।
प्रतिनिधि के रूप में नहीं,खुद आऊंगा।कोई धर्म अपने बेटे को,कोई संदेश वाहक को,कोई आचार्य को भेजता है।।यहां विद्वानों,पंडितों,महापुरुषों के लिए नहीं केवल ‘साधु’ शब्द कहा है।।
आज साधु शब्द को केंद्र में रखकर कइं विचारकों बहुत लिख रहे हैं।लेकिन एक खतरा भी है:लोग ए.आइ.से पूछ कर कविता निकाल रहे हैं! ए.आइ.को साधु का क्या अनुभव?अखबारों में बड़े-बड़े लेख भी ए.आई. से पूछ कर आते हैं! तुम्हारा मौलिक क्या?आज मौलिक सर्जकों की जरूरत है।व्यास पीठ तक वही बात पहुंचेगी जो अंदर से उठी हो।।व्सास जी ने कृष्ण की हकीकत पेश की है।।जिनका वचन कभी अन्यथा ना हो, समझना कि इनमें विशेष रूप में शिव तत्व है।।
गुरु का पूजन होना चाहिए,गुरु के वचन का सेवन होना चाहिए।।साधु का पूजन,साधुता का सेवन होना चाहिए।।वक्ता का पूजन हो,वक्तव्य का सेवन होना चाहिए।।गाय का पूजन होना चाहिए,पंचगव्य का सेवन होना चाहिए।।राजा का पूजन,प्रजा का सेवन होना चाहिए।।वैद का पूजन,लेकिन औषधि का सेवन होना चाहिए।।
भगवान श्री कृष्ण पूर्ण,संपूर्ण,परिपूर्ण है।। इस नाते जन्म भी पूर्ण।बाल्यावस्था भी पूर्ण।कुमारवस्था पूर्ण लीला पूर्ण।मथुरा में रहना पूर्ण।मथुरा से भागना भी पूर्ण।द्वारिका भी पूर्ण।हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र में पूर्ण और आखिर में प्राची के वह पीपल के नीचे भी वह पूर्ण है।।
बालकांड नयन शुद्धि की बात करता है।फिर ग्रंथ परिचय और मानस का परिचय करवाते हुए सात कांड और वंदना प्रकरण में सद्गुरु की वंदना करते हुए पंचदेवों का पूजन और आखिर में हनुमंत वंदना का गान करते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।
उडुपी से जूडा एक रोचक इतिहास
इस कथा नगरी उडुपी और उडुपी के महाराजा के साथ जुड़ी हुई चमत्कारिक और अत्यंत रसिक कथा जो महाभारत के काल से जुड़ी है।जब महाभारत का युद्ध हुआ और युध्ध के मैदान में १८ अक्षोणिनी सेना एकत्रित हुई तब भोजन का क्या प्रबंध होगा? यह कथा हमें अचंबित कर देने वाली है।
महाभारत का युद्ध शुरू हुआ तब भारत के खंड के विद्विद राजा भाग लेने के लिए आए थे।कोई संबंध के कारण,कोई मजबूरी के कारण,कोई यह महायुद्ध की साक्षी बनने के हेतु,कोई किसी राजकीय कारण। किसी भी कारण वश भारतवर्ष में शायद ही ऐसा कोई राज्य होगा जो यह युद्ध में शामिल नहीं हुआ है।इसीलिए इतनी बड़ी सेना बनी है।कहते हैं इस युद्ध में दो व्यक्ति शामिल नहीं हुए थे:एक थे बलराम और दूसरा था रुकमि। लेकिन यह माहिती अधूरी है।और भी दो लोग थे जो इस युद्ध में सम्मिलित नहीं हुए थे ।एक था महावीर बर्बरीक और दूसरे थे उड्डुपी के राजा।
आज हम इस बात करेंगे उड्डूपी के राजा युद्ध में शामिल होने के लिए कुरुक्षेत्र पहुंचे तब पांडव और कौरव दोनों अपनी सेना में इस महान राजा को शामिल करने के लिए प्रयत्नशील हुए और फिर उड्डूपी के राजा ने भगवान कृष्ण की तरफ नजर की और संवाद करते हुए पूछा है द्वारिका नरेश! मुझे एक प्रश्न हो रहा है इतनी बड़ी मात्रा में जमा हुई इस विराट सेना के लिए भोजन की व्यवस्था कैसे होगी?कृष्ण ने कहा कि आप यह प्रश्न कर रहे हैं तो नक्की आपके पास भी कोई योजना होगी।आप बताइए।।तब उड्डूपी के राजा ने कहा:हे वासुदेव! दो भाइयों के बीच यह युद्ध हो रहा है और अब युद्ध अनिवार्य है।मैं किसी भी की ओर से भाग लेने नहीं चाहता।लेकिन यहां उपस्थित समग्र सेना के भोजन का प्रबंध करने के लिए उत्सुक हुं।। यहां १८ अक्षौणिनी यानि की ५० लाख से भी ज्यादा लोग युद्ध में शामिल है।सागर जैसी इतनी सेना के भोजन का प्रबंध भीमसेन भी-युद्ध में शामिल होंगे तो-नहीं कर पाएंगे।
इसीलिए राजा ने पूरा प्रबंध किया और कुशलता यह थी कि समग्र सेना भोजन करने के बाद एक भी दाना बर्बाद भी नहीं हुआ और कोई बाकी भी नहीं रहा!रोज दोनों और से हजारों योद्धा शहीद होते रहे फिर भी खाने वालों की संख्या निश्चित नहीं होते हुए भी उड्डूपी के राजवी ने इतनी कुशलता से व्यवस्था की,की कोई सैनिक भोजन के बगैर नहीं रहता और भोजन के बाद एक भी दाना नहीं बचता!! सबके लिए यह आश्चर्य की बात थी।राजा इतनी सचोट गिनती किस प्रकार कर रहे हैं।और मालूम भी कैसे होगा कि आज कितने लोग मारे जाएंगे?
युद्ध समाप्त होने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने राज्याभिषेक के दिन उड्डूपी नरेश से यह प्रश्न किया कि आपने इतनी बड़ी मात्रा में व्यवस्था की लेकिन एक रहस्य बताइए आप यह हर रोज कैसे कर रहे थे?तब उडुपी नरेश ने कहा की कृष्ण के सिवा और कौन यह कर सकता है!देवकीनंदन रोज रात्रि को मूंगफली खाते थे और मैं उनके शिविर में गीन गीन के मैं मूंगफली रखता था।।मूंगफली खाने के बाद जितनी बाकी रहती थी मैं गिन लेता था। पर कृष्णा जितनी मूंगफली खाता उनसे १००० गुना सैनिक दूसरे दिन युद्ध में मृत्यु होते थे।।अर्थात वह २० मूंगफली खाये तो दूसरे दिन २०,००० सैनिक वीरगति को प्राप्त होते थे।।इस आधार पर में भोजन की व्यवस्था करता था।।सब नतमस्तक हो गए और राजा और कृष्ण के व्यक्तित्व की प्रशंसा करने लगे।
== समाप्त ==

