
ओशो ने भी स्वांत:सुखाय पर अपने भाव व्यक्त किए हैं।।
रामनाम पर ओशो के पुस्तक ही नहीं मस्तक भी है।।
मेरा तो मूल रामकथा है।।
“राम के हाथ में शस्त्र जितनी शोभा देता है उतना किसी और के हाथ में नहीं देता”:ओशो।।
ओशो को सहज होकर ही समझा जाएगा।।
वर्तमान विश्व के प्रबुध्ध दार्शनिक एवं फिलोसोफर,क्रांतिकारी बुध्धपुरुष,वव सन्यास के प्रणेता और प्रखर वक्ता ओशो की कर्मभूमि जबलपुर से मोरारिबापु की रामकथा का शुभारंभ हुआ।।
आरंभ मे रामकथा समिति के द्वारा स्वामी एकांन स्वामी विश्रुल जी अग्येय भारती जी द्वारा दीप प्रागट्य हुआ और ओशो की छोटी बहन मानीषा जी ने स्वागत भाव रखते हुए बताया कि 59 वर्षों में 20 बरस ओशो जबलपुर में रहे यह भूमि कर्मभूमि और तपोभूमि बनी रही और ओशो ने सात किताबों के नाम राम पर रखे हैं।।
मोरारी बापू का स्वागत और सम्मान किया गया।।
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्वाणप्रद सम आन को।
जाकी कृपा लवलेश ते मतिमंद तुलसी दास हूं।
पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नही कहूं
अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान राम और हनुमान जी की असीम कृपा से स्वांत: सुखाय कथा का मंगल आरंभ हो रहा है तब ओशो की परम चेतना को प्रणाम करते हुए सन्यासी,प्रेमियों और साधकों को प्रणाम किया।।
बापू ने कहा कि जागृति,जागरण,बुद्धत्व की यह भूमि के प्रकाश संबोधि प्राप्त हुई उसी भूमि पर राम की मर्यादा,विवेक,संयम,मधुर वाणी,विनम्र विवेक, वैराग्य,शील,समर्पण,सबको स्विकार करने का स्वभाव-यह सब का गान करने आए हैं।।
मेरा तो मूल रामकथा है।।
ओशो ने भी स्वांत: सुखाय पर अपने भाव व्यक्त किए हैं।रामनाम पर ओशो के पुस्तक ही नहीं मस्तक भी है।।चिंतन है।यकीन करीयेगा राम बहुत सुंदर है। राम की सुंदरता जिसने प्राप्त नहीं कि उसने कुछ नहीं पाया।। राम के हाथ में शस्त्र जितनी शोभा देता है उतना किसी और के हाथ में नहीं देता ऐसा ओशो ने कहा है।।
इस कथा के मेरे यजमान ओशो है।।
कुछ धारा जिसे संबोधि कहते हैं। कुछ धारा निर्वाण कहती है।। शंकराचार्य जीसे मोक्ष कहते हैं। संत परंपरा में कबीर साहब पूरा पाया, वही मुक्ति,परम गति,परम जागरण,वही अवस्था जिसे तुलसीदास परम विश्राम कहते हैं।।इसलिए यह कथा मानस परम विश्राम पर गाएंगे जो संबोधि का पर्याय है।
कबीरा कुआं एक है,पनिहारी अनेक।
बर्तन सब न्यारे भये, पानी सब में एक।।
में ओशो का कंधा पकड़ कर मुझे कहना है वह राम की मर्यादा को बरकरार रखते हुए कहूंगा।
ओशो को सहज होकर ही समझा जाएगा।।
आचार्य थे तब श्रम है।भगवान हुए विगत श्रम हुए। झोरोब्धि बुद्ध बने तब विश्राम हुआ बुद्धत्व प्राप्त हुआ तो परम विश्राम हुआ।।
रामचरितमानस में रजनीश शब्द कहां है वह भी बापू ने बताया।। उत्तरकॉंड के समापन में जो छंद लिखा है इस पंक्ति को उठाई है।।
बापू ने कहा कि प्रथम दिन की कथा श्रवण, दूसरा दिन कीर्तन,तीसरे दिन की कथा स्मरण है। चौथे दिन की कथा पाद सेवन,पांचवें दिन की कथा अर्चनं, छठे दिन वंदन,सातवें दिन दास्य- शरणागति आठवां दिन सख्य मैत्री और नौवां दिन आत्म निवेदन परम विश्राम है।।
फिर कथा का महत्व बताते हुए सात कांड सात मंत्र सब की वंदना और गुरु वंदना के बाद हनुमंत वंदना पर आज की कथा को विराम दिया गया।।
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