Homeगुजरातलक्ष्मीपति बालाजी तिरुपति से ९६९वीं रामकथा का मंगलगान शुरु हुआ

लक्ष्मीपति बालाजी तिरुपति से ९६९वीं रामकथा का मंगलगान शुरु हुआ

यहां तीन पति-श्रीपति,रमापति और भूपति से हम जुड़े रहेंगे।।

अतिसय गंभीर रहना बीमारी है।।

पहली सांस और आखिरी सांस के बीच में विश्वास रखो।।

हर कथा हमारे लिए उत्सव है।।

जहां सत्य होगा वहां अभय होगा,जहां प्रेम होगा वहां त्याग होगा और जहां करुणा होगी वहां अहिंसा होगी।।

प्रभु से प्रेम सज्जन से मैत्री,नादान और द्वेष करने वालों से उपेक्षा करें ऐसा करने से हमें आठों प्रहर आनंद मिलेगा।।

 

लोर्ड व्यंकटेश तिरुपति बालाजी के पर्यावरण,तिरुमलाम्युझीयम के सामने से ९६९ वीं रामकथा का मनोरम आरंभ हुआ।।

ये रामकथा के मुख्य मनोरथीप्रविणभाइ तन्ना परिवार है।। कथा के आरंभ में दीप प्रागट्य और पूरा पुरोहितों के द्वारा वेद ऋचाओं का गायन और गुरु जी ने अपना शब्द भाव व्यक्त किया फिर बापू ने यह पंक्तियां का गायन करते हुए:

श्रीपति नीज माया तब प्रेरी।

सुनहु कठिन करनी तेहिकेरी।।

राम रमापति तर धनु लेहू।

खैंचहूंमिटै मोर संदेहू।।

-बालकॉंड

भूमि सप्त सागर मेखला।

एक भूप रघुपति कोसला।।

-उत्तरकॉंड

भगवान वेंकटेश प्रभु की कृपा से,परम पवित्र देवस्थानों में रामकथा का शुभारंभ जब हो रहा है यहां के मठ, देवस्थानों में विराजित देव स्वरूपों और पद्मावती जी के चरणों में प्रणाम करते हुए बापू ने कहा कि बहुत सालों के बाद हम यहां आए हैं।। 1981 में आखिर में यहां कथा लेकर आए थे। वेंकटेश भगवान अतःचक्षु से हमें देखते हैं।

कथा की भूमिका के बारे में बताते हुए कहा कि यह मानस त्रिपति के नाम से हम कथा करेंगे।। जहां एक है-श्रीपति।दूसरेरमापति और तीसरे है-भूपति और यह तिरुपति बालाजी के संपर्क से हम जुड़े रहेंगे।।

रामचरितमानस में वैसे बहुत पतियों की बात की गई है लेकिन प्रधान रूप में तीन पति के बारे में कहा है यहां तीन पंक्तियों उठाई है।।एक पंक्ति जो बालकांड से ली है।वहां श्रीपति शब्द है। जब नारद जी ने भगवान से रूप की मांग की वह प्रसंग और परमात्मा ने नारद का परम हित सोचा था।।

बापू ने कहा अतिसय गंभीर रहना बीमारी है।।पहले सांस और आखिरी सांस के बीच में विश्वास रखो।। यह भी कहा और दूसरी पंक्ति जहां परशुराम भगवान राम के प्रभाव को जान गए और वहां रमापतिशब्द का उल्लेख किया गया है।।औरउत्तरकॉंड में राम राज्याभिषेक की स्थापना हुई तब परमात्मा को भूपति के बारे में तुलसीदास जी ने लिखा है।।वहउत्तरकॉंड से तीसरी पंक्ति उठाई गई है।।

यहां इन दिनों में तिरुपति में ब्रह्मोत्सव शुरू होता है बापू ने कहा कि हर कथा हमारे लिए उत्सव है।। लेकिन बालकांड जन्मोत्सव है।।और अयोध्या कांड प्रेमोत्सवहै।।अरण्य कांड वनोत्सव है।। किष्किंधा कांड मित्रोत्सव है।। सुंदरकांडशरणोत्सवहै।लंका कांड रणोत्सव है और उत्तरकॉंडपरमोत्सव है।। उत्सव शब्द में उत्स का अर्थ है जल,पानी का स्थान जहां जल होता है वहां उत्सव होता है।। जल राशि हो सरोवर हो या आंखों में जल हो ।जहां भी जल है वहां उत्सव है।।

बापू ने कहा कि जहां सत्य होगा वहां अभय होगा। जहां प्रेम होगा वहां त्याग होगा।और जहां करुणा होगी वहां अहिंसा होगी ऐसा में कहता रहता हूं।। प्रभु से प्रेम करें सजन से मैत्री करें नादान और द्वेष करने वालों से उपेक्षा करें ऐसा करने से हमें आठों प्रहर आनंद मिलेगा।।

फिर रामचरितमानस का मंगलाचरण और ग्रंथ महत्व के बारे में कहते हुए सात सोपनों की सीढी और सात सोपान में पहला सोपानबालकांडबालकांड के सात मंत्रो में वंदना प्रकरण में विविध रूपों की वंदना। गुरु वंदना और आखिर में हनुमंत वंदना तक की कथा का गान करके आज की कथा को विराम दिया गया।।

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