“वाल्मीकि जी के कहने पर तलगाजरडा का राम यहां निवास करने आया है।।”
शौक,मोह और भ्रम का सत्संग या हरिनाम से ही नाश होगा।।
जहां सबको आश्रय मिले,आराम मिले,आहार मिले, आगम मिले,आनंद मिले,आवकार मिले,आश्वासन मिले-वह आश्रम है।।
चौथी अवस्था में भवन में रहने से वैराग्य नहीं आता,वन में रहने से आता है।।
भवन में राग होता है।।
बीज पंक्तियां:
देखत बन सर सैल सुहाए।
बालमीकि आश्रम प्रभु आये।।
राम दिख मुनिबासु सुहावा।
सुंदर गिरि काननु जलु पावा।।
बालमीकि मन आनंदु भारी।
मंगल मूरति नयन निहारी।।
-अयोध्या कॉंड
इन बीज पंक्तियों के गान के साथ शनिवार शाम अधिक मास की अष्टमी पर महाराष्ट्र के लातूर जिल्ले के किल्लारी में दूसरी बार और क्रम में ९७८वीं रामकथा का मोरारी बापू द्वारा आरंभ हुआ।।
जब १९९३ में भूकंप पर लातुर और पूरे जिल्ला का टूटा मनोबल बापू ने वाणी से संभाला।।
महाराष्ट्र और लातुर पर बापू की सदा अनुकंपा रही है।
कथा आरंभ पर दीप प्रागट्य के बाद यहां के विधायक अभिमन्यु पवार द्वारा स्वागत अभिवादन हुआ और कथा के मनोरथी ईश्वर प्रकाश डागा और ओमप्रकाश डागा परिवार की ओर से ईश्वर जी ने अपना स्वागत भाव रखा।और डागा परिवार की युवा कुमारी देविका मर्दा ने कृतज्ञता का भाव व्यक्त किया साथ ही मनोरथी परिवार के द्वारा तुलसी का पौधा व्यास पीठ को अर्पण किया गया।।
ये कथा विशिष्ट युं है की लातुर में जब भूकंप आया था तब बापु की कथा ने ये भूमि को संवारा था।।तलगाजरडा में बापु सेवित राम,लखन जानकी जी की खडी़ मूर्तियां थी वो बापु के द्वारा किल्लारी राम मंदिर को अर्पित की गइ थी।।
फिर आज की बैठी मूर्तियां तलगाजरडा में स्थापित हूइ।।
बापु का पारिवारिक रिश्ता भी लातूर से जूडा़ हुआ है।।
३३ साल बाद बापु फिर यहां पधार रहे है।।
बापू ने बताया कि रामकथा का अनुष्ठान किल्लारी की अर्पण और तर्पण की भूमि पर होने जा रहा है। कुछ साल पहले यहां दुर्घटना घटी।बहुत लोगों ने अपने प्राण अर्पण कर दिए और तर्पण के लिए कथा हुई।
मनोरथी परिवार अपने माता-पिता के पुण्य और संस्कार के कारण निमित्त बने,यह कथा सब की है। बापू ने बताया कि किल्लारी से मेरा आत्मीय नाता रहा।जब घटना घटी थी में आया २५ साल पहले जो चेतनाएं दिवंगत हुई थी उनके तर्पण के लिए कथा हुई वह कथा ‘मानस वाल्मीकि’ नाम से थी वैसे वाल्मीकि पर दो-तीन कथाएं हो चुकी है।।
जीस तीर्थ में तलगाजरडा के ठाकुर राम लक्ष्मण जानकी और हनुमान जी विराजमान है वह स्थान को वाल्मीकि आश्रम नाम दिया गया है।।
कथा की भूमिका रचते हुए बापू ने कहा कि इस कथा का नाम ‘मानस वाल्मीकि आश्रम’ के रूप में गाएंगे।
भगवान राम ने वाल्मीकि जी से पूछा हमें कहां निवास करना चाहिए, स्थान दिखाएं।तब अयोध्या कांड के इस प्रसंग में वाल्मीकि जी ने १४ स्थान दिखाएं।।रामायण के संत लोग उसे १४ प्रकार की भक्ति भी बताते थे।।
राम जी को चित्रकूट बताया था लेकिन संकेत था कि चित्रकूट में सीता जी के साथ रहते हैं लेकिन कभी जानकी जी दोबारा वन में आएगी तब गर्भित संकेत था की जानकी जी यहां रहेगी।।
भूकंप के समय जो स्थिति थी लेकिन वाल्मीकि जी की कृपा से पुनः सब को नया स्थान प्राप्त हुआ।। वाल्मीकि जी के कहने पर तलगाजरडा का राम यहां निवास करने आया है।।
आश्रम की परिभाषा बहुत मिलती है।।लेकिन व्यास पीठने आश्रम की विषद व्याख्या बहुत बार की है गुजरात के बड़ौदा के पास गोरज में मुनि आश्रम में कथा गान किया था तब आश्रम की विशाल परिभाषा कही थी।
जहां सबको आश्रय मिले,आराम मिले,आहार मिले, आगम मिले,आनंद मिले,आवकार मिले,आश्वासन मिले-वह आश्रम है।।यहां भी यह सब होगा।
गीता जी ने कहा है जहां पांच वस्तु ना हो वह अनुष्ठान नहीं है:विधि ना हो। यहां विधि यही है कि किसी का निषेध नहीं है।जहां अन्न भोजन न हो।मंत्र ना हो।मंत्र विचार की समाज को बहुत जरूरत है। जहां दक्षिणा ना हो।ज्ञान उपदेश दक्षिणा है और श्रद्धा ना हो वह यज्ञ तामस यज्ञ है।।
महाराष्ट्र की भूमि संतों की भूमि है।छत्रपति शिवाजी महाराज की भूमि है।।
बीज पंक्तियों के अनुसार राम लक्ष्मण जानकी ने पवन सरोवर जल और पर्वत देखें।यह तीन वस्तु आध्यात्मिक सांकेतिक भाषा में बताइ। वन का अर्थ है वैराग्य।। चौथी अवस्था में भवन में रहने से वैराग्य नहीं आता,वन में रहने से आता है।।भवन में राग होता है।।लेकिन बैराग्य शुष्क नहीं होता। जल तत्व भक्ति रसिकता का प्रतीक है और सैल पर्वत ज्ञान की ऊंचाई का प्रतीक है।।
वाल्मीकि जी आनंद से भर गए।।
यह मूर्तियां अभी कितनी सुहावन है दो बार तलगाजरडा को मूर्ति का दान करना पड़ा। बहुत पौराणिक मूर्ति हमारे गुजरात के राजुला के पास बांगर गांव में दी।।फिर यह मूर्ति स्थापित हुई और किल्लारी अर्पण-तर्पण की भूमि है यहां भरी आंखों से यह मूर्ति का भी हमने दान किया था।।
शौक,मोह और भ्रम का सत्संग या हरिनाम से ही नाश होगा।।और किसी से नहीं होगा।। शोक भूतकाल,मोह वर्तमान काल और भ्रम भविष्य काल को दिखाता है।।
साधु सप्तक के सात-सा के बारे में बात कर के ग्रंथ महत्यान बताते हुए रामचरितमानस के सात सोपान पहले सोपान के सात मंत्र और फिर सोरठा और चौपाइयों में पंचदेवों की वंदना,विधिविध प्रकार की वंदनाओं का गान करते हुए तुलसी जी ने लोक बोली में गुरु वंदना का गायन हुआ और फिर हनुमंत वंदना का गायन करते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

