
कथा दुर्लभ है इसलिए महान है,लेकिन पहचान लिया जाए तो अमोघ है।।
कथा के आदि,मध्य और अंत में परम तत्व की स्थापना होनी चाहिए।।
यदि पूरे मिट जाओ,खो जाओ तो व्यास पीठ आपको खोजती है।।
गंगा जी पाप धोती है,चंद्रमा ताप हरण करता है, कल्पतरु गरीबी मिटाता है,लेकिन साधू संग,साधु का समागम पाप-ताप और संताप तीनों को खत्म करता है।।
गलत संग करने से शरीर के रसायन,मन और वाणी भी बदल जाती है।।
आदमी कितने ही करोड़ में बिक जाए लेकिन उसकी कीमत दो कौड़ी की हो जाती है क्योंकि वह बिक गया है!
महाराष्ट्र के लातुर के पास अर्पण और तर्पण की भूमि किल्लारी में चल रही रामकथा के दूसरे दिन
श्रोताओं द्वारा पूछी गई कुछ बातों से शुरू करते हुए बापू ने बताया रामकथा बहुत रहस्य पूर्ण है जो हमने कहा था।तो पूछा गया है कि हम ज्यादा कृष्ण कथा कहते हैं।तो शिव कथा,देवी भागवत,रामकथा,कृष्ण कथा इनमें कौन कथा श्रेष्ठ है?
बापू ने बताया को बड छोट कहत अपराधु… लेकिन परमात्मा को केंद्र में रखकर कोई भी कथा श्रेष्ठ है। जहां आदि मध्य और अंत में परमात्मा होना चाहिए मैं रामकथा गाता हूं तो उसकी गरिमा होगी।लेकिन विश्वामित्र सांकेतिक भाषा में कहते हैं रघुनाथ का चरित्र सतकोटी विस्तरित है।जिसका एक-एक अक्षर महापातक का नाश करने वाला है।तुलसी जी कहते हैं रामकथा महामंत्र है।जो आश्रय करता है उनके कठिन से कठिन भाल के लेख मिटा देती है।। वाल्मीकि जी भी अपनी और से कहते हैं और आदि अनादि सर्जक भगवान शिव है तो वही दावा करते हैं कि रामकथा महिमावंत है।।
शिव,वाल्मीकि,विश्वामित्र,वशिष्ठ कहे लेकिन महाराष्ट्र के समर्थ स्वामी रामदास जी कहते हैं गणपति की कथा श्रेष्ठ है।कार्तिकेय की,शंकर की सूर्य की कथा श्रेष्ठ है।लेकिन सभी के मध्य में राघव की कथा श्रेष्ठ है।यह सब के बीच में श्रेष्ठ कथा राम की है।
एक तो कथा दुर्लभ है इसलिए महान है,लेकिन पहचान लिया जाए तो अमोघ है।।
मेरी ओर से इतना ही कहना है कथा के आदि,मध्य और अंत में परम तत्व की स्थापना होनी चाहिए।। मानस में वाल्मीकि शब्द सात बार आया है वह स्वाध्याय भी बापू ने कहा और यह भी बताया की आरती में भी एक बार जोड़कर आठ बार यह शब्द मिलता है।।
जहां पादुका होती है वहां बुद्धपुरुष को आना पड़ता है इतना ही नहीं बुद्धपुरुष वहां होता ही है।हमारे पास मेरे दादा की पादुका है लेकिन मुझे कभी नहीं लगा कि वह नहीं है।
अत्यंत नाम स्मरण जिसका बढ़ता है उनके भाल की,हाथ की,चरण की रेखा वह खुद पढेगा।।
नारद,कुंभज और वाल्मीकि जी ने अपना चरित्र खुद कहा है।ज्योतिष तो किसी और का आगम बताते हैं यदि पूरे मिट जाओ,खो जाओ तो व्यास पीठ आपको खोजती है।।मंगल मूर्ति शब्द एक बार और सुमंगल मूर्ति भी एक बार मिलता है।।
फिर वाल्मीकि कौन है उनके खुद से मुख से कहा है वो वाल्मीकि का थोड़ा चरित्र कहते हुए बापू ने कहा कि मूल नाम रत्नाकर।।लेकिन संग बिगड़ा लुटेरों की टोली में शामिल हो गए।खान-पान भी बिगड़ गया और यहां तक कि जब एक की हत्या करें तो एक कंकर कुंभ में डालें ऐसी सात कुंभ कंकड़ों से भरे थे! इतनी हत्याएं हुई।।दस्युओं के साथ रहने से नाम रत्नाकर दस्यु,लुटेरा,डाकू हो गया।।
गलत संग करने से शरीर के रसायन,मन और वाणी भी बदल जाती है।।प्रचेता का रत्नाकर दस्यु बन गया।
एक बार महर्षि नारद देवलोक से वीणा वादन करते हुए पृथ्वी लोक पर आए।। रत्नाकर बाहर निकले, स्वभाव उग्र है लेकिन नारद के हरिनाम ने उसे खींचा जैसे अंगुली मार और बुद्ध की कथा है।।महाराज! कौन है आप?नारद ने कहा मुझे लोग नारद कहते हैं निवास कहां है?मेरा कोई निवास नहीं है।पूछा गया आपने मेरा नाम सुना है?नारद ने कहा मुझे नारायण का नाम मिल गया फिर और नाम से क्या काम!रत्नाकरने पूछा हाथ में क्या है?विणा है। जेब में क्या है?नारद ने कहा जब ही नहीं है।वैसे कुछ नहीं लेकिन सब कुछ मेरे पास है। नारद की तलाशी लेते समय रत्नाकर का स्पर्श साधु के शरीर को हुआ और पुनर्जन्म शुरू हो गया।।
गंगा जी पाप धोती है,चंद्रमा ताप हरण करता है कल्पतरु गरीबी मिटाता है,लेकिन साधू संग,साधु का समागम पाप-ताप और संताप तीनों को खत्म करता है।।
वाल्मीकि की चित् वृत्ति बदलने लगी।।चित्त की पांच दशाओं में मूढ दशा,विक्षिप्त दशा,क्षिप्त दशा (स्थिर),एकाग्र दशा और निरुद्ध दशा होती है।। वाल्मीकि ने पूछा आप जो हरिनाम लेते हैं वह हरि कौन है?नारद ने कहा वह सब कुछ है।क्या वह आप जैसे महात्मा पर ही कृपा करता है?नारद ने कहा वह किसी के ऊपर कृपा करता है।।
फिर नारद ने पूछा तू यह सब क्यों करता है?वैसे कौवे कुत्ते भी पेट भरने के लिए करते हैं लेकिन हत्या नहीं करते।।रत्नाकर ने कहा मेरा पूरा परिवार है। ऐसे कुकर्म करने वालों की भयानक दुर्गति होती है। आदमी कितने ही करोड़ में बिक जाए लेकिन उसकी कीमत दो कौड़ी की हो जाती है क्योंकि वह बिक गया है!
नारद ने कहा परिवार वाले भी पाप के भागीदार होंगे घर जाकर पूछ कर आओ! रत्नीकर ने नारद को वृक्ष से बांध दिया।।साधु को बांध दो साधु तुम्हें मुक्ति देगा।।और जब पूछने गया परिवार वालों ने ना कहा।।वापस आया और फिर प्रायश्चित किया।।नारद ने कहा कि हरिनाम लो।।लेकिन घृणा,लज्जा, शोक,भय,जुगुप्सा,संकोच,जाति अभिमान,वर्ण अभियान,कूल अभिमान,आत्मज्ञान का अभिमान यह ८ पाश- बंधन बताए हैं,जो आदमी को हरिनाम गाने नहीं देता।।
रत्नाकर ने कहा मैं हरिनाम नहीं बोल पाऊंगा।।नारद ने कहा सबसे ज्यादा शब्द क्या बोलते हो? रत्नाकर ने कहा कि मरा मरा ऐसा बोलता हूं।।नारद ने कहा वही बोलो और उल्टा नाम जपने से पुनर्जन्म होने लगा।नारद निकल गए।।
फिर तो वह जपने लगा।जप में खो गया। मिट्टी का ढेर वल्मीक लग गया।।पूरा शरीर ढंक गया अब बोल नहीं पा रहा था तो अस्तित्व बोलने लगा।। बहुत समय बिता।फिर नारद वीणा बजाते आए। ढूंढने लगे। वही वृक्ष देखा और देखा तो वाल्मीक के अंदर से आवाज आ रही है।मिट्टी हटाई और जागे वाल्मिक में से प्रकट हुए और वाल्मीकि बने। उल्टा नाम जप करके शुद्ध बन गए थे।।नव जन्म हुआ और आदि कवि वाल्मीकि बन गए।।
फिर सीता की दूसरी बार सगर्भा अवस्था में वाल्मीकि के आश्रम में थे तब नारद वहां जाते हैं तो वाल्मीकि जी पूछते हैं कि ऐसा कौन पूर्ण पुरुष है और सांप्रत में ऐसे लक्षणों कहां है? नारद ने कहा कि यह राम है और राम का चरित्र लिखने को कहा। त्रेतायुग की वह घटना रामायण के रूप में वाल्मीकि जी द्वारा आई।।
जब राम आश्रम में आए।रहने के स्थान पूछे वाल्मीकि जी ने पूछा कि पहले यह बताइए आप कहां नहीं है?राम ने कहा मैं तो सब जगह हूं लेकिन मेरे साथ लक्ष्मण और सीता भी है वह कहां रहेंगे? भक्ति और वैराग्य कहां रहे?वाल्मीकि जी ने १४ स्थान बताएं।।
फिर कथाक्रम में हनुमंत वंदना के बाद सीताराम जी की वंदना और नाम महिमा का गायन करते हुए बापू ने कहा कि रूप पकड़ में नहीं आता। लीला समझ में नहीं आएगी।धाम में हम ज्यादा जा नहीं पाएंगे। सबसे सरल,सबके लिए सरल केवल नाम है।।नाम की महिमा अतिशय विशेष बताई है।। और पूरे नाम महिमा का प्रकरण का गान करते हुए रामनाम और हरिनाम कलयुग में श्रेष्ठ है।।नाम भी है और मंत्र भी है।।
फिर नाम संकीर्तन में डूब कर पूरे पंडाल को नाम संकीर्तन करवाते हुए आज की कथा को विराम दिया गया।।

