
जब राजमहल में कोई जॉकर प्रवेश कर लेता है,खुद को राजनीतिक नहीं बनाता लेकिन राजमहल को सर्कस बना देता है।।
साधु वह है जो ममत्व छोड़ें मगर महत्व न छोड़ें।।
आस्था अवस्था वालों के चरणों में रखना,व्यवस्था वालों के चरणों में नहीं रखना।।
जब अहंकार मिट जाता है तब मुर्शिद और शागिर्द प्रेमी और प्रियतम एक हो जाते हैं।।
पैसों से कथा करना है मगर पैसों के लिए नहीं करना।
मरने के लिए एक ही बार,लेकिन जीने के लिए बार-बार झहर पीना पड़ता है।।
भद्र श्रोता-वक्ता होने के लिए प्रभाव पावरफुल हो, स्वभाव पूअर हो और सद्भाव प्योर हो।।
दंभ पार्ट टाइम नहीं होता,कायम होता है।।
श्रद्धा उधार है,शंका खुद की है।।
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बीज पंक्तियां:
मागुमागुबरुभै नभ बानी।
परम गभीरकृपामृत सानी।।
-बालकॉंड
पावा परम तत्व जनुजोगीं।
अमृतुलहेउजनु संतत रोगीं।।
-बालकॉंड
सेवहिअरंडुवकलपतरु त्यागी।
परिहरि अमृत लेहिबिषुमागी।।
-अयोध्या कॉंड
अपने नीत नूतन और भरपूर भाव प्रवाह में बहती पतित पावनीमॉं गंगा के सामने ही श्री प्रेमनगर आश्रम,ज्वालापुर रोड से परम पवित्र साधु संतो और संतजनों की पावन उपस्थिति और आरंभ में आशीर्वादक भाव एवं निमित्त मात्र मनोरथी परिवार के आवकार भाव के बाद इन बीज पंक्तियों का गायन करते हुए मंगलवार शाम श्री मोरारिबापु के श्री मुख से रामकथा का मंगल आरंभ हुआ।।
बापु ने कथा बीज और ये कथा के विषय के बारे में बताते हुए परम पावनी,पतित पावनी मां गंगा को प्रणाम करते हुए,हरिद्वार में फिर एक बार भगवत कृपा से अनुष्ठान के लिए आने का आनंद व्यक्त किया।।
बापू ने कहा कि जब ऋषिकेश में कथा हुई थी,सात मनोरथी बेटियों ने कथा करवायी थी तब सात दामाद,कुमार,जमाई,युवराजों ने भी कथा मनोरथ व्यक्त किया था और इसीलिए यह कथा हो रही है।। बापू ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।।साथ ही तब ऋषिकेश आश्रम के षष्ठमपीठाधीश विष्णु देवानंद गिरि जी और त्रिभुवन दादा की स्मृति में गान हुआ था। इस बार यह भाव रहा की मां का स्मरण करें। मां के तट पर बैठे हैं और इससे बड़ी मां कौन हो सकती है!
५५-साल पहले हरिद्वार की पहली कथा का स्मरण करते हुए बताया कि तब निमित्त मात्र मनोरथीमोंघी मां बनी थी और यह कथा का नामकरण करते हुए बताया गत कथा मृत्यु लोक पर बोला गया।। अब अमृत की ओर चले! मानस अमृतंगमय- मानस अमृत की तरफ कैसे ले चलता है यह दर्शन करेंगे। तीन पंक्तियों में दो बालकांड और एक अयोध्या कांड से ली हुई है।।
मानस का मंथन करने से १४-अमृत प्राप्त हुए हैं उसका अवगाहन,दर्शन,मज्जन,पान,स्मरण करेंगे। पहले दिन की कथा में मैं और आप श्रोता भी है। श्रोता कैसा होना चाहिए और वक्ता कैसा होना चाहिए?समुद्र मंथन जब हुआ तब कई वस्तु निकली इनमें एक उच्चश्रवा नाम का अश्व निकला।।श्रोता का पहला लक्षण है:उच्चश्रवा: सुनने के लिए कान ऊपर करें-ऐसा होना चाहिए।।दूसरा है वृध्धश्रवा-श्रोता वृध्ध,ग्यानवृध्ध-परीपकव हो कर सुने।तीसराउग्रश्रवा बनकर,मतलब तीव्रता के भाव से सुने।।एक श्रोता है:चक्षुश्रवा-आंख ही कान बन जाए। एक श्रोता है भद्रश्रवा: भद्र बनकर सुने।
वक्ता के भी पांच लक्षण है।वक्ता उच्च वचन मतलब वचन निम्न कक्षा के ना हो।। दूसरा है:उग्र वचन- नस-नस को तोड़ के श्रोता तक पहुंचने के लिए।। तीसरा है वृद्ध वचना:मुख से हर शब्द अनुभूति से निकले और चक्षुश्रवा:आंखें बहुत कुछ कह दे।।भद्रवचना वक्त कोई अभद्र वचन ना बोले।। बुद्ध, महावीर,शंकराचार्य के मुख से कभी अभद्र वचन नहीं निकले हैं।लोकमंगल के लिए भद्र वचन ही निकले हैं।।
जब अहंकार मिट जाता है तब मुर्शिद और शागिर्द प्रेमी और प्रियतम एक हो जाते हैं ऐसा रूमी कहता है।।प्रगट परमात्मा रूपी साधु आएगा,स्नान करेगा तब गंगा में पापियों के जितने भी पाप है वह मिट जाएंगे और गंगा परम पवित्र होगी।।साधु वह है जो ममत्व छोड़ें मगर महत्व न छोड़ें।।साधु मां बाप को छोड़ें,बच्चों,परिवार सबको छोड़ें इसका मतलब उनका महत्व कायम रखें।।पैसों से कथा करना है मगर पैसों के लिए नहीं करना।।किसी भी परिस्थिति में शांत हो।। मरने के लिए एक ही बार झहर पीना पड़ता है लेकिन जीने के लिए बार-बार झहर पीना पड़ता है।।
भद्र श्रोता-वक्ता होने के लिए प्रभाव पावरफुल हो, स्वभाव पूअर हो और सद्भाव प्योर हो।। क्योंकि दंभ पार्ट टाइम नहीं होता,कायम होता है।। श्रद्धा उधार है,शंका खुद की है।। बापू ने एक जातक कथा भी कही।
शास्त्र ब्रह्म रूप,सत-चित-आनंद है।।श्रीमद् भागवत के न्याय से २७ लक्षण है।।
सत्य के तीन रूप:विचार,उच्चार और आचार। चित् के तीन लक्षण:एकाग्रचित,प्रसन्नचित,निरोधित चित। आनंद तीन प्रकार के:ब्रह्मानंद,परमानंद और सहजानंद।।विश्व उत्पत्ति पालन और लय तीन प्रकार के।। पातक तीन प्रकार के:आधि दैविक, आधि भौतिक,आधि दैहिक।। श्री तीन प्रकार की: माया,भक्ति और शांति।।कृष्ण भी तीन है:द्वैपायन कृष्ण,योगेश्वर कृष्ण और गीताकर कृष्ण।। वयं तीन है:श्रोता,वक्ता और लीला।।नमस्कार तीन प्रकार के हैं: प्रणाम,दंडवत और आंखों से नमन।।यह सब मिलकर २७ प्रकार के लक्षण गिनाये।।
बापू ने ग्रंथ महिमा ग्रंथ परिचय और मंगलाचरण की बात करते हुए सात सोपान रूपी सीडी,पहले सोपान के सात मंत्र और फिर बताया कि सनातन धर्म को हानि और ग्लानि करने के लिए तथाकथित लोग पंचदेव को नहीं मानते।।गणेश को नहीं मानते लेकिन अपने भगवान के द्वारपाल बनाकर बैठाते हैं सूर्य को नहीं मानते।सूर्य नमस्कार तक नहीं करते! विष्णु को नहीं मानते।महादेव को और माता जी को भी नहीं मानते।।लेकिन हम कोई खंडन-मंडन किए बिना पांच परम तत्व पंचदेव का आश्रय करें।।आस्था अवस्था वालों के चरणों में रखना,व्यवस्था वालों के चरणों में नहीं रखना।।बापू ने यह भी बताया कि जब राजमहल में कोई जॉकर प्रवेश कर लेता है खुद को राजनीतिक नहीं बनाता लेकिन महल को सर्कस बना देता है।
गुरु वंदना में पहला अमृत-अमियमुरीमय चूरन चारु.. में गुरु के चरण रज के अमृत का जिक्र किया और गुरु वंदना के बाद हनुमंत वंदना करके आज की कथा को विराम दिया गया।।
हरिद्वार में बापु की यह १२ वीं कथा हो रही है।।
१९७६ से आज तक बापु ने केवल हरिद्वार में ही ११ रामकथा का गान किया है।
हरिद्वार में हुई कथा का लिस्ट:
1-122 रामकथा 22/3/1976
हरिद्वार उत्तराखंड
2-190 रामकथा 20/03/1979 हरिद्वार उत्तराखंड
3-213 रामकथा17/03/1980 हरिद्वार उत्तराखंड
4-375 मानस रामकथा19/03/1988 हरिद्वार उत्तराखंड
5-400मानसगीता04/11/1989
सकल सुकृत फल भूरि भोग से।जगहितनिरुपधि साध लोग से ।।सेवक मन मानस मरालसे।
पावन गंग तरंग माल से।। हरिद्वार उत्तराखंड
6-536 मानस कुंभकरण28/03/1990
व्याकुल कुंभकरनपहिंआवा।
बिबिध जतन करिताहिजगावा।।
जागा निसिचरदेखअ कैसा।
मानहुॅंकालुदेहधरिबैसा ।। हरिद्वार उत्तराखंड
7-606 मानस रावण 402/04/2003
काल पाइमुनिसुनुसोइ राजा।
भयउनिसाचर सहित समाजा।।
दस सिर ताहिबीसभुजदंडा।
रावन नाम बीरबरिबंडा।। हरिद्वार उत्तराखंड
8-705 मानस गंगा 03/04/2010
चले राम लछिमन मुनि संगा।
गए जहाॅं जग पावनि गंगा।।
गाधिसूनु सब कथा सुनाई।
जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।। हरिद्वार उत्तराखंड
9-716 मानस जोगसूत्र04/04/2011
सद्गुरग्यानबिराग जोग के।
बिबुधबैदभव भीम रोग के।।
नव रस जप तप जोग बिरागा।
ये सब जलचर चारु तडा़गा।। हरिद्वार उत्तराखंड
10-878 मानस हरिद्वार 03/04/202
हरि अनंत हरिकथा अनंता।
कहहिंसुनहिंबहुबिधि सब संता॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ।
जय अरुबिजय जान सब कोऊ॥हरिद्वार उत्तराखंड
11-895 मानस गुरुकुल 02/04/22
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला।
चरनलागिकरिबिनयबिसाला॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई।
अलप काल बिद्या सब आई॥पतंजलियोगपीठ हरिद्वार उत्तराखंड
== समाप्त ==

