Homeगुजरातरामचरितमानस मार्गी ग्रंथ है।।

रामचरितमानस मार्गी ग्रंथ है।।

आकाश मार्ग में ज्ञानी जाते हैं।।

पृथ्वी साधना उपासना कर्म मार्ग है।।

जलचर मार्ग प्रभु की कृपा का मार्ग माना गया है।।

ज्ञान मार्ग का मार्गी बनना है तो रामायण और गीता साथ रखो।।

अपने लाभ के लिए सामने वाले का शुभ खंडित ना हो वह ध्यान में रखो।।

कृपा का मार्ग हमारे जैसे लोगों के लिए है क्योंकि गगन मार्ग और पुरुषार्थ मार्ग हमें सहज नहीं है।।

दक्षिण अमरीकी प्रांत लिटलरॉक के मनोरम्यआर्कान्सा में चल रही रामकथा का छठ्ठा दिन।।हररोज की तरह गत दिन की कथा का अंग्रेजी सारांश पेश हुआ।।बहूत सी जिग्यासायें भी आती है।। रामचरितमानस मार्गी ग्रंथ है इनमें कितने प्रकार के मार्ग और कितने प्रकार के मार्गीहै।।कई मार्ग कई सफल मार्गी भी दिखते हैं।।

विज्ञान के जरिए एआई के माध्यम से कथा का अंग्रेजी में रूपांतरित होता है।भविष्य में ऐसा भी होगा मैं बोलूं और आप सब अपनी अपनी भाषा में सुन पाएं!

मार्गी के परिचय में एक पद भी भेजा गया मार्गी साधुओं की अस्मिता के यह पद में कहा है कि मारगे  चले ए मार्गीआधेधड़ चाले तेआडोद, मोटा पथ मारगीतणा…

गुजरात में कई मार्गी जिसे विचरती जाती कहते हैं वह पूरा लिस्ट पढ़ा गया।। जहां अनेक मार्गी की बात की गई है।।

रामचरितमानस में अनेक मार्ग है। हर एक मार्ग के सफल मार्गी भी है।।

लंका कांड का एक दृश्य दिखाते हुए बापू ने कहा कि आरंभ में सेतु की रचना हुई। सत योजन सागर को बांध दिया गया।।भगवान के साथ इतनी भीड़ है 18पदमजूथप(नायक सेनापति) थे।। सेतु मार्ग बन गया है तब गोस्वामी तीन प्रकार के मार्ग की रचना सांकेतिक रूप से कहते हैं।। एक तो सेतुबंध है दूसरा जो समर्थ है जो पंख वाले थे वह आकाश मार्ग से यात्रा करने लगे। और बाकी रहे तो जलचर प्राणी,इतने बड़े शरीर वाले, जो समंदर में राम को देखने के लिए ऊपर आ गए उसके शरीर के ऊपर से सब चलने लगे।।

बापू ने कहा एक वैज्ञानिक विचार मैंने पढ़ा था कि 10000 साल पहले जलचर प्राणी भयंकर विशालकाय थे। इनके मरने की कोई माहिती नहीं लेकिन आध्यात्मिक सत्य यह भी है यह महाकाय प्राणी अपने ही बोझ से मारे गए।।

मार्ग इतना संकरा था और भीड़ ज्यादा थी क्या करें राम ने कहा कि जलचर के ऊपर पैर रख कर चलो।। तब बताया गया कि सागर चंचल, जल चंचल, जलचर प्राणी भी चंचल और बंदर भी चंचल जल से डूबेंगे तो क्या करेंगे? राम ने कहा कि मुझको देखने में इतने तन्मय हो गए कि आप उनके शरीर के ऊपर से चले जाओ।।

आकाश मार्ग में ज्ञानी जाते हैं।। पृथ्वी साधना उपासना कर्म मार्ग है और जलचर मार्ग प्रभु की कृपा का मार्ग माना गया है।।

आकाश मार्ग से जाना है तो पंख चाहिए। कौन सी पंख?रामायण और गीता एक हमारी पंख है।।ज्ञान मार्ग का मार्गी बनना है तो रामायण और गीता साथ रखो।।

बेरखा के बारे में बापू ने कहा आपकी बेरुखी मिटाये वही बेरखा है।। कोई लोग दो-तीन और ज्यादा बेरखा रखते हैं।।हो सके तो एक ही बेरखा रखो। गले में माला भी एक ही रखो। मंत्र भी एक रखो गरुड़ महा ज्ञानी है।।कागभूसुंडी विवेकी है। वाल्मीकि कोयल है।शुकदेव तोता है। हनुमान जी आकाश मार्गी।। यह सब ज्ञान मार्गी है। पत्थर का सेतु पुरुषार्थ कर्म का मार्ग है।।

अपने लाभ के लिए सामने वाले का शुभ खंडित ना हो वह ध्यान में रखो।।

तीसरा कृपा का मार्ग हमारे जैसे लोगों के लिए है क्योंकि गगन मार्ग और पुरुषार्थ मार्ग हमें सहज नहीं है।।सुग्रीव विषय मार्ग का गुहराज साधक मार्ग का और विभीषण सिद्ध मार्ग के यात्री है।।

कथा प्रवाह में राम प्रागट्य के बाद एक महीने तक का दिन हुआ।।चारों भाइयों राजकुमारों का नामकरण संस्कार हुआ।। एक नाम जो पूरी दुनिया को आराम देता है। एक नाम पूरी दुनिया का पोषण करता है।एक नाम पूरे जगत को दुश्मनी से मुक्त करता है और एक नाम सबका आधार बना है ऐसे चारों भाइयों के नाम रखे गए।। यज्ञोपवित संस्कार हुए 16 संस्कार और श्रृंगार भी 16 है।। संस्कार भीतरी है श्रृंगार ऊपर का है। विद्या संस्कार के बाद विश्वामित्र का आगमन हुआ।। यज्ञ रक्षा के लिए राम लक्ष्मण की मांग की और राम लक्ष्मण के साथ विश्वमित्र की यात्रा शुरू हुई।।मार्ग में एक ही बाण से राम ने ताड़का के प्राण हर और अपना लीला आरंभ किया और फिर आगे अहल्या का उद्धार करके विश्वामित्र के साथ जनकपुर में आए और रात्रि निवास वहां किया।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read